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संघ बनाम मोहन यादव: जातिगत जनगणना पर दत्तात्रेय होसबोले का बयान और RSS की नई लाइन

परिचय: बयान जिसने सत्ता के समीकरण हिला दिए

संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले का बयान भले वैचारिक लगे, पर इसका असर सीधा मध्यप्रदेश की सत्ता पर पड़ा है।
होसबोले ने साफ़ कहा — “राजनीतिक दृष्टि से जातिगत जनगणना गलत है।”
यह बात सुनते ही सियासी गलियारों में हलचल मच गई, क्योंकि यह बयान उसी मुख्यमंत्री के लिए चेतावनी माना जा रहा है जिसे संघ ने खुद आगे बढ़ाया था — डॉ. मोहन यादव।

मोहन यादव को क्यों लाया गया था? 80:20 का मॉडल

संघ और भाजपा, दोनों ने मोहन यादव को 2023 में मुख्यमंत्री बनाते वक्त एक ही उद्देश्य रखा था —
“80:20” की राजनीति को मजबूत करना।
यानी हिंदू वोटों का एकीकरण और अल्पसंख्यक वोटों का प्रतीकात्मक विरोध।
मोहन यादव धार्मिक और संघनिष्ठ छवि वाले नेता हैं, और उन्हें “संगठन और सत्ता के बीच सेतु” माना गया था।

लेकिन सत्ता संभालने के कुछ महीनों में ही कहानी पलट गई।
मुख्यमंत्री यादव ने 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को अपने राजनीतिक मिशन में बदल दिया।
उन्होंने खुद को पिछड़ा वर्ग का सबसे बड़ा प्रतिनिधि बताना शुरू किया,
जिससे संघ की वैचारिक लाइन और मुख्यमंत्री की राजनीतिक लाइन में टकराव पैदा हुआ।

27% आरक्षण की राजनीति और दिल्ली की असहजता

जब मध्यप्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी आरक्षण की “रोज़ाना सुनवाई” की मांग की,
तो यह बात सीधे दिल्ली तक पहुंच गई।
केंद्र को लगा कि राज्य सरकार इस मुद्दे को कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक रंग दे रही है।
इसके बाद संकेत आया कि भोपाल अपनी गति धीमी करे।
कुछ ही दिनों बाद मुख्यमंत्री ने खुद कहा —

“हम चाहते हैं कि सुनवाई नवंबर के मध्य तक टाल दी जाए।”

यह बदलाव दरअसल केंद्र की सॉफ्ट फटकार का परिणाम था।
और अब दत्तात्रेय होसबोले का बयान उसी चेतावनी की “अगली कड़ी” माना जा रहा है।

संघ की नई वैचारिक लाइन: जाति नहीं, संस्कार चाहिए

होसबोले ने अपने बयान में कहा —

“हर गलती कानून से नहीं रुकेगी, समाज को संस्कार देना होगा।”
यह लाइन सिर्फ़ वैचारिक नहीं, बल्कि एक अनुशासनिक घोषणा है।
RSS यह स्पष्ट कर रहा है कि सत्ता में बैठे स्वयंसेवक अगर
जातिगत राजनीति में उलझे, तो संगठन उन्हें “संस्कार” की याद दिलाएगा।

संघ की नजर में —
राजनीति का मकसद समाज को जोड़ना है, बांटना नहीं।
इसलिए अब RSS फिर से अपने मूल एजेंडे —
धर्मांतरण रोकथाम, घर वापसी और सामाजिक समरसता — की तरफ लौट आया है।

जबलपुर बैठक: संकेत से ज्यादा, संदेश था

RSS की जबलपुर बैठक में देशभर के वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद थे।
वहीं से यह लाइन आई कि संघ का ध्यान अब सांस्कृतिक पुनर्जागरण पर रहेगा।
बंगाल, पंजाब और उत्तर भारत के जनजातीय इलाकों में धर्मांतरण को रोकना,
और हिंदू समाज में एकता की भावना को बढ़ाना — यही आने वाले महीनों का मिशन होगा।

संघ ने यह भी दोहराया कि —

“संघ सबका है, लेकिन भाजपा के कार्यकर्ता ज्यादा हैं।”
यह बयान सुनने में हल्का लगता है,
पर वास्तव में यह सत्ता में बैठे स्वयंसेवकों के लिए अनुशासन का संदेश है।

मोहन यादव की परीक्षा अब शुरू

RSS के इस रुख के बाद अब मुख्यमंत्री मोहन यादव दो रास्तों पर खड़े हैं —
संघ की वैचारिक लाइन पर लौटकर 80:20 का संतुलन कायम रखें।
या फिर ओबीसी राजनीति की दिशा में आगे बढ़कर 27% नेता बनें।

संघ का स्पष्ट संदेश है कि अगर सत्ता संघ की लाइन से हटेगी,
तो संगठन राजनीतिक करेक्शन से पीछे नहीं हटेगा।
अब देखना यह है कि मोहन यादव अनुशासन चुनते हैं या महत्वाकांक्षा।

निष्कर्ष: संघ ने खींच दी लकीर

नवंबर के मध्य में ओबीसी आरक्षण पर अगली सुनवाई होगी।
सरकार ने खुद समय मांगा है — यह सिर्फ कानूनी नहीं, राजनीतिक ब्रेक है।
संघ ने अपनी बात साफ़ कर दी है —

“राजनीति समाज को जोड़ने के लिए है, बांटने के लिए नहीं।”

यह कहानी सिर्फ़ मोहन यादव के राजनीतिक भविष्य की नहीं,
बल्कि सत्ता और विचारधारा के रिश्ते की भी है।
संघ ने चेतावनी दे दी है —
अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री सुनते हैं,
या इतिहास उन्हें भी “करेक्शन” का उदाहरण बना देगा।

Akhileaks विश्लेषण:

यह घटना बताती है कि RSS आज भी सिर्फ़ संगठन नहीं,
बल्कि भारतीय राजनीति का विचार नियंत्रक केंद्र है।
और जब नागपुर बोलता है — तो भोपाल सुनता ही है।

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