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राज्यसभा का रण: ‘चाणक्य’ की वापसी या नरोत्तम का ‘नॉकआउट’ गेम?

मध्यप्रदेश की सियासत में 19 जून की तारीख अब सिर्फ एक चुनावी प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बनती जा रही है। राज्यसभा की तीन सीटों के लिए होने वाला चुनाव इस बार महज गणित का खेल नहीं बल्कि रणनीति, प्रबंधन और राजनीतिक चतुराई की असली परीक्षा बनता दिख रहा है।

अखिलीक्स के राजनीतिक गलियारों से मिल रही जानकारी के मुताबिक, इस चुनाव में जो सस्पेंस दिग्विजय सिंह के शुरुआती इनकार से शुरू हुआ था, वही अब उनके संभावित ‘कमबैक’ की चर्चा के साथ और गहरा हो गया है। सियासी जानकार मानते हैं कि दिग्विजय सिंह का शुरुआती ‘ना’ कहना एक रणनीतिक चाल भी हो सकती है। इसके जरिए उन्होंने पहले कांग्रेस के भीतर छिपी महत्वाकांक्षाओं को सामने आने का मौका दिया और अब परिस्थितियों के बीच खुद को एक अनिवार्य विकल्प के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।

दिग्विजय सिंह के पीछे हटने के संकेत मिलते ही कांग्रेस के भीतर दावेदारों की लंबी कतार सामने आ गई। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी अपनी राजनीतिक साख बचाने की कोशिश में हैं, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का अनुभव भी इस दौड़ में अहम माना जा रहा है। वहीं पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन को ‘दिल्ली की पसंद’ के तौर पर देखा जा रहा है, जो संगठन में एक संतुलन का संदेश दे सकती हैं।

लेकिन असली पेच कांग्रेस की सोशल इंजीनियरिंग में फंसा हुआ है। दलित प्रतिनिधित्व को लेकर प्रदीप अहिरवार और सज्जन सिंह वर्मा जैसे नेताओं की आवाजें तेज हो रही हैं। विंध्य क्षेत्र से कमलेश्वर पटेल और निमाड़ क्षेत्र से अरुण यादव भी अपने-अपने राजनीतिक आधार के साथ इस सीट पर दावा ठोक रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसे चुना जाए ताकि बाकी गुटों में असंतोष न भड़के।

दरअसल कांग्रेस की यह चिंता सिर्फ आंतरिक खींचतान तक सीमित नहीं है। इसके पीछे 2022 के राष्ट्रपति चुनाव की याद भी है, जिसने पार्टी को गहरा झटका दिया था। उस समय विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को मध्यप्रदेश से करीब 103 वोट मिलने की उम्मीद थी, लेकिन उन्हें महज 79 वोट ही मिले। इसका मतलब साफ था कि करीब 20 कांग्रेसी विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की थी और भाजपा के पक्ष में मतदान किया था। यह घटना आज भी कांग्रेस नेतृत्व के लिए एक चेतावनी की तरह मौजूद है।

राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए लगभग 58 वोटों का जादुई आंकड़ा जरूरी माना जाता है। ऐसे में अगर कांग्रेस के कुछ विधायक भी अनुपस्थित रहते हैं या पार्टी लाइन से अलग मतदान करते हैं, तो समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं। यही वजह है कि कांग्रेस इस सीट को ‘फिक्स’ मानकर भी पूरी तरह निश्चिंत नहीं है।

इसी राजनीतिक गणित के बीच भाजपा की रणनीति को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। अखिलीक्स के सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे खेल में एक नाम ‘डार्क हॉर्स’ के तौर पर तेजी से उभर रहा है—पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा। बताया जा रहा है कि उन्होंने दिल्ली नेतृत्व को यह भरोसा दिलाया है कि यदि भाजपा तीसरी सीट पर दांव खेलने का फैसला करती है, तो वे कांग्रेस के भीतर असंतोष को साधकर परिणाम पलट सकते हैं।

नरोत्तम मिश्रा को लंबे समय से मध्यप्रदेश भाजपा का कुशल रणनीतिकार माना जाता है। 2020 में कमलनाथ सरकार गिरने के पीछे भी उनकी राजनीतिक भूमिका को काफी अहम माना गया था। भाजपा के भीतर यह धारणा भी है कि कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं से संवाद स्थापित करने और राजनीतिक समीकरण बदलने की क्षमता मिश्रा के पास है।

हाल के दिनों में कांग्रेस के कई स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को भाजपा में शामिल कराने में भी नरोत्तम मिश्रा सक्रिय दिखे हैं। इससे पार्टी के भीतर उनका राजनीतिक कद और प्रभाव बढ़ता हुआ नजर आ रहा है।

यही कारण है कि अगर कांग्रेस अंततः दिग्विजय सिंह को उम्मीदवार बनाती है और भाजपा नरोत्तम मिश्रा पर दांव लगाती है, तो यह मुकाबला महज चुनाव नहीं बल्कि दो अनुभवी रणनीतिकारों की सीधी टक्कर बन सकता है। एक तरफ दिग्विजय सिंह की किलाबंदी और संगठनात्मक पकड़ होगी, तो दूसरी तरफ नरोत्तम मिश्रा का आक्रामक ‘मैनेजमेंट गेम’ देखने को मिल सकता है।

मध्यप्रदेश विधानसभा में भाजपा के पास फिलहाल 164 विधायक हैं, जिससे उसका गणित मजबूत दिखता है। लेकिन तीसरी सीट जीतने के लिए भाजपा को कांग्रेस में सेंध लगाने की जरूरत पड़ेगी। अगर 2022 जैसा क्रॉस वोटिंग का परिदृश्य दोहराया जाता है, तो यह चुनाव प्रदेश की राजनीति में एक नया मोड़ ला सकता है।

अब सबकी नजरें 19 जून पर टिकी हैं। यही दिन तय करेगा कि इस सियासी शतरंज में असली बाजीगर कौन साबित होता है—दिग्विजय सिंह की पुरानी ‘चाणक्य’ शैली या नरोत्तम मिश्रा का आक्रामक ‘नॉकआउट’ गेम। अखिलीक्स इस पूरे राजनीतिक मुकाबले के हर मोड़ पर नजर बनाए हुए है और आने वाले दिनों में इस चुनाव से जुड़े हर नए समीकरण और अंदरूनी रणनीति को आपके सामने लाता रहेगा।

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