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मध्य प्रदेश की पॉलिटिकल कहानी – अध्याय 2

जब दिल्ली की पसंद और भोपाल की ज़िद टकराई

मध्य प्रदेश की राजनीति का इतिहास सिर्फ चुनावों और सरकारों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह सत्ता, प्रभाव और रणनीति के उन जटिल समीकरणों की कहानी है, जिनमें कभी भोपाल की ज़मीन भारी पड़ती है तो कभी दिल्ली का हाईकमान। अखिलेश लीक्स की इस विशेष श्रृंखला “मध्य प्रदेश की पॉलिटिकल कहानी” के दूसरे अध्याय में हम उस दौर की चर्चा कर रहे हैं, जब प्रदेश की सत्ता का असली संघर्ष शुरू हुआ था—दिल्ली की पसंद बनाम भोपाल की ज़मीन।
पहले अध्याय में हमने बताया था कि किस तरह मध्य प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल ने राज्य की राजनीतिक नींव मजबूत की। लेकिन उनके अचानक निधन ने सत्ता के गलियारों में एक बड़ा वैक्यूम पैदा कर दिया। यह ऐसा शून्य था जिसने कांग्रेस के भीतर कई महत्वाकांक्षी नेताओं को सक्रिय कर दिया। सवाल सिर्फ यह नहीं था कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, बल्कि यह भी था कि फैसला भोपाल करेगा या दिल्ली।

दिल्ली की पहली पसंद: तखतमल जैन
रविशंकर शुक्ल के निधन के बाद सत्ता के गलियारों में एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में था—तखतमल जैन। वे प्रशासनिक रूप से मजबूत माने जाते थे, शुक्ल कैबिनेट में नंबर दो की स्थिति रखते थे और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि वे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पसंद थे। उस दौर में नेहरू का कद इतना बड़ा था कि उनकी राय को लगभग अंतिम माना जाता था।
लेकिन राजनीति हमेशा सीधी रेखा में नहीं चलती। कांग्रेस के भीतर एक ऐसा गुट भी था जो दिल्ली से थोपे गए नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। शुक्ल के समर्थकों को यह डर था कि यदि तखतमल जैन मुख्यमंत्री बनते हैं, तो सत्ता का पूरा समीकरण बदल जाएगा और प्रदेश संगठन का प्रभाव कम हो जाएगा।

भोपाल का पहला ‘मूक विद्रोह’
इसी असंतोष ने कांग्रेस के भीतर एक अप्रत्याशित कदम को जन्म दिया। बिना दिल्ली के अंतिम फैसले का इंतज़ार किए भगवंत राव मंडलोई को मुख्यमंत्री बना दिया गया। यह सिर्फ एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं थी, बल्कि भोपाल की तरफ से दिल्ली के “हाईकमान कल्चर” को दिया गया पहला मूक जवाब था।
इंदौर में कांग्रेस का अधिवेशन होना था और प्रदेश नेतृत्व चाहता था कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहले से उनका अपना व्यक्ति बैठा हो। इसलिए राजनीतिक रणनीति के तहत मंडलोई को तत्काल मुख्यमंत्री बना दिया गया। हालांकि यह प्रयोग ज्यादा समय तक नहीं चल पाया।

सिर्फ 21 दिन की सरकार
भगवंत राव मंडलोई मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन उनका कार्यकाल केवल 21 दिनों तक ही चल पाया। उस दौर में नेहरू की राजनीतिक हैसियत इतनी बड़ी थी कि उनकी पसंद को लंबे समय तक नजरअंदाज करना लगभग असंभव था। नेहरू चाहते थे कि नवगठित और विशाल मध्य प्रदेश की कमान किसी ऐसे नेता के हाथ में हो जो गुटबाजी से ऊपर हो और केंद्र के साथ बेहतर तालमेल रख सके।
यहीं से मध्य प्रदेश की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ आया—डॉ. कैलाशनाथ काटजू की ‘पैराशूट लैंडिंग’।

पैराशूट मुख्यमंत्री: डॉ. कैलाशनाथ काटजू
डॉ. कैलाशनाथ काटजू उस दौर के बड़े और प्रतिष्ठित नेता थे। वे केंद्रीय मंत्री रह चुके थे, विद्वान थे और नेहरू के बेहद करीबी माने जाते थे। लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वे मध्य प्रदेश की ज़मीन, यहां के जिलों और कार्यकर्ताओं से लगभग अनजान थे।
यही कारण था कि उनके मुख्यमंत्री बनने के साथ ही प्रदेश की राजनीति में पहली बार “स्थानीय बनाम बाहरी” की बहस तेज हो गई। कई कांग्रेस कार्यकर्ताओं को लगा कि दिल्ली ने प्रदेश की राजनीतिक वास्तविकताओं को नजरअंदाज करते हुए एक बाहरी नेता को मुख्यमंत्री बना दिया है।

किस्सों में याद किया जाने वाला कार्यकाल
कैलाशनाथ काटजू का कार्यकाल विकास योजनाओं से ज्यादा उन दिलचस्प किस्सों के लिए याद किया जाता है जो आज भी राजनीतिक गलियारों में सुनाए जाते हैं। कहा जाता है कि उम्र के प्रभाव और उनके स्वभाव के कारण कई बार वे बैठकों में लोगों को पहचानने में भूल कर जाते थे।
एक लोकप्रिय किस्सा यह भी सुनाया जाता है कि एक बार कैबिनेट बैठक के दौरान उन्हें याद दिलाना पड़ा कि उनके सामने बैठे व्यक्ति उनके अपने गृह मंत्री हैं। कई बार वे फाइल पढ़ते समय यह भी भूल जाते थे कि मामला किस विभाग से संबंधित है।
इन घटनाओं का असर प्रशासन पर भी पड़ा। नौकरशाही और दिल्ली में बैठे उनके समर्थक नेताओं ने इस स्थिति का फायदा उठाया। धीरे-धीरे यह धारणा बनने लगी कि सरकार भोपाल से नहीं बल्कि दिल्ली के संकेतों पर चल रही है।
फिर भी नेहरू के संरक्षण की वजह से काटजू ने लगभग पाँच साल का कार्यकाल पूरा किया। यह उस दौर की कांग्रेस संस्कृति को भी दिखाता है, जहां नेतृत्व के प्रति निष्ठा को कई बार प्रशासनिक क्षमता से अधिक महत्व दिया जाता था।

1962 का चुनाव और बड़ा झटका
मध्य प्रदेश की राजनीति में असली झटका 1962 के विधानसभा चुनाव में लगा। कांग्रेस राज्य में चुनाव तो जीत गई, लेकिन मुख्यमंत्री कैलाशनाथ काटजू अपनी ही सीट हार गए। जावरा विधानसभा सीट पर उन्हें जनसंघ के युवा नेता डॉ. लक्ष्मीनारायण पांडे ने पराजित कर दिया।
एक सिटिंग मुख्यमंत्री की हार ने दिल्ली की राजनीति में हलचल मचा दी। यह सिर्फ व्यक्तिगत हार नहीं थी, बल्कि यह संकेत भी था कि प्रदेश की राजनीति अब बदल रही है और स्थानीय असंतोष खुलकर सामने आ रहा है।

मंडलोई की वापसी और सियासी साया
हार के बाद काटजू ने उपचुनाव जीतकर वापसी की कोशिश की, लेकिन तब तक प्रदेश का राजनीतिक माहौल बदल चुका था। प्रदेश संगठन और विधायकों का बड़ा वर्ग अब दिल्ली के आदेशों को बिना सवाल स्वीकार करने के मूड में नहीं था।
इस बीच भगवंत राव मंडलोई एक बार फिर मुख्यमंत्री बने। हालांकि उनके इस कार्यकाल पर हमेशा एक आरोप का साया रहा—यह कि काटजू की चुनावी हार के पीछे कहीं न कहीं मंडलोई खेमे की रणनीति भी काम कर रही थी। यह आरोप भले ही कभी साबित नहीं हुआ, लेकिन उस दौर की सियासत में यह चर्चा लंबे समय तक चलती रही।

सियासत के चाणक्य का उदय
यहीं से मध्य प्रदेश की राजनीति में एक नए और बेहद प्रभावशाली नेता का उदय हुआ—द्वारिका प्रसाद मिश्रा। उन्हें प्रदेश की राजनीति का “लौह पुरुष” और “चाणक्य” कहा जाता है।
डीपी मिश्रा और जवाहरलाल नेहरू के बीच संबंध हमेशा सहज नहीं रहे। 1950 के दशक में दोनों के बीच गंभीर मतभेद हुए और मिश्रा ने कांग्रेस छोड़ दी थी। लेकिन राजनीति में उनकी वापसी बेहद रणनीतिक और प्रभावशाली रही।

दिल्ली बनाम विधायक – मिश्रा की रणनीति
जब कामराज योजना के तहत भगवंत राव मंडलोई को हटाया गया, तो नेहरू ने एक बार फिर कैलाशनाथ काटजू का नाम आगे बढ़ाया। लेकिन इस बार डीपी मिश्रा ने अलग रणनीति अपनाई।
उन्होंने सीधे तौर पर दिल्ली के फैसले को चुनौती देने के बजाय “विधायकों की राय” का कार्ड खेला। उन्होंने यह संदेश दिया कि मुख्यमंत्री का फैसला प्रदेश के निर्वाचित प्रतिनिधियों को करना चाहिए। इस रणनीति ने दिल्ली की राजनीति को असहज कर दिया और यह साबित कर दिया कि यदि किसी नेता की ज़मीनी पकड़ मजबूत हो, तो हाईकमान की नापसंदगी भी उसके रास्ते में बड़ी बाधा नहीं बन सकती।

सत्ता संघर्ष की शुरुआत
इस पूरे घटनाक्रम ने मध्य प्रदेश की राजनीति में एक नई परंपरा की शुरुआत की—दिल्ली बनाम भोपाल का सत्ता संघर्ष। यह वही संघर्ष है जो समय-समय पर अलग-अलग रूपों में दिखाई देता रहा है। कभी मुख्यमंत्री चयन में, कभी संगठन के फैसलों में और कभी प्रदेश बनाम केंद्र की शक्ति संतुलन की बहस में।

अगले अध्याय में…
मध्य प्रदेश की इस राजनीतिक यात्रा का अगला अध्याय और भी दिलचस्प है। इसमें हम विस्तार से चर्चा करेंगे द्वारिका प्रसाद मिश्रा के राजनीतिक उदय और उनकी रणनीतियों की, जिन्होंने न केवल मध्य प्रदेश बल्कि राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया।
कैसे डीपी मिश्रा ने अपनी चालों से प्रदेश की सत्ता समीकरण बदले और इंदिरा गांधी के दौर में दिल्ली की राजनीति को भी प्रभावित किया—यह कहानी हम अगले अध्याय में बताएंगे।
अगर आपको मध्य प्रदेश की राजनीति पर यह गहरी पड़ताल पसंद आ रही है, तो अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।
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