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सोम डिस्टलरीज का ‘सूर्यास्त’: एक कंडिका ने तोड़ा साम्राज्य, MP की आबकारी व्यवस्था में खत्म हुआ रसूख का दौर

आज की यह खास रिपोर्ट मध्य प्रदेश की उस सियासत-व्यवस्था की परतें खोलने वाली है जहाँ सालों तक ‘रसूख’ ही सबसे बड़ा लाइसेंस माना जाता रहा, लेकिन 2026-27 की नई आबकारी नीति ने इस मिथक को तोड़ दिया है और उस नाम को टेक्निकल बिड से बाहर कर दिया है जिसकी धमक कभी वल्लभ भवन के गलियारों में गूंजती थी—सोम डिस्टलरीज।
यह सिर्फ एक कंपनी की हार नहीं है, बल्कि उस पूरे सिस्टम का पतन है जो सालों से ‘मैनेजमेंट’ के भरोसे चलता था, जहाँ फाइलों से ज्यादा फोन कॉल चलते थे और नियमों से ज्यादा नेटवर्क काम करता था, लेकिन इस बार कहानी पलट गई है क्योंकि आबकारी विभाग ने पहली बार कागज को नाम से ऊपर रख दिया है और इसी एक फैसले ने सोम के साम्राज्य को झटका दे दिया है।
पूरी कहानी की जड़ में है टेंडर दस्तावेज की कंडिका 4.3.1 (1), जो साफ-साफ कहती है कि टेक्निकल बिड के साथ ‘जीवित आसवनी यानी D-1 लाइसेंस’ की प्रमाणित प्रति देना अनिवार्य है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि प्रदेश की सबसे बड़ी शराब कंपनियों में गिनी जाने वाली सोम डिस्टलरीज के पास निविदा की तारीख पर कोई वैध यानी ‘लाइव’ लाइसेंस मौजूद ही नहीं था, और यही वह तकनीकी खामी थी जिसने पूरे खेल को पलट दिया।
सोचिए, एक ऐसी कंपनी जिसने सालों तक बाजार पर राज किया, वह सबसे बुनियादी पात्रता शर्त ही पूरी नहीं कर पाई, यह सिर्फ एक चूक नहीं लगती बल्कि यह उस आत्मविश्वास या कहें अहंकार की कहानी लगती है जहाँ यह मान लिया गया कि ‘हमारा नाम ही काफी है’, लेकिन इस बार सिस्टम ने नाम नहीं बल्कि नियम को चुना और यही फैसला निर्णायक साबित हुआ।
यहाँ एक और अहम कड़ी जुड़ती है कंडिका 4.3.2 (I) से, जिसमें विभाग ने साफ कर दिया था कि जो दस्तावेज पोर्टल पर अपलोड हो चुका है वही अंतिम माना जाएगा और उसके बाद कोई नया दस्तावेज स्वीकार नहीं किया जाएगा, यानी सुधार की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई, और इसी सख्ती ने उन सभी खिलाड़ियों के लिए दरवाजे बंद कर दिए जो आखिरी समय में ‘मैनेजमेंट’ के जरिए अपनी कमी पूरी करने की उम्मीद रखते थे।
इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ सोम ही नहीं बल्कि केडिया ग्रुप जैसे बड़े नाम भी तकनीकी खामियों में उलझ गए, जहाँ हस्ताक्षर और शपथ-पत्र से जुड़ी गड़बड़ियों ने उनकी बिड को कमजोर कर दिया, लेकिन सोम का मामला सबसे बड़ा इसलिए बन गया क्योंकि यहाँ बुनियादी पात्रता ही गायब थी, और यही कारण है कि इस फैसले को सिस्टम में एक बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
सोम डिस्टलरीज के बाहर होने का असर सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं है बल्कि यह पूरे प्रदेश के शराब कारोबार के गणित को बदलने वाला है क्योंकि ग्वालियर, भोपाल, इंदौर जैसे बड़े जोन जहाँ कभी सोम का दबदबा था, अब वहाँ नए खिलाड़ियों के लिए रास्ता खुल गया है और विभाग उन कंपनियों को मौका देने की तैयारी में है जो नियमों के अनुसार पूरी तरह योग्य हैं।
यह बदलाव उन छोटे और मध्यम आसवकों के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है जो सालों से बड़े सिंडिकेट्स की छाया में दबे हुए थे और जिनके लिए बाजार में जगह बनाना लगभग नामुमकिन था, लेकिन अब पहली बार उन्हें लग रहा है कि सिस्टम में एंट्री का दरवाजा खुल सकता है।
सोम के लिए यह झटका सिर्फ आर्थिक नहीं है बल्कि उनकी साख पर भी सीधा असर डालने वाला है क्योंकि जिस कंपनी को सिस्टम का ‘सबसे मजबूत खिलाड़ी’ माना जाता था, वह एक तकनीकी शर्त के कारण बाहर हो गई, और यह संदेश बहुत साफ है कि अब नियमों से ऊपर कोई नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या यह बदलाव स्थायी है या सिर्फ एक शुरुआत है, क्या सरकार वाकई अब बिना दबाव के फैसले ले रही है या यह एक सीमित उदाहरण है, और सबसे अहम सवाल यह कि क्या सोम डिस्टलरीज अब कानूनी रास्ता अपनाकर वापसी की कोशिश करेगी।
संभावना इस बात की भी है कि मामला अदालत तक पहुंचे क्योंकि इतनी बड़ी कंपनी इतनी आसानी से मैदान नहीं छोड़ेगी, लेकिन फिलहाल तस्वीर यही है कि 2026-27 की आबकारी नीति ने एक बड़ा संदेश दे दिया है कि अब खेल नियमों से चलेगा, न कि रिश्तों से।
अखिलीक्स की इस पड़ताल का निष्कर्ष साफ है कि मध्य प्रदेश की आबकारी व्यवस्था एक नए मोड़ पर खड़ी है जहाँ ‘रसूख’ का दौर कमजोर पड़ रहा है और ‘नियम’ मजबूत हो रहे हैं, और अगर यह ट्रेंड जारी रहता है तो आने वाले समय में पूरे सिस्टम की तस्वीर बदल सकती है।
सोम डिस्टलरीज के इस पतन की कहानी यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि असली सवाल अब शुरू होते हैं—क्या यह अंत है या किसी नए कानूनी और रणनीतिक दांव-पेच की शुरुआत, क्या सिस्टम में यह बदलाव टिकेगा या फिर पुराने तरीके वापसी करेंगे, इन सभी सवालों के जवाब हम आपको लगातार देते रहेंगे।

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