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यूपी 2027 की गुप्त बिसात: मायावती का ‘हाथी’, शाह का ‘बंगला’ और योगी पर ‘चेक’

​उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों एक ऐसा खामोश भूकंप आया है, जिसकी धमक लखनऊ के गलियारों से ज्यादा दिल्ली के सत्ता केंद्रों में महसूस की जा रही है। ‘अखिलीक्स’ की इस विशेष पड़ताल में हम उस पर्दे के पीछे की कहानी को उजागर कर रहे हैं, जिसे अक्सर मुख्यधारा की मीडिया नजरअंदाज कर देती है। बसपा प्रमुख मायावती ने आगामी चुनाव अकेले लड़ने का जो ऐलान किया है, वह अखिलेश यादव की ‘पुरानी दोस्ती’ की गुगली पर सिर्फ एक छक्का भर नहीं है। दरअसल, यह 2027 के उस महायुद्ध की विधिवत शुरुआत है, जिसकी पटकथा 2029 की प्रधानमंत्री पद की रेस को ध्यान में रखकर लिखी जा रही है। इस पूरी बिसात के पीछे एक ‘अदृश्य हाथ’ की चर्चा जोरों पर है, जिसने मायावती को दिल्ली के पॉश इलाके में न केवल टाइप-8 बंगला दिलवाया, बल्कि उन्हें चुनावी मैदान में अकेले उतरने का राजनीतिक हौसला भी दिया है।

​ऐतिहासिक रूप से मायावती को हल्के में लेना उनके विरोधियों की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई है। साल 2007 का वह दौर आज भी जेहन में ताजा है, जब उन्होंने सतीश चंद्र मिश्रा के साथ मिलकर ‘दलित-ब्राह्मण’ सोशल इंजीनियरिंग का ऐसा अजेय फॉर्मूला तैयार किया था, जिसने उत्तर प्रदेश को पूर्ण बहुमत की सरकार दी थी। आज एक बार फिर सूबे में वैसी ही सुगबुगाहट देखने को मिल रही है। उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण वर्ग वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है। हालिया UGC-NET विवाद और आरक्षण को लेकर बढ़ती हलचल ने सवर्णों के भीतर एक बेचैनी पैदा की है। मायावती इस नब्ज को बखूबी पहचानती हैं। उन्हें पता है कि यदि वे मजबूती से अकेले चुनाव लड़ती हैं, तो वे सत्ताधारी दल से नाराज ब्राह्मणों के लिए एक ‘सुरक्षित, अनुभवी और विश्वसनीय’ विकल्प के रूप में उभर सकती हैं। ‘हाथी’ पर ‘गणेश’ को फिर से बिठाने की यह कवायद 2027 के चुनावी नतीजों को पूरी तरह पलट सकती है।
​इस सियासी ड्रामे का सबसे दिलचस्प अध्याय दिल्ली का वह ‘टाइप-8’ बंगला है, जिसने कयासों के बाजार को गर्म कर दिया है। लुटियंस दिल्ली के सबसे वीआईपी इलाके में मायावती को यह आलीशान ठिकाना मिलना महज एक प्रशासनिक संयोग नहीं हो सकता। राजनीति के जानकारों का मानना है कि सत्ता के गलियारों में ‘उपहार’ हमेशा एक गहरे ‘संदेश’ के साथ आते हैं। यह सीधा संकेत है कि दिल्ली का केंद्रीय नेतृत्व और मायावती के बीच संवाद के रास्ते (Communication Lines) पूरी तरह खुले हुए हैं। यह दरअसल भाजपा का ‘प्लान-बी’ नजर आता है; यदि सत्ता विरोधी लहर या सवर्णों की नाराजगी से भाजपा को नुकसान होता है, तो केंद्रीय नेतृत्व चाहेगा कि वह वोट सपा के पाले में जाने के बजाय बसपा के पास रुके। सरल शब्दों में कहें तो, मायावती का मजबूत होना सीधे तौर पर ‘INDIA’ गठबंधन की संभावनाओं पर प्रहार करना है।

​यहाँ से कहानी एक ऐसे मोड़ पर मुड़ती है जहाँ अमित शाह बनाम योगी आदित्यनाथ की वह ‘अदृश्य जंग’ दिखाई देती है, जिसे हर कोई महसूस तो करता है लेकिन कोई खुलकर बोलता नहीं। आज भाजपा के भीतर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कद इतना विराट हो चुका है कि उन्हें 2029 के प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक और सबसे सशक्त दावेदार माना जाने लगा है। मुमकिन है कि दिल्ली का केंद्रीय नेतृत्व यह न चाहे कि 2027 में योगी इतने प्रचंड बहुमत के साथ उभरें कि 2029 की राह में वे स्वयं एक बड़ी चुनौती बन जाएं। अगर मायावती अकेले लड़कर ब्राह्मण और दलित वोटों के ध्रुवीकरण को रोकती हैं और भाजपा पूर्ण बहुमत के जादुई आंकड़े से थोड़ा भी चूक जाती है, तो इसका सीधा प्रहार योगी आदित्यनाथ की ‘अजेय’ ब्रांडिंग पर होगा। योगी के वर्चस्व को संतुलित करने के लिए मायावती को एक ‘चेकपोस्ट’ की तरह इस्तेमाल करना दिल्ली की एक बहुत बड़ी और दूरगामी चाल हो सकती है।

​मायावती के लिए यह चुनाव उनके राजनीतिक अस्तित्व की रक्षा का ‘करो या मरो’ वाला मुकाबला है। पिछले एक दशक में बसपा का गिरता ग्राफ उनके नेतृत्व पर सवाल उठाता रहा है, लेकिन 2027 उन्हें पुनः ‘किंगमेकर’ बनने का सुनहरा मौका दे रहा है। यदि वे 40 से 50 सीटें जीतने में कामयाब रहती हैं, तो उत्तर प्रदेश के पावर सेंटर में दिल्ली का हस्तक्षेप बढ़ेगा और योगी का एकतरफा प्रभाव कम होगा। लब्बोलुआब यह है कि मायावती का अकेले लड़ना सिर्फ बसपा की रणनीति नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ियों की एक सामूहिक बिसात है। इसमें ब्राह्मणों का असंतोष भी है, सवर्णों का भविष्य भी और सबसे ऊपर 2029 की महात्वाकांक्षाओं का टकराव भी। अखिलेश यादव के लिए दोस्ती के दरवाजे बंद हो चुके हैं और हाथी अब नए सवारों के साथ मैदान-ए-जंग में है। क्या मायावती 2007 का करिश्मा दोहरा पाएंगी या योगी इस चक्रव्यूह को भेदने में सफल होंगे? ‘अखिलीक्स’ की पैनी नजर इस महासंग्राम के हर मोड़ पर बनी रहेगी।

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