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साइंस हाउस स्कैम: सेहत के सिस्टम पर सबसे बड़ा हमला

आज हम जिस कहानी की पड़ताल कर रहे हैं, वह सिर्फ़ एक कंपनी का भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य सिस्टम पर किया गया हमला है। नाम है — साइंस हाउस मेडिकल प्राइवेट लिमिटेड।
आरोप हैं — फर्जी मरीज, नकली जांचें और करोड़ों की हेराफेरी। सवाल है — क्या यह सिर्फ़ एक कंपनी का खेल था या फिर पूरा सिस्टम मिलकर जनता की सेहत से खिलवाड़ कर रहा था?

कैसे शुरू हुआ हब-एंड-स्पोक मॉडल

साल 2021 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत सरकार ने फैसला किया कि हर जिले के अस्पतालों में हब एंड स्पोक मॉडल से डायग्नोस्टिक सेवाएं दी जाएंगी।

उद्देश्य: गरीब मरीजों को गुणवत्तापूर्ण जांच उपलब्ध कराना।

शर्त: लैब्स को NABL (National Accreditation Board for Testing and Calibration Laboratories) से प्रमाणित होना होगा।

लेकिन सच यह था कि उस समय किसी भी सरकारी लैब के पास NABL सर्टिफिकेट ही नहीं था। यानी सिस्टम में शुरू से ही ऐसा पेंच डाला गया, जिसे निजी कंपनियों ने अपने फायदे का हथियार बना लिया।

टेंडर का खेल और फर्जी प्रतिस्पर्धा

टेंडर की प्रक्रिया शुरू हुई। मैदान में दो कंपनियाँ उतरीं:

1. साइंस हाउस

2. न्यूबर्ग सुप्राटेक

 

ऊपर से दोनों प्रतिस्पर्धी दिख रहे थे, लेकिन अंदर से यह एक ही स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे।

वर्क ऑर्डर साइंस हाउस को मिला।

कुछ समय बाद दोनों कंपनियाँ विलय (Merger) कर गईं।

यानी टेंडर की शर्तें तोड़कर मिलकर खेल खेला गया। सरकार की नज़रें मूँदी रहीं और भ्रष्टाचार का रास्ता खुल गया।

ओवरचार्जिंग और फर्जी मरीजों का नेटवर्क

NABL मानकों का हवाला देकर 25% ज़्यादा जांच दरें तय की गईं।

स्वास्थ्य विभाग ने बिना सवाल किए इन्हें मंजूरी दी।

पिछले पाँच सालों में सरकार ने करीब 150–200 करोड़ रुपए का पेमेंट किया।

लेकिन असल में:

मरीज कम थे।

रिकॉर्ड में फर्जी नामों का अंबार था।

डमी रिपोर्ट बनाई गईं।

बिलिंग में ओवरचार्जिंग की गई।

यानी रिपोर्ट नकली, मरीज फर्जी… लेकिन बिल असली!

Akhileaks की पुरानी पड़ताल और नए सबूत

Akhileaks ने पहले भी दिखाया था कि:

साइंस हाउस कैसे बिलिंग ओवरचार्जिंग कर रहा था।

अस्पतालों में डमी रिकॉर्ड तैयार किए जा रहे थे।

फर्जी मरीजों के नाम पर रिपोर्ट बनाई जा रही थीं।

अब राज्यसभा सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने यह मामला उठाया है।

उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल को पत्र लिखा।

आरोप लगाया कि साइंस हाउस ने फर्जी मरीजों के नाम पर करोड़ों की हेराफेरी की।

पूर्व मंत्री सुरेंद्र चौधरी से मिले दस्तावेज़ भी संलग्न किए।

सिस्टम की मिलीभगत: अकेली कंपनी नहीं

क्या अकेली कंपनी इतना बड़ा खेल खेल सकती थी? जवाब है — नहीं।
इस घोटाले में शामिल थे:

स्वास्थ्य विभाग के अफसर

टेंडर पास कराने वाले मैनेजर

राजनीतिक गॉडफादर

वरना इतनी भारी पेमेंट बिना सवाल-जवाब के कैसे हो जाती?

राजनीतिक रंग और तुलना व्यापम से

अब यह मामला राजनीति का मुद्दा बन गया है।

कांग्रेस आरोप लगा रही है।

बीजेपी सफाई दे रही है।

लेकिन असली सवाल यह है — क्या यह सिर्फ़ कांग्रेस बनाम बीजेपी की लड़ाई है या पूरा स्वास्थ्य सिस्टम निजी कंपनियों के हाथ बिक चुका है?

यह घोटाला हमें व्यापम घोटाले की याद दिलाता है:

वहाँ फर्जी नामों से एडमिशन और एग्जाम पास कराए गए थे।

यहाँ फर्जी नामों से जांच और मरीज दिखाए गए।

फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार दांव पर पैसा ही नहीं, जनता की जान भी है।

दिग्विजय सिंह की माँगें

उनकी चिट्ठी में तीन माँगें रखी गईं:

1. पिछले पाँच साल के सभी भुगतान और जांच रिपोर्ट की ऑडिट कराई जाए।

2. अस्पतालों के रिकॉर्ड और कंपनी के डेटा का मिलान हो।

3. भविष्य में ऐसे अनुबंधों के लिए सख़्त मानक और निगरानी तंत्र लागू हो।

असर: सबसे बड़ा धोखा जनता के साथ

असली मरीजों को सस्ती और सही जांच नहीं मिली।

इलाज में देरी हुई।

बीमारियाँ बिगड़ गईं।

गरीब की जिंदगी खतरे में पड़ी।

और दूसरी तरफ, फर्जी मरीजों के नाम पर करोड़ों की पेमेंट होती रही।

यह सिर्फ़ पैसों का घोटाला नहीं, बल्कि जनता की सेहत और भरोसे से किया गया सबसे बड़ा धोखा है।

निष्कर्ष: क्या सरकार ने सेहत बेच दी?

सोचिए — आप अस्पताल जाते हैं। आपको टेस्ट का बिल थमा दिया जाता है। आप रिपोर्ट लेकर इलाज कराते हैं।
लेकिन पीछे की सच्चाई यह है:

रिपोर्ट नकली है।

मरीज फर्जी है।

और बिल असली।

यह सिर्फ़ धोखा नहीं है, बल्कि सरकार की नीयत पर सीधा सवाल है — क्या सरकार ने अपनी जनता की सेहत बेच दी?

Akhileaks की अपील

यह थी Akhileaks की पड़ताल — साइंस हाउस स्कैम।
यह कहानी बताती है कि कैसे सेहत का सिस्टम लूटा गया और कैसे जनता की जिंदगी दांव पर लगाई गई।

अगर आप मानते हैं कि यह जनता से सबसे बड़ा धोखा है, तो इस लेख और वीडियो को शेयर कीजिए।
क्योंकि यहाँ सच सामने आता है — सबूतों और कागज़ों के साथ।

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