मप्र की पॉलिटिकल कहानी: अध्याय 6; बिसात, बगावत और वो ऐतिहासिक ‘फोन कॉल’
मध्य प्रदेश की राजनीति हमेशा से ही सत्ता की जटिल बिसात रही है। यहाँ कई बार ऐसा हुआ है कि जो नेता सबसे मजबूत दिखाई देता था, वही अचानक सियासत के हाशिये पर पहुंच गया, और जो मामूली खिलाड़ी लगता था वही सत्ता का सबसे बड़ा चेहरा बन गया। मध्य प्रदेश की राजनीतिक कहानी का छठा अध्याय भी कुछ ऐसा ही है—जहाँ बगावत, वफादारी, महत्वाकांक्षा और दिल्ली दरबार के एक फोन कॉल ने सरकारों की दिशा ही बदल दी।
इस कहानी की शुरुआत होती है 1977 से। देश में आपातकाल खत्म हो चुका था और जनता पार्टी की लहर ने पूरे देश में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया था। मध्य प्रदेश भी इस बदलाव से अछूता नहीं रहा। यहाँ कांग्रेस का किला ढह गया और पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनने की स्थिति बनी। मुख्यमंत्री पद के लिए तीन बड़े नाम चर्चा में थे—कैलाश जोशी, वीरेंद्र सखलेचा और सुंदरलाल पटवा। अंततः दिल्ली के नेतृत्व ने कैलाश जोशी को मुख्यमंत्री चुना और 24 जून 1977 को उन्होंने पद की शपथ ली।
कैलाश जोशी को उस समय राजनीति का “संत” कहा जाता था। उनका स्वभाव बेहद शांत, सरल और ईमानदार माना जाता था। लेकिन सत्ता की कुर्सी अक्सर ऐसे स्वभाव वाले नेताओं के लिए आसान नहीं होती। मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रशासनिक दबाव और जनता पार्टी के भीतर की खींचतान लगातार बढ़ने लगी। कहा जाता है कि इसी दौर में जोशी जी को अनिद्रा की समस्या ने घेर लिया। फाइलों का बोझ और राजनीतिक तनाव इतना बढ़ गया कि कैबिनेट बैठकों में उनकी चुप्पी चर्चा का विषय बनने लगी। कई बार वे बैठकों में गहरी सोच में डूबे रहते और लंबे समय तक कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनके खिलाफ कोई बड़ी साजिश नहीं हुई, बल्कि उनका सहज स्वभाव ही सत्ता की कठोर राजनीति के सामने टिक नहीं पाया। आखिरकार 17 जनवरी 1978 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया।
जोशी जी के बाद मुख्यमंत्री बने वीरेंद्र कुमार सखलेचा। उनका व्यक्तित्व बिल्कुल अलग था। वे तेज-तर्रार, स्पष्टवादी और संगठनात्मक रूप से बेहद मजबूत नेता माने जाते थे। मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने प्रशासनिक कामकाज की गति तेज कर दी। फाइलों के तेजी से निपटारे और निर्णायक फैसलों के कारण उनकी कार्यशैली चर्चा में रहने लगी। लेकिन यही आक्रामक शैली जल्द ही विवादों का कारण भी बन गई। जनता पार्टी के भीतर समाजवादी धड़ा उनकी विचारधारा से असहज था। शरद यादव जैसे नेताओं के नेतृत्व में इस धड़े ने सखलेचा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए गए और पार्टी के भीतर अंतर्कलह तेजी से बढ़ने लगी। उसी समय दिल्ली में मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह के बीच सत्ता संघर्ष चल रहा था, जिसका असर राज्यों की राजनीति पर भी पड़ा। इन परिस्थितियों में सखलेचा की कुर्सी कमजोर होती चली गई और अंततः उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
सखलेचा के बाद सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनका पहला कार्यकाल बहुत छोटा रहा। उनकी सरकार सिर्फ 29 दिनों तक ही चल पाई। 1980 में जब इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई, तो कई राज्यों की गैर-कांग्रेसी सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया और मध्य प्रदेश में भी पटवा सरकार का अंत हो गया।
1980 के चुनाव के बाद कांग्रेस एक बार फिर सत्ता में लौटी और मध्य प्रदेश की राजनीति में एक नए नेता का उदय हुआ—कुंवर अर्जुन सिंह। उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में उस समय कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेता संजय गांधी की बड़ी भूमिका मानी जाती है। लेकिन यह राजनीतिक समीकरण ज्यादा समय तक टिक नहीं पाया। 23 जून 1980 को संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मौत हो गई। यह घटना अर्जुन सिंह के लिए बड़ा राजनीतिक झटका थी क्योंकि उनकी ताकत का बड़ा आधार खत्म हो गया था।
इसी दौर में अर्जुन सिंह ने वह राजनीतिक दांव चला जिसने उन्हें कांग्रेस की राजनीति में बेहद प्रभावशाली बना दिया। वे मध्य प्रदेश के करीब सौ विधायकों को लेकर दिल्ली पहुंचे और इंदिरा गांधी से मुलाकात की। यह कदम सिर्फ समर्थन दिखाने का नहीं था बल्कि वफादारी का सार्वजनिक प्रदर्शन भी था। उन्होंने यह संदेश दिया कि मध्य प्रदेश की कांग्रेस पूरी तरह गांधी परिवार के साथ खड़ी है। इसी दौरान उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि राजीव गांधी को सक्रिय राजनीति में आना चाहिए। उस समय राजीव गांधी राजनीति में आने को लेकर हिचकिचा रहे थे, लेकिन अर्जुन सिंह के इस कदम ने उन्हें गांधी परिवार के सबसे विश्वसनीय नेताओं में शामिल कर दिया।
मुख्यमंत्री रहते हुए अर्जुन सिंह ने एक ऐतिहासिक पहल भी की। उन्होंने चंबल घाटी के कुख्यात डकैतों—मलखान सिंह और फूलन देवी—को आत्मसमर्पण के लिए राजी किया। यह घटना उस समय देशभर में चर्चा का विषय बनी और अर्जुन सिंह की राजनीतिक छवि और मजबूत हुई।
लेकिन 3 दिसंबर 1984 की रात मध्य प्रदेश के इतिहास में एक भयानक त्रासदी लेकर आई। भोपाल गैस त्रासदी ने हजारों लोगों की जान ले ली और लाखों लोग प्रभावित हुए। इस घटना के बाद यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वॉरेन एंडरसन को देश से जाने देने के निर्णय को लेकर अर्जुन सिंह सरकार पर गंभीर सवाल उठे। यह विवाद उनके राजनीतिक जीवन पर हमेशा के लिए एक दाग बन गया।
1985 के चुनाव में कांग्रेस एक बार फिर भारी बहुमत से सत्ता में आई और 10 मार्च 1985 को अर्जुन सिंह ने दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन शपथ के कुछ ही समय बाद एक अप्रत्याशित घटनाक्रम हुआ। दिल्ली से प्रधानमंत्री राजीव गांधी का फोन आया। उस समय पंजाब उग्रवाद की आग में जल रहा था और केंद्र सरकार को वहां एक अनुभवी नेता की जरूरत थी। राजीव गांधी ने अर्जुन सिंह को पंजाब का राज्यपाल बनने का प्रस्ताव दिया। कहा जाता है कि शपथ लेने के महज चौबीस घंटे के भीतर अर्जुन सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और पंजाब के राज्यपाल बन गए।
अर्जुन सिंह के जाने के बाद मोतीलाल वोरा को मुख्यमंत्री बनाया गया। वोरा जी अपनी सादगी और संतुलित स्वभाव के लिए जाने जाते थे। उन्हें राजनीति में अजातशत्रु कहा जाता था। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि असली राजनीतिक प्रभाव अभी भी अर्जुन सिंह के पास ही बना हुआ था।
कुछ वर्षों बाद चुरहट लॉटरी कांड ने अर्जुन सिंह की राजनीति को गहरे संकट में डाल दिया। मामला अदालत तक पहुंचा और हाई कोर्ट की एक सख्त टिप्पणी ने उनकी स्थिति कमजोर कर दी। अदालत ने कहा कि मुख्यमंत्री पद का दुरुपयोग हुआ है। इसके बाद अर्जुन सिंह को इस्तीफा देना पड़ा और मोतीलाल वोरा एक बार फिर मुख्यमंत्री बने।
इन घटनाओं ने कांग्रेस की छवि को काफी नुकसान पहुंचाया और इसका फायदा 1990 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मिला। भाजपा सत्ता में आई और सुंदरलाल पटवा दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। पटवा सरकार का कार्यकाल प्रशासनिक सख्ती के लिए जाना गया। इसी दौर में बाबूलाल गौर जैसे नेताओं की पहचान भी कानून-व्यवस्था पर सख्त रुख के कारण मजबूत हुई।
लेकिन 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना के बाद देशभर में राजनीतिक उथल-पुथल मच गई। केंद्र सरकार ने कई भाजपा शासित राज्यों की सरकारें बर्खास्त कर दीं। मध्य प्रदेश की पटवा सरकार भी इसी फैसले की भेंट चढ़ गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।
इस तरह मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सत्ता का खालीपन पैदा हुआ। लेकिन राजनीति में खाली जगह ज्यादा समय तक खाली नहीं रहती। यही वह दौर था जिसने एक नए नेता के लिए जमीन तैयार की—एक ऐसे नेता के लिए जिसने आने वाले दस वर्षों तक मध्य प्रदेश की राजनीति पर अपनी पकड़ बनाए रखी। अगले अध्याय में हम बात करेंगे दिग्विजय सिंह की और समझेंगे कि उन्होंने कांग्रेस की गुटबाजी को कैसे साधा और भाजपा को लंबे समय तक सत्ता से दूर कैसे रखा।
राजनीति की ऐसी ही अंदरूनी कहानियों और गहरे विश्लेषण के लिए पढ़ते रहिए Akhileaks।



