कांग्रेस में ‘शोले’: जय–वीरू की जंग और पार्टी का भविष्य
राजनीति का नया शोले वर्ज़न
कभी भाई–भाई कहलाने वाले, कभी ‘जय और वीरू’ की तरह पेश किए जाने वाले कमलनाथ और दिग्विजय सिंह आज आमने–सामने खड़े हैं।
2020 में गिरी कांग्रेस सरकार की कहानी फिर से ताज़ा हो गई है।
लेकिन इस बार इसमें सिर्फ़ दो नेताओं की नहीं, बल्कि बेटों–भतीजों की सियासत भी शामिल हो चुकी है।
यानी कांग्रेस की अंदरूनी कलह अब पीढ़ी–दर–पीढ़ी तक पहुँच चुकी है।
2020 का ज़ख्म अभी तक हरा
मार्च 2020: कमलनाथ की 18 महीने पुरानी सरकार गिरी।
वजह बनी ज्योतिरादित्य सिंधिया की नाराज़गी और 22 विधायकों का टूटना।
दिग्विजय सिंह का दावा था — “सरकार को कुछ नहीं होगा, सब संभाल लिया जाएगा।”
लेकिन नतीजा उल्टा निकला।
अब 2025 में, दिग्विजय ने कहा — “ग्वालियर–चंबल की डील टूटी, सिंधिया रुष्ट हुए, सरकार चली गई।”
कमलनाथ ने पलटवार किया — “सरकार इसलिए गिरी क्योंकि सिंधिया को लगता था कि दिग्विजय सरकार चला रहे हैं।”
दोनों दिग्गज अब खुलकर एक–दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
नाकुलनाथ की हार और कमलनाथ का हाशिया
2024 लोकसभा चुनाव में छिंदवाड़ा सीट से नाकुलनाथ हार गए।
यह वही सीट थी, जिसे कांग्रेस का किला कहा जाता था।
इस हार ने कमलनाथ की साख को गहरी चोट दी।
पार्टी के भीतर संदेश गया — “कमलनाथ अब जीत दिलाने वाले नेता नहीं रहे।”
2018 में मुख्यमंत्री, 2023 में विपक्ष का चेहरा… और 2024 के बाद — धीरे–धीरे साइडलाइन।
ज़िला अध्यक्षों की नियुक्तियों में भी उनकी मर्ज़ी नज़र नहीं आई।
नाकुलनाथ की हार ने पिता कमलनाथ को भी हाशिए पर धकेल दिया।
दिग्विजय सिंह को भी छोटा किया गया
कांग्रेस की नई जिला अध्यक्षों की लिस्ट आई।
इसमें दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह और भतीजे प्रियव्रत सिंह को जिला अध्यक्ष बना दिया गया।
पहली नज़र में यह दिग्विजय की जीत दिखती है।
लेकिन असलियत यह है — जिला अध्यक्ष का पद दूसरी/तीसरी लाइन की राजनीति माना जाता है।
यानी यह सीधे–सीधे डिमोशन था।
मैसेज साफ़ था — “दिग्विजय को छोटा करो, उनके वारिसों को नीचे की पोज़िशन पर रखो।”
कमलनाथ को नाकुलनाथ की हार ने कमजोर किया, दिग्विजय को उनके वारिसों की नियुक्ति ने।
जय–वीरू की दोस्ती अब दुश्मनी
2023 विधानसभा चुनाव से पहले रणदीप सुरजेवाला ने कहा था —
“जय और वीरू मिलकर बीजेपी को हराएँगे।”
लेकिन अब 2025 में जय और वीरू खुद आमने–सामने हैं।
दिग्विजय का वार, कमलनाथ का पलटवार।
कांग्रेस का ऊपरी नेतृत्व बिखर चुका है।
बीजेपी पहले ही इन्हें लेकर तंज कस चुकी थी — “जय और वीरू तो जेल से भागे अपराधी थे।”
अब जनता के सामने ये दोनों नेता पार्टी की हार के दोषी दिख रहे हैं।
कांग्रेस में विद्रोह और गुटबाज़ी
जिला अध्यक्षों की लिस्ट पर विद्रोह फूट पड़ा।
जगह–जगह पोस्टर फाड़े गए, धरने हुए।
लेन–देन और परिवारवाद के आरोप खुले आम लगे।
नेताओं ने कहा — नियुक्तियाँ मेरिट पर नहीं, गुटबाज़ी और रिश्तेदारी पर हुईं।
जनता के बीच कांग्रेस की छवि और बिगड़ गई।
वहीं बीजेपी लगातार संगठन को मजबूत कर रही है और
मुख्यमंत्री मोहन यादव को हिंदुत्व का नया चेहरा बना रही है।
2028 का चुनाव और कांग्रेस की चुनौती
तस्वीर साफ है…
कमलनाथ को नाकुलनाथ की हार ने कमजोर किया।
दिग्विजय को बेटे और भतीजे की नियुक्ति से छोटा किया गया।
कांग्रेस की दोनों स्तंभनुमा शख्सियतें अब सिर्फ़ नाम भर रह गई हैं।
2028 विधानसभा चुनाव सामने हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यही है —
“जब कांग्रेस के जय और वीरू ही बंट गए, तो बीजेपी से लड़ाई कौन लड़ेगा?”
कांग्रेस के भीतर का यह ‘शोले’ फिलहाल थमने वाला नहीं दिखता।
कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की यह जंग,
पार्टी को अंदर से और कमजोर करेगी।
अगर कांग्रेस नेतृत्व ने समय रहते हालात नहीं संभाले,
तो 2028 का चुनाव कांग्रेस के लिए त्रासदी बन सकता है।



