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M-G-S पे-कोड का पर्दाफाश: स्कूल शिक्षा विभाग के ₹100 करोड़ के महाघोटाले की इनसाइड स्टोरी

नमस्कार, मैं हूँ अखिलेश सोलंकी और आप पढ़ रहे हैं अखिलीक्स, जहाँ हम खबर नहीं बल्कि खबर के पीछे की सच्चाई सामने लाते हैं। आज की कहानी किसी एक स्कूल, किसी एक टेंडर या किसी एक अफसर की नहीं है, बल्कि उस पूरे सिस्टम की है जिसे समझने के बाद आप ये सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि क्या वाकई हमारे बच्चों की शिक्षा सिर्फ किताबों तक सीमित है या फिर वो भी भ्रष्टाचार की इस बड़ी प्रयोगशाला का हिस्सा बन चुकी है। मध्य प्रदेश का स्कूल शिक्षा विभाग इस वक्त सवालों के घेरे में है क्योंकि एक तरफ 100 करोड़ का टेंडर रद्द किया जाता है और दूसरी तरफ 149 करोड़ की जाँच शुरू होती है, और ऊपर से यह मैसेज दिया जाता है कि सरकार ने सख्त कार्रवाई की है, लेकिन अखिलीक्स की पड़ताल कहती है कि यह कार्रवाई नहीं बल्कि डैमेज कंट्रोल है, क्योंकि असली कहानी उन फाइलों में छिपी है जहाँ से इस पूरे खेल की स्क्रिप्ट लिखी जाती है।
इस पूरी व्यवस्था को समझने के लिए आपको उन तीन अक्षरों को समझना होगा जो इस सिस्टम की असली चाबी हैं, और ये हैं M, G और S, जो किसी व्यक्ति के नाम नहीं बल्कि एक ऐसे रेट-कार्ड का हिस्सा हैं जो हर बड़े टेंडर के पहले तय होता है। फाइल आगे बढ़ने से पहले यह तय हो जाता है कि M का हिस्सा कितना होगा, उसके बाद G की भूमिका शुरू होती है जो ऊपर और नीचे की कड़ियों को जोड़ता है और सुनिश्चित करता है कि पैसा सही जगह तक पहुँचे, और फिर आता है S जो इस पूरे नेटवर्क की रीढ़ है और जिसके बिना कोई डील पूरी नहीं होती, लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि S का एक बड़ा हिस्सा सीधे ऊपर तक जाता है जिसे सिस्टम के अंदर प्रोटेक्शन मनी कहा जाता है ताकि कोई भी बड़ी जाँच इस नेटवर्क को तोड़ने की हिम्मत न कर सके।
अब जरा इस पूरे खेल का गणित समझिए क्योंकि यही गणित इस घोटाले की असली ताकत है, जब किसी टेंडर में करोड़ों रुपये का बजट होता है तो उसमें से पहले M, G और S का हिस्सा निकाला जाता है, उसके बाद ऊपर तक जाने वाला प्रीमियम अलग किया जाता है और जब इतना पैसा पहले ही कट चुका होता है तो असली काम के लिए बचता क्या है, और यहीं से शुरू होती है वह इंजीनियरिंग जिसमें काम की गुणवत्ता को जानबूझकर गिराया जाता है और करीब 30 प्रतिशत का नेट प्रॉफिट निकाला जाता है, यह वही पैसा है जो सिस्टम के खास लोगों यानी DB तक पहुँचता है, और यही DB आज भोपाल की सड़कों पर महंगी गाड़ियों में घूमते दिखाई देते हैं जबकि उसी राज्य में स्कूलों की छतें टपक रही हैं और बच्चों के पास बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं।
यह पूरा टेंडर सिस्टम बाहर से देखने में जितना पारदर्शी लगता है, अंदर से उतना ही सेटिंग वाला है क्योंकि फाइल बनने से पहले ही तय हो जाता है कि कौन सी फर्म काम करेगी, कागजों पर भले ही तीन कंपनियों के नाम दिखाए जाएं लेकिन असल में उनका कंट्रोल एक ही हाथ में होता है, और ये लोग इतने प्रोफेशनल तरीके से खेल खेलते हैं कि 30 करोड़ के काम को कागजी प्रक्रिया के जरिए 90 करोड़ या उससे भी ज्यादा तक पहुंचा देते हैं, और अगर कभी कोई ईमानदार अधिकारी बीच में आ जाए या जांच का खतरा पैदा हो जाए तो उसके लिए भी बैकअप प्लान तैयार रहता है जिसमें एक मैनेजमेंट फंड रखा जाता है ताकि जरूरत पड़ने पर 1 या 2 करोड़ खर्च करके रास्ते के हर पत्थर को हटाया जा सके।
सबसे खतरनाक बात यह है कि यह सिर्फ एक विभाग की कहानी नहीं है बल्कि एक ट्रेंड है जो धीरे-धीरे पूरे सिस्टम में फैलता जा रहा है, क्योंकि अब इस सिंडिकेट की नजर ट्राइबल प्रोजेक्ट्स और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर है जहाँ पैसा और भी ज्यादा है और निगरानी अपेक्षाकृत कम है, और अगर यही पैटर्न वहां भी लागू हुआ तो नुकसान सिर्फ वित्तीय नहीं बल्कि सामाजिक भी होगा क्योंकि इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो पहले से ही व्यवस्था के हाशिये पर खड़े हैं।
सरकार की तरफ से अफसरों के ट्रांसफर और विभागीय बदलाव को एक सख्त कार्रवाई के तौर पर पेश किया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ चेहरों को बदल देने से सिस्टम बदल जाता है, क्योंकि अगर उस पे-कोड को नहीं तोड़ा गया जो इस पूरे नेटवर्क की रीढ़ है और जिसकी जड़ें भोपाल से आगे तक फैली हुई हैं, तो फिर यह लूट रुकने वाली नहीं है बल्कि और संगठित होती जाएगी।
अखिलीक्स की यह पड़ताल यहीं खत्म नहीं होती क्योंकि हम हर उस फाइल का पीछा करेंगे जिसमें जनता के पैसे की कहानी छिपी है, हम उन सवालों को उठाते रहेंगे जिन्हें दबाने की कोशिश की जाती है, क्योंकि यह सिर्फ एक खबर नहीं बल्कि एक जिम्मेदारी है, और अब सवाल आपसे है कि क्या आपको लगता है कि M, G और S का यह सिंडिकेट कभी टूट पाएगा या फिर यह सिस्टम ऐसे ही चलता रहेगा, अपनी राय जरूर बताइए क्योंकि आपकी आवाज ही इस कहानी का अगला अध्याय लिखेगी।
मैं हूँ अखिलेश सोलंकी, पढ़ते रहिए अखिलीक्स, जहाँ सच को दबाया नहीं जाता बल्कि सामने लाया जाता है, जय हिंद।

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