सत्ता, साजिश और संन्यास: मध्य प्रदेश की वो 19 महीने की सरकार!
एमपी की पॉलिटिक कहानी:एपिसोड 4
भूमिका: जब कुर्सी के लिए नहीं, उसूलों के लिए जंग हुई
राजनीति के गलियारों में एक पुरानी कहावत है कि ‘कुर्सी किसी की सगी नहीं होती’। लेकिन मध्य प्रदेश के इतिहास में एक दौर ऐसा भी आया जब जंग कुर्सी छीनने के लिए नहीं, बल्कि अपने स्वाभिमान और उसूलों को बचाने के लिए लड़ी गई। अखिल लीक्स के इस विशेष लेख में, हम मध्य प्रदेश की राजनीतिक कहानी के उस चौथे अध्याय के पन्ने पलट रहे हैं, जो दशकों से वल्लभ भवन की धूल भरी फाइलों में दबे हुए थे।
यह कहानी है एक ऐसे मुख्यमंत्री की जिसने सरकारी फाइल पर ‘ऐसी की तैसी’ लिखने का साहस दिखाया, और एक ऐसे ‘राजा’ की जिसने महज 12 दिनों में सत्ता को ठोकर मारकर राजनीति से संन्यास ले लिया।
1. अहंकार बनाम स्वाभिमान: 1967 का वो ऐतिहासिक मोड़
कहानी की शुरुआत होती है 1967 के विधानसभा चुनावों से। उस दौर में डी.पी. मिश्रा का सियासी कद हिमालय जैसा ऊँचा था, लेकिन सत्ता के अहंकार ने उनके सामने एक ऐसी चुनौती खड़ी कर दी जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।
विवादित बयान: डी.पी. मिश्रा की एक तीखी टिप्पणी ने राजमाता विजयराजे सिंधिया को उनका प्रबल विरोधी बना दिया।
ऐतिहासिक दलबदल: राजमाता ने न केवल कांग्रेस छोड़ी, बल्कि अपने साथ 36 विधायकों को भी बाहर ले आईं। यह मध्य प्रदेश के इतिहास में बड़े पैमाने पर दलबदल की पहली पटकथा थी।
संवित सरकार का उदय: इस बगावत के असली सूत्रधार बने गोविंद नारायण सिंह। 30 जुलाई 1967 को प्रदेश में पहली गैर-कांग्रेसी ‘संवित सरकार’ (Samyukta Vidhayak Dal) की नींव पड़ी, जहाँ जनसंघ और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी जैसे धुर विरोधी एक ही मंच पर साथ आए।
2. गोविंद नारायण सिंह: बंदूकधारी विद्वान और ‘ऐसी की तैसी’ का किस्सा
गोविंद नारायण सिंह कोई साधारण राजनेता नहीं थे। वे अंग्रेजी साहित्य के प्रकांड विद्वान होने के साथ-साथ बेहद दबंग स्वभाव के थे।
विधायकों पर पहरा और 275 रिगवी बंदूक
पूर्व मुख्य सचिव आरपी नरोहा अपनी यादों में दर्ज करते हैं कि जब विधायकों के टूटने का खतरा मंडरा रहा था, तब गोविंद नारायण सिंह खुद अपनी 275 रिगवी बंदूक लेकर रात भर विधायकों के ठहरने की जगह पर पहरा देते थे।
वो चर्चित ‘नोटिंग’ जिसने हड़कंप मचा दिया
सत्ता के दो केंद्र बन चुके थे—एक वल्लभ भवन और दूसरा राजमाता का महल। जब राजमाता की सिफारिश वाली एक फाइल मुख्यमंत्री के पास पहुँची, तो उन्होंने उस पर लिख दिया— “ऐसी की तैसी”।
जब विधानसभा में इस पर बवाल हुआ, तो उन्होंने अपनी विद्वता का परिचय देते हुए तर्क दिया कि वे केवल ‘As Proposed’ (जैसा प्रस्तावित है) का शुद्ध हिंदी अनुवाद कर रहे थे। यह सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि राजमाता के बढ़ते हस्तक्षेप के खिलाफ एक स्वाभिमानी मुख्यमंत्री का विद्रोह था।
3. राजा नरेश चंद्र सिंह: 12 दिन का मुख्यमंत्री और महान संन्यास
गोविंद नारायण सिंह के बाद सत्ता के मंच पर सारंगढ़ के राजा नरेश चंद्र सिंह की एंट्री हुई। वे मध्य प्रदेश के पहले और इकलौते आदिवासी मुख्यमंत्री बने।
राजनीति की ‘मक्कारी’ से दूर: राजा साहब के पास न तो चालाकी थी और न ही विधायकों की वो फौज जो वफादारी बदलती रहती थी।
आत्मा की आवाज: जब उन्होंने देखा कि विधायक अपनी निष्ठाएं कौड़ियों के भाव बेच रहे हैं, तो उनका मोहभंग हो गया।
ऐतिहासिक फैसला: मात्र 12 दिनों के भीतर उन्होंने यह कहते हुए पद छोड़ दिया कि “मैं इस गंदगी का हिस्सा नहीं बन सकता”। उन्होंने न केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ी, बल्कि सक्रिय राजनीति से हमेशा के लिए संन्यास ले लिया।
4. 2026 के नजरिए से एक विश्लेषण
आज जब हम 2026 के राजनीतिक परिवेश में इन घटनाओं को देखते हैं, तो चेहरे और तकनीक जरूर बदल गई है, लेकिन सत्ता के दांव-पेच आज भी वही हैं। गोविंद नारायण सिंह की वो दबंगई और राजा नरेश चंद्र का वो महान त्याग आज के दौर में दुर्लभ है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि लोकतंत्र में पद से बड़ा उसूल होता है।
अगले अंक में क्या होगा?
पॉलिटिकल कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। अगले एपिसोड में हम आपको बताएंगे:
राजा नरेश चंद्र के इस्तीफे के बाद डी.पी. मिश्रा की वापसी की राह में किसने रोड़े अटकाए?
कैसे ‘किस्मत’ ने मध्य प्रदेश को एक नया और अप्रत्याशित नेतृत्व दिया?
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देखते रहिये, अखिल लीक्स – जहाँ फाइलें बोलती हैं!



