Exclusive

संघ के संग: भाजपा की नई टीम में ‘हितानंद फैक्टर’ और हेमंत खंडेलवाल का संतुलन

113 दिनों की खामोशी के बाद आखिरकार भाजपा मध्यप्रदेश में ‘टीम हेमंत’ बन गई।
लेकिन यह लिस्ट सिर्फ़ संगठनात्मक घोषणा नहीं है —
यह सत्ता और संघ के बीच की नई सीमारेखा है।

कागज़ पर यह “कार्यकारिणी” है,
पर असल में यह भाजपा की पावर मैपिंग रिपोर्ट है —
जहां हर नाम, हर पद, और हर अनुपस्थिति एक राजनीतिक संदेश देता है।
और इस संतुलन के बीच खड़े हैं —
हेमंत खंडेलवाल, जिनकी कमान तो भोपाल में है,
लेकिन जिनकी नियुक्तियाँ दिल्ली से होकर, नागपुर की सहमति से गुज़री हैं।

113 दिन बाद बना ‘टीम हेमंत’ — कम चेहरे, ज़्यादा संकेत

भाजपा प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने 25 सदस्यीय नई टीम घोषित की है।
पहली नज़र में यह टीम छोटी लगती है,
लेकिन इसके हर नाम के पीछे एक गहरी राजनीतिक कहानी है।

वीडी शर्मा की 32 सदस्यीय टीम की तुलना में,
खंडेलवाल ने अपनी टीम को 25 तक सीमित रखा।
हर कैटेगरी में एक-एक पद जानबूझकर खाली छोड़ा गया है —
ताकि भविष्य में ज़रूरत पड़ने पर
किसी गुट को तुरंत समायोजित किया जा सके।

यानि भाजपा अब चल रही है —
“हर वक्त तैयार संगठन” के फॉर्मूले पर।

हितानंद शर्मा — संघ की लाइन और संगठन का नाड़ी केंद्र

इस टीम का सबसे बड़ा हस्ताक्षर है हितानंद शर्मा।
प्रदेश संगठन महामंत्री के तौर पर
वे भाजपा की रीढ़ और रडार दोनों बन चुके हैं।

25 में से लगभग 14 सदस्य संघ पृष्ठभूमि से जुड़े हैं।
इनमें पाँच नाम तो सीधे हितानंद कोटे के माने जा रहे हैं —
कांतदेव सिंह, शैलेंद्र बरुआ, सुरेंद्र शर्मा, गौरव रणदिवे और लोकेंद्र पाराशर।

ये सभी वे कार्यकर्ता हैं जो विचार से ज़्यादा अनुशासन में विश्वास रखते हैं।
यानि भाजपा अब वही कर रही है
जो उसे 2013 के बाद धीरे-धीरे खोता जा रहा था —
सत्ता की चमक के बीच संगठन की आत्मा को फिर से खोजना।

मुख्यमंत्री मोहन यादव — सत्ता है, पर संगठन नहीं

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की टीम में सिर्फ़ चार नाम हैं —
लता वानखेड़े, प्रभुलाल जाटव, राहुल कोठारी और आशीष अग्रवाल।

ये चार नाम चार संकेत हैं —
सत्ता को सम्मान मिला है,
पर संगठन पर नियंत्रण नहीं।

मोहन यादव को “सरकार चलाने” की पूरी छूट है,
लेकिन संगठन की स्क्रिप्ट उनके हाथ में नहीं।
यह साफ़ संदेश है कि भाजपा अब
सत्ता और संगठन के फ्यूजन से नहीं, सेपरेशन ऑफ पावर से काम करेगी।

या सीधी भाषा में कहें —
मोहन यादव मुख्यमंत्री हैं,
पर कमांड सेंटर अब भी नागपुर में है।

‘डुअल सुपरविजन स्ट्रक्चर’ — दिल्ली की मंज़ूरी, नागपुर की निगरानी

भाजपा के आधिकारिक पत्र में एक लाइन सब कुछ कह देती है —
“राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की सहमति से।”
मतलब साफ़ है —
भोपाल में जो नियुक्तियाँ दिखती हैं,
उनका ब्लूप्रिंट दिल्ली में बनता है
और फाइनल स्वीकृति नागपुर से आती है।

यह भाजपा का नया मॉडल है —
डुअल सुपरविजन स्ट्रक्चर।
जहां दिल्ली तय करती है राजनीतिक दिशा,
नागपुर तय करता है वैचारिक रुख,
और हेमंत खंडेलवाल उस रेखा पर संतुलन बनाए रखने वाले कलाकार हैं।

महामंत्रियों की चौकड़ी — संघ से संसद तक

चार महामंत्री नियुक्त किए गए हैं —
लता वानखेड़े, सुमेर सोलंकी, राहुल कोठारी और गौरव रणदिवे।

लता वानखेड़े: महिला और ओबीसी चेहरा

सुमेर सोलंकी: आदिवासी और संसदीय प्रतिनिधित्व

राहुल कोठारी: व्यापारी वर्ग और युवा चेहरा

गौरव रणदिवे: संघ के अनुशासित कार्यकर्ता

यह चौकड़ी भाजपा के चार आधारों का प्रतीक है —
संघ, समाज, संसद और सर्कुलेशन।

पुराने गायब, नए रिपीट — “उपयोगिता पहले, वफादारी बाद में”

इस बार 13 पुराने नाम दोबारा लौटे हैं,
लेकिन कई पुराने चेहरे पूरी तरह हटा दिए गए।
सबसे चर्चित नाम — भगवानदास सबनानी — इस बार सूची से गायब।

यह संकेत साफ़ है कि अब संगठन में
वफादारी नहीं, उपयोगिता चलेगी।
जो दिल्ली और नागपुर दोनों की लाइन पर फिट बैठेगा,
उसी को जगह मिलेगी।
बाकी लोग अब वेटिंग लिस्ट में रहेंगे।

शिवराज, तोमर और सिंधिया — मौजूद लेकिन सीमित

पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान,
विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर,
और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया —
तीनों के खेमों को सिर्फ़ प्रतीकात्मक जगह मिली है।

राजेंद्र सिंह, क्षितिज भट्ट (शिवराज कैंप)
और प्रभुराम चौधरी (सिंधिया ग्रुप) —
इनके नाम सिर्फ़ बैलेंस बनाए रखने के लिए रखे गए हैं।

दिल्ली की रणनीति स्पष्ट है —
अब कोई “सुपर चेहरा” नहीं होगा।
हर गुट को थोड़ी जगह मिलेगी,
पर किसी को इतना स्पेस नहीं
कि वह शक्ति का केंद्र बन जाए।

महिला शक्ति — सॉफ्ट पावर की नई राजनीति

इस बार सात महिला नेताओं को शामिल किया गया है —
लता वानखेड़े, मनीषा सिंह, नंदिता पाठक, संगीता सोनी, अर्चना सिंह, राजो मालवीय और बबीता परमार।

भाजपा अब महिलाओं को सिर्फ़ भीड़ नहीं,
बल्कि इमोशनल ब्रिज के रूप में इस्तेमाल कर रही है।
संघ चाहता है कि महिला मोर्चा अब
“रैली की भीड़” से आगे बढ़कर “विचार की आवाज़” बने।

यानि संगठन में सॉफ्ट पावर का विस्तार शुरू हो गया है।

मोर्चा नेटवर्क — चुनावी ग्राउंड तैयार

चार मोर्चों के अध्यक्ष बदले गए हैं —
जयपाल चावड़ा (किसान), भगवान सिंह परमार (SC),
पंकज टेकाम (ST), और पवन पाटीदार (OBC)।

महिला, युवा और अल्पसंख्यक मोर्चे फिलहाल होल्ड पर हैं।
यह बताता है कि भाजपा 2026 पंचायत
और 2027 विधानसभा चुनाव के लिए
सोशल ब्लॉक वाइज रणनीति बना रही है।

संघ की नज़र इन मोर्चों की ग्राउंड रिपोर्ट पर है —
जो जनता से संवाद बनाएगा,
वही अगले दौर में प्रमोट किया जाएगा।

‘कंट्रोल्ड कमांड’ मॉडल — भाजपा की नई दिशा

भाजपा ने इस टीम के जरिये स्पष्ट कर दिया है —
अब पार्टी “सेंट्रलाइज़्ड कमांड” से चलेगी।
दिल्ली से दिशा, नागपुर से दृष्टि, और भोपाल से निष्पादन।

मोहन यादव के पास सत्ता है,
पर संगठन की नसें हितानंद और हेमंत के हाथों में हैं।
भाजपा अब फिर से “सत्ता की पार्टी” से
“संरचना की पार्टी” बनने की ओर बढ़ रही है।

निष्कर्ष — नेताओं की नहीं, व्यवस्थाओं की कहानी

“टीम हेमंत” सिर्फ़ नियुक्तियों की सूची नहीं,
बल्कि भाजपा की अंदरूनी राजनीति का बैरोमीटर है।

मोहन यादव सत्ता संभालते रहेंगे,
हेमंत संगठन संभालेंगे,
और हितानंद शर्मा यह सुनिश्चित करेंगे
कि दोनों की लाइनें कभी न टकराएँ।

यानि मध्यप्रदेश भाजपा अब
“नेताओं की नहीं, व्यवस्थाओं की” कहानी बनने जा रही है।

Akhileaks निष्कर्ष

संघ का संतुलन, संगठन का अनुशासन,
और सत्ता की सीमारेखा —
तीनों अब तय हो चुकी हैं।

अब देखना यह है कि यह संतुलन
भाजपा को स्थिरता देता है
या किसी नए गुटीय विस्फोट की भूमिका बनाता है।

क्योंकि याद रखिए —
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासन है,
और सबसे बड़ा जोखिम — उसकी खामोशी।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button