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मध्यप्रदेश में सत्ता के दो ध्रुव: मोहन यादव बनाम अनुराग जैन

प्रस्तावना: सत्ता का असली मालिक कौन?

मध्यप्रदेश की राजनीति और प्रशासन में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यही है — राज्य की असली कमान किसके हाथ में है?
एक तरफ़ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, जिनके पास संवैधानिक सत्ता है।
और दूसरी तरफ़ मुख्य सचिव अनुराग जैन, जिनके पास प्रशासनिक पकड़ और दिल्ली दरबार का भरोसा है।

भिंड की हालिया घटना ने इस टकराव को सतह पर ला दिया।

भिंड का मामला: कलेक्टर की दबंगई बनाम विधायक की राजनीति

भिंड कलेक्टर संजय श्रीवास्तव पहले से विवादों में रहे हैं। कुछ दिन पहले ही उन्होंने एक छात्रा को थप्पड़ जड़ा था, और अब उन्होंने विधायक को फटकार लगा दी।
ये विधायक हैं नरेन्द्र कुशवाहा — राजनीति हमेशा अपनी शर्तों पर करने वाले नेता।
2003 से राजनीति में सक्रिय, और ज़रूरत पड़ी तो भाजपा को हराने के लिए समाजवादी पार्टी का टिकट ले लिया। यानी झुकने वाले नहीं।

कलेक्टर का उनसे टकराना सिर्फ़ व्यक्तिगत विवाद नहीं है। यह उस गहरी लड़ाई का प्रतीक है जिसमें जनप्रतिनिधि बनाम अफसरशाही आमने-सामने खड़ी है।

मुख्यमंत्री बनाम मुख्य सचिव: टकराव की असली कहानी

असल टकराव भोपाल से शुरू होता है।

मोहन यादव की पसंद: राजेश राजोरा और अशोक बर्नवाल जैसे अफसर।

दिल्ली का फैसला: अनुराग जैन का सीधा एक साल का एक्सटेंशन।

इतिहास में पहली बार किसी मुख्य सचिव को सीधे एक साल का कार्यकाल बढ़ाया गया है। अब वे अगस्त 2026 तक पद पर रहेंगे।

इससे साफ़ संदेश गया कि मुख्यमंत्री की पसंद से ज्यादा अहमियत दिल्ली दरबार की पसंद रखती है।

सिंहस्थ का उदाहरण: फैसला कहाँ होता है?

उज्जैन का सिंहस्थ 2028 राज्य का सबसे बड़ा आयोजन है।
लेकिन बैठक भोपाल में नहीं, दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह के निवास पर होती है।
पूरे अफसरशाही अमले को दिल्ली बुलाया जाता है — CS अनुराग जैन, ACS, DGP, कलेक्टर, कमिश्नर, सब शामिल।
मुख्यमंत्री मोहन यादव भी बैठते हैं, लेकिन अंतिम फैसला दिल्ली से आता है।

इससे बड़ा संकेत और क्या हो सकता है कि मध्यप्रदेश के पॉलिटिकल फैसले भी भोपाल में नहीं, बल्कि दिल्ली में लिखे जा रहे हैं।

असली चुनौती: विपक्ष नहीं, अफसरशाही

आज मोहन यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस नहीं है।
बल्कि सबसे बड़ी चुनौती है — अफसरशाही पर पकड़ बनाना।

इतिहास गवाह है कि जिस मुख्यमंत्री का नियंत्रण अफसरशाही पर कमजोर हो गया, उसकी राजनीतिक पकड़ भी ढीली हो गई।
और यहाँ तो हालात यह हैं कि मुख्यमंत्री को पकड़ बनाने ही नहीं दी जा रही।

जिम्मेदारी किसकी?

यह भी सच है कि मौजूदा हालातों के लिए मुख्यमंत्री मोहन यादव खुद ज़िम्मेदार हैं।
पिछले 20 महीनों में कई ऐसे फैसले और घटनाएँ हुईं जिन्होंने दिल्ली दरबार की नज़र में उनकी राजनीतिक साख को कमजोर किया।
नतीजा यह हुआ कि दिल्ली का भरोसा राजनीतिक नेतृत्व से खिसककर प्रशासनिक नेतृत्व पर टिक गया।

निष्कर्ष: दो ध्रुवों में बंटी सरकार

मध्यप्रदेश आज दो ध्रुवों में बंट चुका है।

पहला ध्रुव: मुख्यमंत्री मोहन यादव — राजनीतिक चेहरा।

दूसरा ध्रुव: मुख्य सचिव अनुराग जैन — प्रशासनिक ताक़त।

सवाल यही है — कौन ज्यादा ताक़तवर है?
जवाब सबको मालूम है: दिल्ली दरबार के भरोसेमंद अफसर।

और यही है इस दौर की सबसे कड़वी हकीकत —
मध्यप्रदेश में इस समय राजनीतिक सत्ता से ज्यादा अफसरशाही की सत्ता हावी है।

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