क्या 2028 तक टिक पाएंगे डॉ. मोहन यादव?
12 वजहें, जिनसे मध्य प्रदेश की सत्ता डगमगा रही है राजनीति में ‘हनीमून पीरियड’ बहुत छोटा होता है।
13 दिसंबर 2023 को जब डॉ. मोहन यादव ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब यह माना जा रहा था कि राज्य को एक नया, तेज-तर्रार और आक्रामक नेतृत्व मिला है।
लेकिन ठीक दो साल बाद—31 दिसंबर 2025—भोपाल से लेकर दिल्ली तक सत्ता के गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है:
“क्या मोहन यादव 2028 तक मुख्यमंत्री बने रह पाएंगे?”
सूत्र बताते हैं कि दिल्ली हाईकमान असहज है, RSS की फीडबैक रिपोर्ट नकारात्मक है और पार्टी के रणनीतिकार अब ‘विकल्प’ तलाशने को मजबूर हैं।
यह लेख किसी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा, उस चार्जशीट का विश्लेषण है जो कथित तौर पर दिल्ली की टेबल पर रखी हुई है।
1 ‘योगी मॉडल’ की सस्ती कॉपी
मोहन यादव की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल रही—अपनी खुद की प्रशासनिक पहचान न गढ़ पाना।
लाउडस्पीकर हटाना, खुले में मांस पर रोक, बुलडोज़र राजनीति—सब कुछ योगी आदित्यनाथ मॉडल की नकल जैसा लगा।
अंतर यह रहा कि योगी के पास प्रशासनिक पकड़ है, जबकि मध्य प्रदेश में प्रशासन बेलगाम दिखा।
‘मामा’ की विनम्र राजनीति देखने वाली जनता को यह कृत्रिम आक्रामकता रास नहीं आई।
2 भाषा बनी नेतृत्व की सबसे बड़ी कमजोरी
एक मुख्यमंत्री की भाषा उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है।
लेकिन अधिकारियों को “साले को हटा देंगे” कहना,
दिव्यांगों को “कटे-फटे लोग” कहना—
दिल्ली को यह साफ संदेश गया कि CM पद की गरिमा गिर रही है।
यह नेतृत्व नहीं, ‘बॉसी एटीट्यूड’ माना गया।
3 अफसरशाही का राज, मुख्यमंत्री कमजोर
सरकार सीएम नहीं, अफसर चला रहे हैं—और अफसर भी सीएम की नहीं सुन रहे।
CMO में लगातार प्रमुख सचिव बदलना,
कलेक्टर-एसपी का बेलगाम होना—
यह संकेत है कि गवर्नेंस स्ट्रक्चर चरमरा चुका है।
4 सरकारी कर्मचारी: कोर वोट बैंक नाराज़
2016 से प्रमोशन अटके हैं।
मोहन यादव के दो साल में 1 लाख से ज्यादा कर्मचारी बिना प्रमोशन रिटायर हो चुके हैं।
जो कर्मचारी कभी चुनाव जिताते थे, वही अब सरकार से कट चुके हैं।
5 वकीलों से किया वादा, निभाया नहीं
4000 वकीलों के सामने किए गए वादे अधूरे रहे।
एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट ठंडे बस्ते में चला गया।
वकील समुदाय—जो समाज का ओपिनियन मेकर है—अब सरकार के खिलाफ माहौल बना रहा है।
6 व्यापम का जिन्न फिर बाहर
नर्सिंग घोटाले ने व्यापम की यादें ताज़ा कर दीं।
कॉलेज बंद, डिग्रियां संदिग्ध, परीक्षाएं लटकीं।
लाखों छात्रों का भविष्य अधर में चला गया।
7 युवाओं का भरोसा टूटा
पटवारी भर्ती, रुकी हुई नियुक्तियां, बढ़ती बेरोजगारी।
जो युवा कभी बीजेपी का पोस्टर बॉय था, वही आज सरकार को कोस रहा है।
8 कानून-व्यवस्था: राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी
आदिवासियों के खिलाफ अपराध में MP देश में नंबर 2।
महिलाओं के खिलाफ अपराध में नंबर 1।
धार-झाबुआ-खरगोन जैसे इलाकों में आदिवासी वोट बैंक फिसलता दिख रहा है।
9 उज्जैन लैंड पूलिंग: फैसले लेकर पलटना
अपने ही गृह नगर में लैंड पूलिंग कानून लाया गया,
फिर संघ और संतों के दबाव में वापस लिया गया।
यह बिना होमवर्क के नीति-निर्माण की मिसाल बन गया।
10 कर्ज़ का पहाड़, खाली खजाना
राज्य पर करीब 4.75 लाख करोड़ रुपये का कर्ज।
लाड़ली बहना जैसी योजनाओं के लिए फंड की कमी।
ठेकेदारों का भुगतान अटका, विकास कार्य ठप।
11 ‘उद्योग वर्ष 2025’ फ्लॉप शो
इन्वेस्टर समिट में MOU हुए,
लेकिन ज़मीन पर फैक्ट्रियां नहीं दिखीं।
इसे Jobless Growth कहा जा रहा है।
12 सबसे घातक तुलना: ‘मामा’ बनाम मोहन
आज भी गांवों में एक वाक्य गूंजता है—
“मामा अच्छे थे।”
शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता
मोहन यादव से आज भी ज्यादा है।
जब पूर्व सीएम ज्यादा लोकप्रिय हो जाए, तो मौजूदा सीएम की कुर्सी अपने आप हिलने लगती है।
निष्कर्ष: कुर्सी बचेगी या बदलेगा चेहरा?
12 मुद्दे, 12 विफलताएं।
सूत्रों का दावा है कि दिल्ली से अल्टीमेटम मिल चुका है।
RSS ने भी संकेत दे दिया है कि हालात नहीं सुधरे, तो
2028 तो दूर—आने वाले नगरीय निकाय चुनाव भी मुश्किल हो सकते हैं।
अब सवाल यही है—
क्या 12 छेदों वाली नाव को डूबने से बचाया जा सकता है?
फैसला जनता करेगी।
हम सिर्फ सच सामने रख रहे हैं।
देखते रहिए Akhileaks
हम वो बताते हैं, जो वो छिपाते हैं।
जय हिन्द।



