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23 साल पुराने ‘टू-चाइल्ड’ कानून का अंत: डॉ. मोहन यादव के एक मास्टरस्ट्रोक ने कैसे बचाई लाखों युवाओं की नौकरी?

इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में आपका स्वागत है। कल्पना कीजिए कि आपने सालों तक रातों की नींदें हराम करके सरकारी नौकरी की तैयारी की, परीक्षाएं पास कीं और इंटरव्यू भी निकाल लिया। लेकिन ऐन मौके पर आपको यह कहकर बाहर कर दिया जाए कि आपके दो से ज्यादा बच्चे हैं, इसलिए आप इस नौकरी के लायक नहीं हैं। यह कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश में पिछले 23 सालों से चल रही एक कड़वी हकीकत थी। लेकिन 9 जून 2026 को मध्य प्रदेश के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में ऐसा भूचाल आया, जिसने दशकों पुराने इस नियम की जड़ों को उखाड़ फेंका है। आइए, फाइलों और नियमों के उस चक्रव्यूह को डिकोड करते हैं, जिसे तोड़कर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने लाखों युवाओं और कर्मचारियों को एक बड़ी संजीवनी दी है।

2001 का वो ‘साइलेंट किलर’ नियम
इस पूरी कहानी की जड़ें आज से 23 साल पहले, यानी साल 2001 में छिपी हैं। उस वक्त की राज्य सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के जरिए एक बेहद सख्त फरमान जारी किया था। मध्य प्रदेश सिविल सेवा (सेवा की सामान्य शर्तें) नियम, 1961 में एक नया क्लॉज जोड़कर यह तय कर दिया गया कि 26 जनवरी 2001 या उसके बाद अगर किसी भी व्यक्ति के दो से अधिक जीवित बच्चे हैं, तो वह सरकारी नौकरी की सीधी भर्ती के लिए ‘अपात्र’ होगा। यह नियम सिर्फ नए उम्मीदवारों तक सीमित नहीं था, बल्कि जो लोग पहले से सिस्टम का हिस्सा थे, उन पर भी मध्य प्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 का चाबुक चलाया गया। इसके तहत दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने को ‘कदाचार’ (Misconduct) मान लिया गया। सीधे शब्दों में कहें तो, परिवार का आकार बढ़ने का मतलब था आपकी तरक्की, इंक्रीमेंट और करियर का हमेशा के लिए खत्म हो जाना। यह एक ऐसा साइलेंट किलर नियम था, जिसने सालों तक लाखों सपनों का गला घोंटा।

ब्यूरोक्रेसी की चाल और क्लाइमेक्स
अब सवाल यह उठता है कि 2026 में अचानक इस पर इतना बड़ा एक्शन क्यों हुआ? दरअसल, कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आया जब हाल ही में सामान्य प्रशासन विभाग ने मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियमों का एक नया प्रस्तावित प्रारूप तैयार किया। हैरानी की बात यह थी कि ब्यूरोक्रेसी ने इस नए ड्राफ्ट में भी उसी पुराने और विवादित ‘टू-चाइल्ड पॉलिसी’ वाले प्रावधान को ज्यों का त्यों चिपका कर सरकारी पोर्टल पर लाइव कर दिया। सिस्टम की यह चाल शायद चुपचाप पास हो जाती और किसी को भनक तक नहीं लगती, लेकिन तभी ये फाइलें मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की टेबल तक पहुंचीं और यहीं से इस पूरी कहानी का क्लाइमेक्स शुरू हुआ।

मुख्यमंत्री का एक्शन और सिस्टम पर प्रहार
9 जून 2026 को मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने इस पूरे मामले पर बेहद सख्त और निर्णायक रुख अपनाया। उन्होंने इसे युवाओं और कर्मचारियों के हितों के खिलाफ माना और बिना कोई वक्त गंवाए अपना मास्टरस्ट्रोक खेल दिया। उन्होंने सामान्य प्रशासन विभाग को कड़े निर्देश दिए कि इस प्रस्तावित सिविल सेवा नियम के प्रारूप को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए। इसके साथ ही, अधिकारियों को आदेश दिया गया कि इस विवादित ड्राफ्ट को तुरंत सरकारी पोर्टल से विलोपित किया जाए। मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया कि जब यह ड्राफ्ट दोबारा तैयार हो, तो उसमें से ‘दो से अधिक जीवित संतान होने पर अपात्र मानने’ वाले हिस्से को हमेशा के लिए हटा दिया जाए। यह कदम महज एक कागजी आदेश नहीं है, बल्कि सिस्टम के उस पुराने माइंडसेट पर सीधा प्रहार है जो योग्यता को पारिवारिक फैसलों के तराजू पर तौलता था। अब मध्य प्रदेश में सरकारी नौकरी पाने या प्रमोशन हासिल करने की राह में बच्चों की संख्या कोई रोड़ा नहीं बनेगी।

रोजगार से बढ़कर ‘सामाजिक न्याय’ की जीत
अगर हम इस ऐतिहासिक फैसले के गहरे सामाजिक प्रभाव की बात करें, तो यह सिर्फ रोजगार का मुद्दा नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है। पिछले 23 सालों में इस ‘टू-चाइल्ड पॉलिसी’ का सबसे ज्यादा खामियाजा हमारे ग्रामीण तबके और विशेषकर महिलाओं को भुगतना पड़ा है। हमारे समाज के पितृसत्तात्मक ढांचे और ‘बेटे की चाहत’ में अक्सर परिवारों का आकार बढ़ता गया, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कीमत महिलाओं को अपने करियर और सपनों की बलि चढ़ाकर चुकानी पड़ी। इतना ही नहीं, नौकरी बचाने के खौफ में कई लोग अपने तीसरे बच्चे को कागजों पर अनाथ दिखाने या रिश्तेदारों को गोद देने जैसी अमानवीय चालें चलने को मजबूर थे। मुख्यमंत्री का यह फैसला उसी खौफ और मजबूरी पर सबसे बड़ी चोट है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि सामाजिक कुरीतियों या पारिवारिक दबाव में लिए गए फैसलों की सजा किसी युवा की पेशेवर काबिलियत को नहीं दी जा सकती।

निष्कर्ष: सजा नहीं, जागरूकता है समाधान
23 साल के एक खौफनाक और विवादित नियम का अंत आखिरकार हो गया है। लाखों उम्मीदवारों के सिर पर लटकती ‘अपात्रता’ की तलवार अब हमेशा के लिए हट चुकी है। एक तरफ जहां देश के कुछ राज्य जनसंख्या नियंत्रण के लिए सख्त दंडात्मक कानूनों की पैरवी करते रहे हैं, वहीं मध्य प्रदेश सरकार का यह फैसला एक बिल्कुल अलग और मानवीय नरेटिव सेट कर रहा है, जो बताता है कि परिवार नियोजन जागरूकता का विषय है, सजा का नहीं।
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