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ऑपरेशन 2026: बंगाल की ज़मीन के नीचे चल रही है सियासी सुरंग

RSS का ‘सीक्रेट 5 पॉइंटर प्लान’ और ममता बनर्जी की बढ़ती बेचैनी

RSS का ‘सीक्रेट 5 पॉइंटर प्लान’ और ममता बनर्जी की बढ़ती बेचैनी
राजनीति में एक पुरानी कहावत है—
जब बड़े खिलाड़ी अचानक खामोश हो जाएँ, तो समझ लीजिए कि ज़मीन के नीचे कोई बहुत बड़ी सुरंग खोदी जा रही है।
पश्चिम बंगाल में आज वही खामोशी है।
यह शोर रैलियों का नहीं है,
यह शोर है बंद कमरों में बनी उस रणनीति का,
जिसे संघ परिवार के भीतर एक नाम दिया गया है—

‘ऑपरेशन 2026’

आज Akhileaks पर हम उस फाइल को खोल रहे हैं,
जिसने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की नींद उड़ा दी है।
खबर यह नहीं है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत बंगाल गए।
खबर यह है कि उन्होंने अपने स्वयंसेवकों को ‘दलितों के साथ डिनर’ करने का आदेश क्यों दिया?
और क्यों मार्च 2026 को एक डेडलाइन की तरह देखा जा रहा है?
कहानी की शुरुआत दो तारीखों से होती है
6 फरवरी 2025
18 दिसंबर 2025
इन दोनों तारीखों पर सरसंघचालक मोहन भागवत पश्चिम बंगाल पहुँचे।
ये दौरे न तो रूटीन थे,
न ही संगठनात्मक औपचारिकता।
Akhileaks को मिले इनपुट के मुताबिक,
इन बैठकों में एक स्पष्ट टाइमलाइन तय हुई—
मिशन मार्च 2026
संघ और VHP के कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए गए—
अगले एक साल में
बंगाल के हर हिंदू घर तक पहुँचना है
लेकिन रुकिए…
यह सिर्फ दरवाज़ा खटखटाने का अभियान नहीं है।
इसके पीछे है एक गहरी सोशल इंजीनियरिंग।

RSS का सीक्रेट 5 पॉइंटर प्लान

पॉइंट नंबर 1: घर-घर पहुंच, संगठन नहीं—संवाद

संघ को ग्राउंड रिपोर्ट मिली है कि
टीएमसी की सरकार और स्थानीय नेटवर्क ने
हिंदू समाज को—
जाति, क्षेत्र और पहचान के आधार पर बाँट दिया है।
इसका जवाब है—
डोर टू डोर हिंदुत्व,
लेकिन बिना झंडा, बिना नारे।

पॉइंट नंबर 2: जाति की दीवार तोड़ने का प्रयोग

संघ मानता है कि
बंगाल में हिंदुत्व की सबसे बड़ी कमजोरी है—
दलित और आदिवासी वोट का खिसकना।
और यहीं आता है प्लान का सबसे विस्फोटक हिस्सा—

पॉइंट नंबर 3: ‘दलितों के घर डिनर’

बंगाल में 30% से अधिक आबादी दलित समुदाय की है।
संघ की रिपोर्ट कहती है—
“अगर दलित अलग हुए, तो हिंदुत्व हार जाएगा।”
इसका समाधान क्या निकला?
सवर्ण स्वयंसेवकों को आदेश
दलितों के घर जाना है
उनके साथ खाना खाना है
उनकी रसोई में
और कई मामलों में रात वहीं गुजारनी है
ग्राउंड डेटा:
अप्रैल 2025 से अब तक
5000 से ज्यादा दलित घरों में
RSS कार्यकर्ता रात बिता चुके हैं।
मकसद साफ है—
“जो दीवारें सदियों से खड़ी हैं,
उन्हें भाषण से नहीं,
थाली से तोड़ा जाएगा।”
संघ का मूल मंत्र दोहराया जा रहा है—
“हिन्दवः सोदरा: सर्वे”
(सभी हिंदू सगे भाई हैं)
नारा पुराना है,
तरीका नया है—
“बंटेंगे तो कटेंगे”

पॉइंट नंबर 4: डर का नैरेटिव – बॉर्डर पार से

इमोशनल कनेक्ट के बाद
अगला हथियार है—डर।
संघ का सबसे ज्यादा फोकस है—
संदेशखाली
क्यों?
क्योंकि यह इलाका
बांग्लादेश बॉर्डर से सिर्फ 15 किलोमीटर दूर है।
घर-घर जाकर सुनाई जा रही हैं—
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले की कहानियाँ
मंदिरों के टूटने की तस्वीरें
जबरन पलायन की घटनाएँ
नैरेटिव बेहद सिंपल है—
“आज बांग्लादेश में जो हुआ,
कल वही बंगाल में हो सकता है।”
संघ इसे कहता है—
‘प्रचंड हिंदुत्व’
बुद्धिजीवियों से सीधा सवाल पूछा जा रहा है—
“गाजा दिखता है,
लेकिन 15 किलोमीटर दूर ढाका का हिंदू क्यों नहीं?”
यह सीधा और सोचा-समझा ध्रुवीकरण है।

पॉइंट नंबर 5: ममता के सबसे मजबूत किले पर हमला — महिलाएं

ममता बनर्जी का सबसे भरोसेमंद वोट बैंक रही हैं—
महिलाएं।
लेकिन संघ की रिपोर्ट कहती है—
“यहीं सबसे बड़ी सेंध लग सकती है।”
उदाहरण गिनाए जा रहे हैं—
आरजी कर अस्पताल रेप केस
संदेशखाली की घटनाएं
कानून-व्यवस्था पर सवाल
घर-घर जाकर महिलाओं से कहा जा रहा है—
“दीदी के राज में
हिंदू महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं।”
घुसपैठ,
बदलती डेमोग्राफी,
और भविष्य का डर—
यह सब जोड़कर एक ही सवाल छोड़ा जा रहा है—
“अगर अब नहीं जागीं,
तो कल बहुत देर हो जाएगी।”
ग्राउंड वॉर रूम बनाम सरकारी मशीनरी
दोस्तों, तस्वीर अब बिल्कुल साफ है—
एक तरफ—
टीएमसी की सरकारी मशीनरी, योजनाएं और प्रचार
दूसरी तरफ—
RSS का ग्राउंड वॉर रूम,
जहाँ न रैली है,
न मंच…
बस— एक घर
एक थाली
और एक दिमाग
फरवरी 2026 में संघ का एक इंटरनल सर्वे भी आने वाला है,
जो बताएगा कि ये रणनीति कितनी असरदार रही।

निष्कर्ष: 2026 सिर्फ चुनाव नहीं होगा

यह चुनाव
सिर्फ विकास बनाम सरकार का नहीं होगा।
यह चुनाव होगा—
अस्तित्व बनाम सत्ता
पहचान बनाम प्रशासन
और डर बनाम भरोसे का
संघ की ‘डिनर डिप्लोमेसी’
ममता के वोट बैंक को पचा पाएगी या नहीं—
यह वक्त बताएगा।
लेकिन इतना तय है—
बंगाल की जमीन पर बिसात बिछ चुकी है।

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