Exclusive

मप्र की पॉलिटिकल कहानी: अध्याय 7; ‘मैनेजमेंट की राजनीति’ से ‘बंटाधार’ तक – दिग्विजय युग का पूरा सच

By Akhilesh Solanki | Akhileaks नमस्कार, मध्य प्रदेश की राजनीति की इस खास सीरीज़ में आपका स्वागत है, मैं हूँ अखिलेश सोलंकी और आप पढ़ रहे हैं ‘अखिलीक्स’ में पॉलिटिकल कहानी का सातवां अध्याय, एक ऐसा अध्याय जिसने सत्ता, रणनीति और मैनेजमेंट की राजनीति को नई परिभाषा दी। यह कहानी शुरू होती है 15 दिसंबर 1992 की उस तारीख से, जब बाबरी विध्वंस के बाद मध्य प्रदेश की सुंदरलाल पटवा सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और पूरे प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। सत्ता के गलियारों में सन्नाटा था, फैसले दिल्ली से हो रहे थे, लेकिन इस सन्नाटे के पीछे एक ऐसा खिलाड़ी था जो खामोशी से अपनी सियासी बिसात बिछा रहा था और वह नाम था दिग्विजय सिंह।

उस वक्त दिग्विजय सिंह कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे और उन्होंने समझ लिया था कि अगला चुनाव सिर्फ लहर से नहीं, बल्कि संगठन और रणनीति से जीता जाएगा। 1993 का विधानसभा चुनाव आया, बीजेपी राम लहर पर सवार थी और माहौल पूरी तरह उसके पक्ष में माना जा रहा था, लेकिन नतीजों ने सबको चौंका दिया। 320 सीटों वाले इस चुनाव में कांग्रेस ने 174 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया और बीजेपी 117 सीटों पर सिमट गई। लेकिन असली लड़ाई अभी बाकी थी, क्योंकि अब सवाल था मुख्यमंत्री की कुर्सी का और कांग्रेस में दिग्गजों की लंबी कतार थी—अर्जुन सिंह, श्यामाचरण शुक्ल, माधवराव सिंधिया और कमलनाथ जैसे बड़े नाम इस दौड़ में थे।

दिल्ली से पर्यवेक्षक बनकर आए प्रणब मुखर्जी और सुशील कुमार शिंदे ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने पूरी बाजी पलट दी, पहली बार विधायकों के बीच ‘सीक्रेट बैलेट’ यानी गुप्त मतदान कराया गया और इस मतदान में दिग्विजय सिंह ने सबको पीछे छोड़ दिया। उन्हें 100 से ज्यादा वोट मिले जबकि श्यामाचरण शुक्ल करीब 50 वोट पर सिमट गए और 7 दिसंबर 1993 को 46 साल की उम्र में दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन कुर्सी संभालते ही उन्हें एहसास हो गया कि असली चुनौती चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि सत्ता को संभालने में है, क्योंकि कांग्रेस के अंदर गुटबाजी इतनी गहरी थी कि उसे संतुलित करने के लिए उन्हें दो डिप्टी सीएम बनाने पड़े—सुभाष यादव और प्यारेलाल कंवर।

दिग्विजय सिंह की राजनीति का मॉडल बिल्कुल साफ था, उनका मानना था कि सत्ता सिर्फ विकास से नहीं, बल्कि सोशल इंजीनियरिंग और पॉलिटिकल मैनेजमेंट से चलती है, और इसी सोच के साथ उन्होंने पंचायती राज लागू किया, सत्ता का विकेंद्रीकरण किया और शिक्षा के क्षेत्र में विस्तार किया। कागजों पर यह सब बेहद प्रभावशाली था और एक ‘मॉडल स्टेट’ की तस्वीर पेश की जा रही थी, लेकिन जमीन पर हालात कुछ और ही कहानी कह रहे थे। मध्य प्रदेश की सड़कें जर्जर हो रही थीं, बिजली का संकट गहराता जा रहा था और पानी के लिए आम जनता संघर्ष कर रही थी, जनता की अपेक्षाएं और सरकार की प्राथमिकताएं धीरे-धीरे एक-दूसरे से दूर होती जा रही थीं।
इसी बीच 1997-98 का वह दौर आया जिसने दिग्विजय सरकार पर सबसे बड़ा दाग लगा दिया। दिसंबर 1997 में किसान अपनी बर्बाद फसलों के मुआवजे की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे, आंदोलन शांतिपूर्ण था लेकिन 12 जनवरी 1998 को मुल्ताई में हालात अचानक बिगड़ गए और पुलिस फायरिंग में 24 किसानों की मौत हो गई। यह घटना सिर्फ मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश को झकझोर देने वाली थी और राजनीतिक गलियारों में यह मान लिया गया कि अब दिग्विजय सिंह की विदाई तय है। लेकिन राजनीति में समीकरण कभी स्थिर नहीं रहते और इसी बीच दिल्ली की राजनीति में बड़ा बदलाव हुआ।

नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी का दौर खत्म हुआ और सोनिया गांधी ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। दिग्विजय सिंह, जो गांधी परिवार के भरोसेमंद माने जाते थे, अचानक राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत हो गए और यही वह मोड़ था जिसने उनके राजनीतिक भविष्य को बदल दिया। 1998 का विधानसभा चुनाव आया और लगभग सभी को उम्मीद थी कि मुल्ताई कांड के बाद कांग्रेस हार जाएगी, लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट। सोनिया गांधी ने दिग्विजय सिंह को पूरी छूट दी, टिकट वितरण से लेकर रणनीति तक सब कुछ उनके हाथ में था और दिग्विजय ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया।

उस समय बीजेपी अंदरूनी संघर्ष में उलझी हुई थी, सुंदरलाल पटवा और उमा भारती के बीच खींचतान चल रही थी और संगठन बिखरा हुआ नजर आ रहा था। दिग्विजय सिंह ने इस कमजोरी को भांप लिया और अपनी रणनीति से कांग्रेस को एक बार फिर जीत दिला दी, इस बार कांग्रेस 172 सीटों के साथ सत्ता में लौट आई और दिग्विजय सिंह दूसरी बार मुख्यमंत्री बन गए। उनकी राजनीति की सबसे बड़ी खासियत थी उनकी व्यावहारिकता, वे अपने नेताओं से ज्यादा विपक्ष के नेताओं के साथ रिश्ते मजबूत रखते थे, मुख्यमंत्री बनने के बाद वे सीधे सुंदरलाल पटवा के घर आशीर्वाद लेने पहुंचे और कई बार उन्होंने बीजेपी के बड़े नेताओं को सीएम हाउस में भोजन के लिए आमंत्रित किया।

यह ‘मैनेजमेंट मॉडल’ उन्हें राजनीतिक रूप से बेहद मजबूत बनाता गया, लेकिन इसी दौरान जनता की समस्याएं जस की तस बनी रहीं। बिजली, सड़क और पानी की समस्याएं लगातार बढ़ती गईं, हालात यह हो गए कि एक घंटे का सफर चार घंटे में पूरा होने लगा और आम आदमी के बीच सरकार की छवि धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी। साल 2000 में छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद मध्य प्रदेश की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों में बड़ा बदलाव आया, लेकिन इसके बावजूद दिग्विजय सिंह को भरोसा था कि उनका मैनेजमेंट उन्हें तीसरी बार भी सत्ता दिला देगा।

यहीं पर कहानी अपने सबसे दिलचस्प मोड़ पर पहुंचती है, क्योंकि राजनीति में सबसे खतरनाक चीज होती है अति-आत्मविश्वास और दिग्विजय सिंह इसी जाल में फंसते नजर आए। उन्हें लगा कि बीजेपी बिखरी हुई है और उनके सामने कोई मजबूत चुनौती नहीं है, लेकिन उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि एक साध्वी भगवा चोला पहनकर उनके दस साल के मजबूत साम्राज्य को चुनौती देने मैदान में उतरने वाली है। यह साध्वी थीं उमा भारती और उनके साथ आया एक ऐसा नारा जिसने पूरी राजनीति की दिशा बदल दी—“बंटाधार”।
यही वह मोड़ था जहां से मध्य प्रदेश की राजनीति में एक नई कहानी लिखी जाने वाली थी, एक ऐसी कहानी जिसमें मैनेजमेंट की राजनीति का मुकाबला सीधे जनता के मुद्दों से होने वाला था। क्या हुआ 2003 के उस ऐतिहासिक चुनाव में, कैसे ‘मिस्टर बंटाधार’ का टैग दिग्विजय सिंह की पूरी राजनीतिक विरासत पर भारी पड़ गया और कैसे बीजेपी ने जबरदस्त वापसी की, यह सब हम आपको बताएंगे ‘अखिलीक्स’ के अगले अध्याय में।

तब तक राजनीति की इन परतों को समझते रहिए, क्योंकि सत्ता की असली कहानी वही होती है जो पर्दे के पीछे लिखी जाती है। मैं हूँ अखिलेश सोलंकी, आप पढ़ रहे थे ‘अखिलीक्स’। नमस्कार।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button