मध्यप्रदेश में ‘सुपर CM’ का उदय? मंत्रालय नहीं, बीजेपी कार्यालय बन गया सत्ता का असली केंद्र
एक्सक्लूसिव विश्लेषण — Akhileaks रिपोर्ट
मध्यप्रदेश में पिछले एक हफ्ते से एक तस्वीर बिल्कुल सामान्य दिखाई गई — मंत्री वल्लभ भवन के बजाय बीजेपी कार्यालय में बैठेंगे, कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगे और शिकायतें सुनेंगे। इसे नाम दिया गया “कार्यकर्ता संवाद।”
लेकिन राजनीति में जो नॉर्मल दिखता है — वही सबसे बड़ा एब्नॉर्मल होता है।
असल कहानी शुरू होती है 1 दिसंबर से लागू हुए उस रोस्टर सिस्टम से, जिसने पूरे सत्ता ढांचे की दिशा और गुरुत्वाकर्षण बदल दिया है। अब सोमवार से शुक्रवार तक मंत्री बीजेपी कार्यालय (दीनदयाल परिसर) में हाजिरी देंगे। मीडिया ने इसे “जनसुनवाई” बताया — लेकिन सत्ता विज्ञान कहता है:
यह सरकार के अधिकारों का अघोषित तख्तापलट है।
मंत्रियों की ‘क्लास’ और हेडमास्टर कौन?
पहले मंत्री राजा की तरह मंत्रालय में बैठते थे — कार्यकर्ता अर्जी लेकर बाहर इंतज़ार करता था।
अब दृश्य उल्टा हो गया है —
• कार्यकर्ता कुर्सी पर,
• मंत्री नोटबुक लेकर सामने,
• और सबसे ऊपर — प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल।
यह “जनसुनवाई” नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संदेश है:
सरकार में रहो, पर ऑक्सीजन पाइप संगठन के हाथ में है।
यह वही दिल्ली मॉडल है — जहाँ मंत्रियों को नियमित तौर पर याद दिलाया जाता है कि वे सत्ता गतिविधि हैं, लेकिन केंद्र सत्ता नहीं।
सूत्रों के अनुसार मंत्रियों की परफॉर्मेंस ACR अब
सीएम हाउस में नहीं, बल्कि
बीजेपी कार्यालय के बंद कमरों में तैयार होगी।
गुजरात मॉडल की री-शूट: भूपेंद्र पटेल → मोहन यादव | सी.आर. पाटिल → हेमंत खंडेलवाल
जो आज मध्यप्रदेश में हो रहा है — उसका ट्रेलर गुजरात में चल चुका है।
गुजरात में —
• मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल = सार्वजनिक चेहरा
• प्रदेश अध्यक्ष सी.आर. पाटिल = छुपी हुई असली शक्ति
अब मध्यप्रदेश में वही कॉपी लागू है:
• डॉ. मोहन यादव = सरकार का चेहरा
• हेमंत खंडेलवाल = पावर-सेंटर + रिमोट कंट्रोल
हेमंत खंडेलवाल अब सिर्फ संगठन नहीं चला रहे —
वे मंत्रियों का टाइम टेबल, अफसरों की दिशा और व्यवस्था का मूड तय कर रहे हैं।
इसलिए प्रश्न उठ रहा है —
क्या मध्यप्रदेश को उसका पहला “सुपर CM” मिल गया है?
सबसे बड़ा असर — ब्यूरोक्रेसी पर
भोपाल के वल्लभ भवन की लिफ्टों और कॉरिडोर में एक नया सवाल तैर रहा है:
“बॉस कौन है — मुख्यमंत्री या प्रदेश अध्यक्ष?”
क्योंकि:
पुरानी व्यवस्था नई व्यवस्था
अफसर मंत्री/सीएम से निर्देश लेते थे अफसर संगठन की नाराज़गी से डरने लगे
ट्रांसफर फाइल मंत्रालय से निकलती थी मंजूरी बीजेपी दफ्तर से मानी जा रही
पर्ची सिस्टम अनौपचारिक अब संस्थागत
अगर कलेक्टर–एसपी यह समझने लगें कि “असली सिफारिश/डांट” कहाँ से आती है
तो प्रशासन का विश्वास धीरे-धीरे सरकार से हटकर संगठन पर शिफ्ट होगा।
यही किसी भी सरकार के लिए सबसे संवेदनशील अलार्म पॉइंट होता है।
मोहन यादव की चुनौती: चेहरा बने रहें या शक्ति भी वापस लें?
सवाल जनता के मन में है —
इस व्यवस्था में मुख्यमंत्री कहाँ खड़े हैं?
क्या यह
• “कलेक्टिव लीडरशिप” है?
या
• “कंट्रोल एंड बैलेंस”?
या
• “वन-मैन शो को रोकने की रोकथाम”?
अगर पूरा मंत्रिपरिषद “रिपोर्ट कार्ड” लेकर हर हफ्ते संगठन के सामने बैठ सकता है,
तो जनता पूछ रही है:
क्या मुख्यमंत्री को भी हफ्ते में एक दिन बीजेपी कार्यालय में नहीं बैठना चाहिए?
अगर नहीं —
तो यह व्यवस्था जनता के लिए नहीं,
बल्कि मंत्रियों को नियंत्रित करने की रणनीति मानी जाएगी।
2027 की तैयारी अभी शुरू — टिकट के नए नियम
आने वाले विधानसभा चुनाव में
सिफारिशों का खेल, लॉबी की ताकत, विभागों के बजट — सब अप्रासंगिक होते दिख रहे हैं।
नई करंसी होगी —
“कितने घंटे कार्यकर्ताओं की बात सुनी?”
रजिस्टर एंट्री अब
सबसे मजबूत राजनीतिक दस्तावेज़ बन सकती है।
निष्कर्ष — दो तलवारें एक म्यान में?
मध्यप्रदेश की राजनीति का DNA बदल चुका है।
अब “सर्वेसर्वा” कोई नहीं है —
सिस्टम ही सर्वेसर्वा है।
मोहन यादव — सरकार का चेहरा
हेमंत खंडेलवाल — शक्ति का स्रोत
आगे कहानी दो दिशाओं में जा सकती है:
दोनों एक-दूसरे की रीढ़ बनें → सिस्टम स्थिर
या शक्ति टकराए → खटपट बाहर आने लगे
राजनीति की अगली लाइन इन दोनों के बीच लिखी जाएगी।
यह इन्वेस्टिगेशन जारी है।
संगठन–सरकार समीकरण, अफसरशाही की पलट, और 2027 के कैंडिडेट रोडमैप पर हम लगातार नज़र रखेंगे।



