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साइंस हाउस मेडिकल स्कैम: एक ही टेस्ट पर तीन-तीन रेट, सिस्टम की पोल खुली

 

आज का खुलासा बताता है कि मध्यप्रदेश का हेल्थ सेक्टर किस हद तक बीमार हो चुका है।

एक ही राज्य
एक ही विभाग
एक ही कंपनी

लेकिन, एक ही टेस्ट की कीमत तीन गुना तक अलग!

जिला अस्पताल में ₹317

मेडिकल कॉलेज में वही जांच ₹133

और CHC में उससे भी कम

आख़िर यह रेट का खेल है या भ्रष्टाचार का नया तरीका?


बैकग्राउंड: कैसे शुरू हुआ खेल

2019 में राज्य सरकार ने साइंस हाउस मेडिकल और POCT सर्विसेज़ कंसोर्टियम को बड़ा टेंडर दिया।

85 जिला अस्पतालों की लैब इन्हें सौंप दी गईं।

बाद में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) भी इनके हवाले हुए।

दावा: “हम CGHS–NABL रेट्स से 31% डिस्काउंट पर जांच करेंगे।”

लेकिन, जांच में सामने आया कि —
एक ही कंपनी, एक ही मशीन, एक ही रिएजेंट… फिर भी दरों में भारी अंतर।

आंकड़े जो चौंकाते हैं

सीरम क्रिएटिनिन टेस्ट

मेडिकल कॉलेज: ₹43

जिला अस्पताल: ₹243

CHC: ₹25

HbA1C टेस्ट

मेडिकल कॉलेज: ₹43

जिला अस्पताल: ₹93

CHC: ₹29

SGOT टेस्ट

मेडिकल कॉलेज: ₹133

जिला अस्पताल: ₹206

CHC: ₹83

विटामिन D टेस्ट

मेडिकल कॉलेज: ₹2457

जिला अस्पताल: ₹7317

CHC: ₹213

एक ही टेस्ट, लेकिन कीमतें 3 गुना तक अलग।
और पेमेंट सबका हो रहा है स्वास्थ्य विभाग से।

कंपनी का बचाव बनाम असलियत

कंपनी का दावा (पुनीत दुबे, CEO साइंस हाउस):
“हम सिर्फ़ टेंडर के बेस रेट पर डिस्काउंट कोट कर रहे हैं। फर्क हम नहीं कर रहे।”

असलियत:

टेंडर की शर्तों का इस्तेमाल कर दरों का कृत्रिम अंतर बनाया गया।

विभाग से ज़्यादा भुगतान लिया गया।

5 साल से यह सिस्टम चल रहा है।

हर दिन लाखों जांचें हुईं, और करोड़ों का भुगतान हुआ।

मंत्री और विशेषज्ञों के बयान

राजेंद्र शुक्ला (स्वास्थ्य मंत्री):
“मुझे जानकारी नहीं थी कि एक ही जांच पर अलग-अलग रेट हैं। अगर ऐसा हो रहा है तो गलत है। प्रदेश में जांच की एक दर होगी।”

डॉ. पंकज शुक्ला (पूर्व संचालक, NHM):
“जब विभाग एक है, उपकरण और रिएजेंट एक हैं… तो रेट भी एक जैसे होने चाहिए।”

इन बयानों से साफ़ है — या तो सरकार अनजान बनी रही, या फिर अफसरों ने आंखें मूंदी।

पॉलिटिकल एंगल

यह कहानी सिर्फ़ अस्पतालों की गड़बड़ी नहीं, बल्कि राजनीति का आईना भी है।

2019 से यह खेल चल रहा है।

हर साल हजारों करोड़ का हेल्थ बजट पास हुआ।

लेकिन दरों की जांच तक नहीं हुई।

क्या यह महज़ अफसरों की लापरवाही है?
या फिर कंपनी–अफसर–नेता की साझेदारी से बना नया घोटाला?

बड़े सवाल

1. एक ही विभाग, एक ही जांच, एक ही कंपनी… तो रेट अलग क्यों?

2. क्या स्वास्थ्य विभाग ने जानबूझकर यह फर्क बनाए रखा?

3. पिछले 5 साल में जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों को दी गई पेमेंट की जांच कौन करेगा?

4. मरीजों की जेब से निकला पैसा वापस कैसे आएगा?

5. क्या यह एक नया “रेट सिंडिकेट” है?

निष्कर्ष और Akhileaks की मांग

यह मामला साबित करता है कि मध्यप्रदेश का हेल्थ सेक्टर सिर्फ़ बीमार नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का शिकार है।

एक ही जांच पर अलग-अलग दरें लगाकर सरकारी खजाने को चूना लगाया गया।

मरीजों की जांचें कंपनी के लिए कमाई का धंधा बन गईं।

Akhileaks की मांग:

सभी जांचों के लिए एक समान दर तय की जाए।

पिछले 5 साल की बिलिंग का ऑडिट हो।

शामिल अफसरों और कंपनी पर सख्त कार्रवाई हो।

हेल्थ सेक्टर में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।

अंतिम शब्द

आज की पड़ताल ने एक और सच सामने रखा —
मरीज की बीमारी से बड़ा खेल है हेल्थ विभाग की दरों का घोटाला।
यह घोटाला सिर्फ़ सरकार के पैसे का नहीं…बल्कि जनता के भरोसे का भी है।
“मैं हूँ अखिलेश सोलंकी… और आप देख रहे थे Akhileaks। सवाल पूछते रहिए, क्योंकि लोकतंत्र में चुप्पी सबसे बड़ा अपराध है।”

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