संघ का संकेत, शिवराज की वापसी — Silent Comeback का गेमप्लान
दिल्ली और भोपाल — दो केंद्र, दो धरातल। यदि कोई नेता एक साथ दोनों पर बराबर सक्रिय हो, तो उसकी रणनीति ध्यान देने योग्य होती है। 2025 की शुरुआत में जब शिवराज सिंह चौहान मोदी सरकार में मंत्री बने, तो कहा गया — ‘अध्याय दिल्ली में बंद हो गया’। लेकिन सितंबर की घटनाएँ उसी कथन को चुनौती देती नजर आती हैं। संघ प्रमुख मोहन भागवत से हुई मुलाकात ने राजनीति का एक नया अध्याय खोल दिया — और वह अध्याय नाम है — शिवराज का साइलेंट कमबैक।
मुलाकात की राह — संकेतों का आरंभ
मीडिया सूत्रों की रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2025 के अंत में शिवराज और RSS प्रमुख मोहन भागवत के बीच लगभग 45 मिनट की मुलाकात हुई।
यह मुलाकात सिर्फ औपचारिक नमस्कार नहीं — बल्कि राजनीतिक संकेतों, भूमिका तय करने और भविष्य की दिशा पर विचार-विमर्श की मानी जा रही है।
मुलाकात के बाद तुरंत ही शिवराज के कार्यक्रमों की बढ़ती संख्या, सामाजिक संपर्कों की तिव्रता और मीडिया उपस्थिति का जोर — ये सब मिलकर यह संकेत देते हैं कि यह कदम योजनाबद्ध था, न कि आकस्मिक।
ग्रामीण मोर्चा — जन-कनेक्ट की रणनीति
शिवराज की वापसी का सबसे स्पष्ट और स्थायी स्तंभ है — ग्रामीण संपर्क और जनसंवाद:
सितंबर की शुरुआत से ही वे उज्जैन, फतेहगढ़, फोफनिया, सीहोर आदि ग्रामीण इलाकों में लगातार दिखे।
खेतों में किसानों से मुलाकात, मंदिर कार्यक्रम, जल संरक्षण और वृक्षारोपण कार्यक्रम — ये सब उनकी रणनीति के अंग बने।
उनके संदेशों में निरंतर ‘किसान’ का स्थान — वह क्षेत्र जो उनका राजनीतिक अवसाद नहीं बनने देता।
यह वही रणनीति है जो उन्होंने पहले अपनाई थी — Soft Hindutva + Grassroots Reach।
दिल्ली और भोपाल — मंच और मैदान का संतुलन
शिवराज की वापसी सिर्फ प्रदेश स्तर की नहीं — राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पकड़ समझने वाली है:
दिल्ली में रहते हुए भी उन्होंने “मध्यप्रदेश केंद्रित” कंटेंट को प्राथमिकता दी — भाषण, मंत्रालयीय योजनाएँ, मीडिया वक्तव्य — सब में मप्र का अक्स दिखाया गया।
लेकिन हर बड़ा कदम भोपाल, उज्जैन, इटारसी, विदिशा जैसे शहरों से जुड़ा हुआ था — जनता के बीच, भीड़ के बीच।
मंच-संदेश दोनों स्तरों पर उन्होंने एक सुसंगत छवि बनाई — “‘दिल्ली मेरा कार्यस्थल है, मप्र मेरी कर्मभूमि’” — यह पॉलिटिकल ब्रांडिंग की अहम रणनीति बन गई।
मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने Silent Challenge
भाजपा में मोहन यादव की मुख्यमंत्री के रूप में जो नई भूमिका बनी है, वह प्रशासनिक रूप से सक्रिय है। मगर जनता से दूरी का संकट है।
ऐसी स्थिति में, शिवराज अपनी सक्रियता और जनसामान्य से जुड़ाव के जरिए “जननायक” की भूमिका दोबारा स्थापित करना चाह रहे हैं।
संगठन स्तर पर यह माना जाता है कि यदि भाजपा या RSS को कोई जन-संयोग वाला चेहरा चाहिए, तो शिवराज ही उस भूमिका को निभा सकते हैं।
मप्र में अब भी कई पुराने भाजपा और RSS पदाधिकारी शिवराज की गतिविधियों में शामिल होने लगे हैं — यह संकेत है कि “मूलभूत समीकरण” में फेरबदल शुरू हो चुका है।
बैनर से ब्रांड तक — संदेश की आखिरी चाल
पहले “पूर्व मुख्यमंत्री” शीर्षक हटकर “जननायक शिवराज सिंह चौहान” का प्रयोग — सिर्फ़ भाषाई बदलाव नहीं, बल्कि एक पॉलिटिकल रीब्रांडिंग।
सोशल मीडिया पोस्ट्स, स्थानीय इवेंट बैनर्स, मंत्रालय की घोषणाएँ — सब में मप्र-केन्द्रित कंटेंट रणनीतिक रूप से पेश।
कार्यों की प्राथमिकता को मंत्रालय के काम से जनसंपर्क कार्यक्रम की दिशा में स्थानांतरित करना — यह उन्होंने साफ किया कि राज्य राजनीति में उनका दायित्व अभी भी जिंदा है।
चुनौतियाँ और विरोधाभासी रियाक्शन्स
भाजपा के भीतर एक नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति अभी तक नहीं हुई — इस टकराव की स्थिति एक संकेत है कि शिवराज-शक्ति के बीच अभी अस्थिरता है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कुछ ऐसी पहलों की शुरूआत की है जो शिवराज के पुराने योगदानों को बदलती छवि देने की कोशिश कर रही हैं।
शिवराज का नाम राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के दावेदारों में चर्चा में है, लेकिन वे साफ-साफ इस दिशा में खुलकर बोलने से बचते दिखे हैं।
यह संतुलन बहुत नाजुक होगा — बहुत अधिक सक्रियता से हितधारियों में असहमति, या बहुत अधिक चुप्पी से राजनीतिक छवि धूमिल हो सकती है।
निष्कर्ष — क्या यह सिर्फ़ ताज़ी हवा है या चुनावी तूफ़ान?
सितंबर 2025 ने एक स्पष्ट संदेश दिया — शिवराज सिंह चौहान सिर्फ़ दिल्ली के मंत्री नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के राजनीति के केंद्र में बने हुए हैं।
संघ का संकेत और शिवराज की समझदारी मिलकर एक साइलेंट कमबैक की रूपरेखा बना रहे हैं — जहाँ पद नहीं, भावना, छवि और जनसंपर्क अहम होंगे।
यदि यह योजना सफल होती है, तो 2028 के चुनाव से पहले शिवराज केवल सलाहकार नहीं, निर्णायक भूमिका में होंगे।
अंत में, जैसा कि शिवराज कहते हैं — “दिल्ली मेरा कार्यस्थल है, मप्र मेरी कर्मभूमि।” और 2025 के सितंबर ने इसे सिर्फ़ एक वाक्य से बढ़कर एक राजनीतिक रणनीति बना दिया।



