निगम-मंडलों का ‘पावर गेम’: महाराज की घेराबंदी या संघ का अनुशासन?
नमस्कार, मैं हूँ अखिलेश सोलंकी और आप पढ़ रहे हैं अखिलीक्स, जहाँ हम खबर नहीं बल्कि खबर के पीछे की सच्चाई सामने लाते हैं। मध्य प्रदेश की राजनीति इस वक्त एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ सत्ता की चमक से ज्यादा संगठन का अनुशासन भारी पड़ता दिखाई दे रहा है। पिछले 48 घंटों में भोपाल में जो कुछ हुआ है उसने साफ संकेत दे दिया है कि 2028 की बिसात अभी से बिछाई जा रही है और इस बिसात में मोहरे सिर्फ चेहरे नहीं बल्कि विचारधारा तय करेगी।
मुख्यमंत्री आवास में हुई करीब दो घंटे की उस अहम बैठक को अगर आप सिर्फ एक रूटीन समीक्षा मान रहे हैं तो आप बहुत बड़ी तस्वीर मिस कर रहे हैं, क्योंकि इस बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने सिर्फ फाइलें नहीं देखीं बल्कि सत्ता और संगठन के बीच की नई लक्ष्मण रेखा खींची है। इसी बैठक के तुरंत बाद यह खबर सामने आती है कि निगम-मंडलों की सूची अब RSS के शारदा विहार वाले फिल्टर से होकर गुजरेगी और यहीं से शुरू होता है असली पावर गेम।
इस पूरे विवाद की जड़ में वे पांच नाम हैं जिन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया ने खुद आगे बढ़ाया है और सिंधिया का तर्क भी सीधा और राजनीतिक तौर पर मजबूत है कि जिन लोगों ने 2020 में उनके साथ आकर अपनी विधायकी और मंत्री पद दांव पर लगाए थे उन्हें अब उसका राजनीतिक प्रतिफल मिलना चाहिए, लेकिन बीजेपी के भीतर एक मजबूत धड़ा इस लॉजिक को स्वीकार करने के मूड में नहीं है और वह साफ मानता है कि चुनाव हार चुके नेताओं को सत्ता में एडजस्ट करना जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ अन्याय होगा और इससे पार्टी का कोर कैडर कमजोर पड़ेगा।
यहीं पर कहानी एक नया मोड़ लेती है जब जयभान सिंह पवैया की वित्त आयोग में नियुक्ति को एक सियासी मैसेज के तौर पर देखा जाने लगता है, क्योंकि यह सिर्फ एक पद नहीं बल्कि एक संकेत है कि पार्टी अब सिंधिया खेमे को बैलेंस करने की रणनीति पर काम कर रही है और ग्वालियर-चंबल जैसे इलाकों में पुराने संगठन के चेहरों को फिर से सक्रिय किया जा रहा है ताकि किसी एक नेता का प्रभाव निर्णायक न हो सके।
शनिवार को हुई 120 मिनट की बैठक का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह निकलकर सामने आता है कि अब निगम-मंडलों की नियुक्तियां और प्रदेश कार्यसमिति का गठन एक साथ किया जाएगा और यह फैसला अपने आप में यह बताता है कि बीजेपी अब सत्ता और संगठन को अलग-अलग नहीं बल्कि एक कॉम्बो मॉडल में चलाने जा रही है, जहाँ नियुक्तियां सिर्फ राजनीतिक संतुलन के आधार पर नहीं बल्कि संगठनात्मक स्वीकार्यता के आधार पर तय होंगी।
हेमंत खंडेलवाल का यह स्पष्ट संदेश कि विचारधारा से कोई समझौता नहीं होगा दरअसल उन नेताओं के लिए एक सीधी चेतावनी है जो पैराशूट के जरिए पार्टी में आए हैं और जिन्हें अब तक आसान रास्ता मिलता रहा है, क्योंकि अब पार्टी का फोकस फिर से उन कार्यकर्ताओं पर जा रहा है जिन्होंने वर्षों तक संगठन को जमीन पर खड़ा रखा है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प सवाल भोपाल और इंदौर विकास प्राधिकरणों के पदों को लेकर उठ रहा है जो पहली सूची से गायब बताए जा रहे हैं और यह गायब होना कोई सामान्य प्रशासनिक देरी नहीं बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, क्योंकि ये दोनों शहर सिर्फ प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक और आर्थिक नियंत्रण के बड़े केंद्र हैं और इन्हें फिलहाल होल्ड पर रखना यह संकेत देता है कि इन पदों पर अंतिम फैसला किसी बड़े समीकरण के तहत होगा।
अब निगाहें टिक गई हैं 4 और 5 अप्रैल को होने वाली उस अहम बैठक पर जो भोपाल के शारदा विहार में होने जा रही है, जहाँ RSS के बड़े चेहरे मनमोहन वैद्य और दीपक विस्पुते मौजूद रहेंगे और यही वह मंच होगा जहाँ यह तय होगा कि निगम-मंडलों की नियुक्तियां गुटीय संतुलन के आधार पर होंगी या विचारधारा और संगठन की कसौटी पर, क्योंकि संघ का स्पष्ट मानना है कि नियुक्तियां ऐसी होनी चाहिए जो जमीनी कार्यकर्ताओं को ऊर्जा दें न कि सिर्फ राजनीतिक समझौतों का परिणाम बनें।
बीजेपी के भीतर बदलते इस समीकरण को अगर बड़े फ्रेम में देखा जाए तो यह साफ नजर आता है कि पार्टी अब सिंधिया डिपेंडेंट राजनीति से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है, क्योंकि 2020 में जो मजबूरी थी वह 2026 तक आते-आते विकल्पों में बदल चुकी है और अब सिंधिया पार्टी के एक महत्वपूर्ण चेहरे जरूर हैं लेकिन पूरी रणनीति का केंद्र नहीं हैं।
हेमंत खंडेलवाल का दिल्ली जाकर अमित शाह को रिपोर्ट देना यह भी बताता है कि अंतिम मुहर भले ही दिल्ली में लगे लेकिन उसकी स्क्रिप्ट नागपुर और भोपाल के बीच तैयार हो रही है और यही नया पावर स्ट्रक्चर है जिसमें संगठन की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा मजबूत होती दिखाई दे रही है।
इस पूरे घटनाक्रम का लब्बोलुआब यही है कि मध्य प्रदेश की राजनीति अब महलों से निकलकर संगठन के दफ्तरों में शिफ्ट हो रही है और आने वाले समय में जो भी नियुक्तियां होंगी उनमें किसी एक नेता की छाप कम और संगठन और संघ की छाप ज्यादा दिखाई देगी, जबकि भोपाल और इंदौर जैसे बड़े पदों का रुकना यह संकेत दे रहा है कि अभी कई बड़े नामों पर अंतिम फैसला बाकी है और कुछ नाम ऐसे भी हो सकते हैं जिनका पत्ता आखिरी वक्त में कट जाए।
अब सवाल आपसे है कि क्या राजनीति में वफादारी का इनाम मिलना चाहिए या फिर संगठन और विचारधारा को ही अंतिम पैमाना मानना चाहिए, अपनी राय जरूर दीजिए क्योंकि यही लोकतंत्र की असली ताकत है।
मैं हूँ अखिलेश सोलंकी, पढ़ते रहिए अखिलीक्स, जहाँ हम राजनीति की हर परत को उघाड़ते हैं, जय हिंद।



