वीज़ा की राजनीति: सुपरपावर की जंग
आज की पड़ताल — वीज़ा की राजनीति यह सिर्फ़ इमिग्रेशन की कहानी नहीं है। यह कहानी है — सुपरपावर की जंग की।
जहाँ वीज़ा अब सिर्फ़ कागज़ नहीं, बल्कि 21वीं सदी का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।
अमेरिका का सख़्त कदम: H-1B हुआ महँगा
21 सितंबर, वाशिंगटन डीसी।
व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक आदेश पर साइन किया।
परिणाम?
H-1B वीज़ा फीस आसमान पर पहुँची।
पहले: करीब ₹6 लाख में तीन साल।
अब: $1 लाख (₹88 लाख) सिर्फ़ तीन साल के लिए।
छह साल रहना है? खर्चा ₹5 करोड़ से ऊपर।
यानी अब अमेरिका का संदेश साफ़ है —
“America First। अवसर अब सिर्फ़ अमीरों के लिए।”
चीन का पलटवार: K-वीज़ा
अमेरिका की दीवार के ठीक बाद, बीजिंग से आया एक बड़ा ऐलान:
1 अक्टूबर 2025 से लॉन्च होगा K-वीज़ा।
यह कोई आम वीज़ा नहीं, बल्कि सीधा H-1B का जवाब है।
K-वीज़ा की खासियत
कोई कंपनी का ऑफर लेटर नहीं चाहिए
कोई स्पॉन्सरशिप नहीं चाहिए
सिर्फ़ आपकी योग्यता, शिक्षा और अनुभव ही गारंटी है
अमेरिका में पैसा मायने रखता है।
चीन में टैलेंट मायने रखेगा।
अमेरिका ने दीवार खड़ी की, चीन ने रास्ता खोल दिया।
चीन की रणनीति: ब्रेन गेन
पहले चीन में Z-वीज़ा और R-वीज़ा थे।
Z-वीज़ा: नौकरी बदलते ही वीज़ा बदलना पड़ता था।
R-वीज़ा: पेचीदा प्रक्रिया।
दोनों असफल रहे।
अब चीन का मकसद है:
2035 तक टेक्नोलॉजी का सुपरपावर बनना।
इसके लिए चीन ने दो नए प्रोग्राम साथ शुरू किए:
1. Talented Young Scientist Program – एशिया-अफ्रीका से आने वाले रिसर्चरों के लिए (45 साल तक)।
2. Outstanding Young Scientist Fund – टॉप इंजीनियरों और वैज्ञानिकों के लिए (40 साल तक)।
मकसद एक: दुनिया का ब्रेन चीन की झोली में।
ब्रिटेन की चाल: टैलेंट फ्री
ब्रिटेन भी पीछे नहीं।
उसने ग्लोबल टैलेंट वीज़ा फीस खत्म करने की तैयारी की।
पहले फीस: ₹90,000
अब: टॉप 5 यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट या इंटरनेशनल अवॉर्ड विजेता → फ्री एंट्री
अमेरिका कह रहा है — “पैसे दो, तभी आओ।”
चीन और ब्रिटेन कह रहे हैं — “बस टैलेंट लाओ, पैसे की ज़रूरत नहीं।”
भारत पर असर
H-1B वीज़ा का सबसे बड़ा लाभार्थी हमेशा भारत रहा है।
आईटी सेक्टर
मेडिकल सेक्टर
इंजीनियरिंग
हर साल लाखों भारतीय युवा अमेरिका जाते थे।
लेकिन अब?
₹88 लाख फीस हर किसी के बस की बात नहीं।
लाखों परिवारों का सपना टूटेगा।
भारत सरकार भी मान रही है —
यह सिर्फ़ इकोनॉमिक असर नहीं, बल्कि मानवीय असर भी है।
क्या होगा अब?
अब असली सवाल है:
क्या भारतीय टैलेंट चीन और ब्रिटेन की ओर जाएगा?
अगर हाँ, तो क्या अमेरिका की टेक-सुपरपावर की पोज़िशन खतरे में नहीं आ जाएगी?
क्या सिलिकॉन वैली का वर्चस्व अब बीजिंग और शंघाई की लैब्स में शिफ्ट होगा?
सोचिए, IIT या IISc का टॉपर अब अमेरिका नहीं जाएगा।
वह K-वीज़ा चुन सकता है।
क्योंकि उसे न करोड़ों खर्च करने होंगे और न किसी कंपनी का गुलाम बनना होगा।
भारत की चुनौती
अमेरिका दीवार बना रहा है।
चीन पुल बना रहा है।
ब्रिटेन बीच का रास्ता चुन रहा है।
भारत?
सिर्फ़ देख रहा है।
क्या भारत अपने टैलेंट को रोक पाएगा?
क्या भारत कोई ‘इंडियन टैलेंट वीज़ा’ ला सकता है?
या फिर भारत का टैलेंट चीन और ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन जाएगा?
तस्वीर साफ़ है:
अमेरिका → टैलेंट को रोककर पैसा कमाना चाहता है।
चीन → टैलेंट को अपनाकर सुपरपावर बनना चाहता है।
ब्रिटेन → टैलेंट को खींचकर दोनों से फायदा लेना चाहता है।
भारत → अब भी सोच रहा है।
जो देश टैलेंट को अपनाएगा, वही 21वीं सदी का असली सुपरपावर बनेगा।
अमेरिका ने गलती से दरवाज़ा बंद कर दिया।
अब देखना यह है —
भारत का टैलेंट किस दरवाज़े से गुज़रता है?
बीजिंग? लंदन? या फिर भारत खुद अपना दरवाज़ा खोलेगा?
यह रिपोर्ट Akhileaks.com की विशेष पड़ताल है।



