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60 नियुक्तियाँ… पर असली खेल क्या है? | MP Power Game EXPOSED

मध्य प्रदेश की सियासत में निगम, मंडल और प्राधिकरणों में नियुक्तियों का जो सिलसिला जारी है, उसने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि सत्ता और संगठन के बीच संतुलन साधना सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि एक गहरी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। अब तक अध्यक्ष और सदस्य मिलाकर करीब 60 नियुक्तियाँ हो चुकी हैं और सरकार का दावा है कि इन फैसलों के जरिए जातिगत संतुलन, क्षेत्रीय असंतोष और पुराने-नए नेताओं के बीच सामंजस्य बैठाने की कोशिश की गई है, लेकिन जब इन नियुक्तियों का बारीकी से विश्लेषण किया जाता है तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है, जो यह संकेत देती है कि राजनीतिक प्राथमिकताएँ और गुटीय समीकरण इस पूरी प्रक्रिया पर हावी रहे हैं।
अगर सबसे पहले क्षेत्रीय संतुलन की बात करें तो ग्वालियर-चंबल संभाग इस पूरी सूची में सबसे ज्यादा प्रभावशाली नजर आता है, जहाँ अध्यक्ष और सदस्य मिलाकर कुल 18 नियुक्तियाँ हुई हैं और अकेले 12 निगम-मंडल और प्राधिकरणों में इसी क्षेत्र के नेताओं को जगह मिली है, यह संख्या अपने आप में बताती है कि इस क्षेत्र को किस तरह प्राथमिकता दी गई है, जबकि मालवा जैसे बड़े राजनीतिक क्षेत्र में कुल 20 नियुक्तियाँ तो जरूर हुई हैं लेकिन अध्यक्ष पदों की संख्या अपेक्षाकृत कम रखी गई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि संतुलन के दावे के बावजूद शक्ति का केंद्र एक ही क्षेत्र में सीमित होता जा रहा है।
ग्वालियर-चंबल में भी दिलचस्प बात यह है कि यहाँ नियुक्त हुए अधिकांश नेताओं को नरेंद्र सिंह तोमर का समर्थक माना जाता है, जबकि ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट को उम्मीद के मुताबिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है, और यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश भी है कि संगठन ने इस बार शक्ति संतुलन को सिंधिया के बजाय तोमर खेमे की ओर झुकाने का फैसला किया है, इसी क्रम में रामनिवास रावत और जयभान सिंह पवैया जैसे नेताओं को अहम पद देकर यह स्पष्ट संकेत दिया गया है कि सिंधिया विरोधी और तोमर समर्थक नेताओं को प्राथमिकता दी जा रही है।
हालांकि कुछ नियुक्तियाँ ऐसी भी हैं जो इस लाइन से अलग जाती हैं, जैसे साडा के अध्यक्ष अशोक शर्मा, जिन्हें सिंधिया गुट का माना जाता है, लेकिन उनकी पृष्ठभूमि यह भी बताती है कि वे पहले सुरेश पचौरी के समर्थक रहे हैं, वहीं उपाध्यक्ष सुधीर गुप्ता का मामला भी दिलचस्प है जो कांग्रेस से भाजपा में आए हैं, यह दिखाता है कि पार्टी केवल गुटीय संतुलन ही नहीं बल्कि राजनीतिक उपयोगिता को भी ध्यान में रख रही है।
इन नियुक्तियों को 2020 के उपचुनावों के संदर्भ में भी समझना जरूरी है, जब सिंधिया के भाजपा में आने के बाद ग्वालियर-चंबल की 16 सीटों पर चुनाव हुए थे और भाजपा ने 9 सीटें जीती थीं जबकि 7 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था, उस समय हारने वाले नेताओं को शिवराज सरकार ने निगम-मंडलों में एडजस्ट किया था, लेकिन इस बार स्थिति बदल गई है और सिंधिया समर्थकों को वैसा स्पेस नहीं मिल रहा है, यही वजह है कि सूत्रों के अनुसार सिंधिया अपने समर्थकों के लिए लगातार लॉबिंग कर रहे हैं और हाल ही में उन्होंने नितिन नबीन से मुलाकात भी की है।
अगर जातिगत समीकरणों पर नजर डालें तो यहाँ भी संतुलन का दावा पूरी तरह सटीक नहीं बैठता, क्योंकि 16 निगम-मंडल और प्राधिकरणों में सवर्ण नेताओं को अध्यक्ष बनाया गया है जबकि केवल 5 पद एससी-एसटी वर्ग को दिए गए हैं, ओबीसी और एसटी वर्ग की एक-एक महिला नेता को अध्यक्ष बनाकर संतुलन दिखाने की कोशिश जरूर की गई है, लेकिन यह प्रयास प्रतीकात्मक ज्यादा नजर आता है, वहीं यादव समाज को जरूर साधने की कोशिश दिखती है जहाँ 8 में से 4 पद यादव नेताओं को दिए गए हैं, केपी यादव को नागरिक आपूर्ति निगम का अध्यक्ष बनाना खास मायने रखता है क्योंकि उन्होंने 2019 में सिंधिया को गुना-शिवपुरी सीट से हराया था, वहीं महेंद्र यादव को अपेक्स बैंक का प्रशासक बनाना और विजय यादव को चित्रकूट विकास प्राधिकरण की जिम्मेदारी देना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, इसके साथ ही कुशवाहा और बघेल समाज को प्रतिनिधित्व देकर ओबीसी वोट बैंक को मजबूत करने का प्रयास किया गया है।
महिला प्रतिनिधित्व की स्थिति भी बहुत मजबूत नहीं दिखाई देती, जहाँ पूर्व विधायक रेखा यादव को राज्य महिला आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है, वहीं साधना स्थापक को सदस्य बनाया गया है, लेकिन आयोग का कोरम अभी भी पूरा नहीं हो पाया है क्योंकि कुल 6 पदों में से 4 पद खाली हैं, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या महिला सशक्तिकरण सिर्फ प्रतीकात्मक स्तर पर ही सीमित रह गया है।
इन नियुक्तियों के बीच कुछ विवाद भी सामने आए हैं, जैसे साधना गुप्ता का नाम ग्वालियर में अधिक नियुक्तियों और नारायण कुशवाह के विरोध के चलते फिलहाल होल्ड पर है, वहीं सहरिया विकास प्राधिकरण में गुड्डी आदिवासी को अध्यक्ष बनाकर आदिवासी समीकरण को साधने की कोशिश की गई है, जिन्हें तोमर समर्थक माना जाता है।
क्षेत्रीय नजरिए से देखें तो मालवा, महाकौशल, विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्रों को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है, लेकिन वह संतुलित नहीं बल्कि सीमित नजर आता है, मालवा में उज्जैन संभाग से सौभाग्य सिंह, रमेश शर्मा, ओम जैन और रविंद्र सोलंकी को पद मिले हैं जिन्हें मोहन यादव का करीबी माना जाता है, वहीं पंकज जोशी की नियुक्ति भी मुख्यमंत्री और संघ की पसंद बताई जा रही है, महाकौशल से संदीप जैन, विनोद गोटिया, रामलाल रौतेल, कैलाश जाटव और राजेंद्र भारती को जगह मिली है, विंध्य में पंचूलाल प्रजापति, विजय यादव और वीरेंद्र गोयल को अध्यक्ष बनाया गया है और बुंदेलखंड से रेखा यादव, संजय नगाइच, प्रभुदयाल कुशवाहा और महेश केवट को जिम्मेदारी दी गई है।
इंदौर और भोपाल जैसे बड़े शहरों में अब भी राजनीतिक खींचतान साफ दिखाई देती है, जहाँ IDA में हरिनारायण यादव के नाम पर विरोध के बाद सुदर्शन गुप्ता का नाम आगे आया है, जबकि BDA में चेतन सिंह के नाम पर सहमति नहीं बन पाई है, इसके अलावा 16 नगर निगमों में एल्डरमैन की नियुक्तियाँ भी पिछले एक महीने से लंबित हैं, जो यह दर्शाता है कि स्थानीय स्तर पर सत्ता और संगठन के बीच तालमेल अभी भी पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाया है।
इन सभी तथ्यों को जोड़कर देखें तो यह स्पष्ट होता है कि नियुक्तियों की प्रक्रिया पूरी तरह “डुअल कंट्रोल मॉडल” पर आधारित है, जहाँ राज्य सरकार स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखती है लेकिन अंतिम मुहर केंद्रीय नेतृत्व से लगती है, ताकि किसी भी प्रकार के असंतोष को समय रहते नियंत्रित किया जा सके, साथ ही यह भी साफ दिखता है कि 2023 के चुनाव में टिकट से वंचित रहे नेताओं, कम अंतर से हारने वाले प्रत्याशियों और लंबे समय से संगठन में सक्रिय लेकिन पद से दूर नेताओं को इन नियुक्तियों के जरिए एडजस्ट किया जा रहा है, ताकि उन्हें 2028 के चुनाव तक सक्रिय और संतुष्ट रखा जा सके।
अब नजर अगली सूची पर है, जहाँ कई बड़े नाम अभी भी इंतजार में हैं, जिनमें अरविंद सिंह भदौरिया, कमल पटेल, ओ.पी.एस. भदौरिया, लोकेंद्र पराशर और रजनीश अग्रवाल शामिल हैं, वहीं सिंधिया गुट से इमरती देवी और महेंद्र सिंह सिसोदिया को भी बड़े पद मिलने की उम्मीद है, ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अगली नियुक्तियाँ इस असंतुलन को ठीक करती हैं या फिर यह राजनीतिक संदेश और ज्यादा स्पष्ट होता है कि मध्य प्रदेश में सत्ता का असली केंद्र अब किसके हाथ में है।

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