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NCERT का ‘हलाहल’ और सवर्णों की नाराजगी: क्या धर्मेंद्र प्रधान के राजनीतिक रसूख पर लगेगा पूर्णविराम?

​नई दिल्ली | विशेष विश्लेषण: ‘अखिलीयक्स’ के लिए ​कहते हैं कि दिल्ली की सत्ता में बैठना ‘कांच के घर’ में रहने जैसा है, जहाँ एक छोटी सी पत्थर की कंकड़ भी पूरे शीशमहल को चटका सकती है। इस समय वह पत्थर बना है NCERT की आठवीं कक्षा का एक पाठ। जिस न्यायपालिका को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है, उसी के बारे में अगर स्कूली बच्चों को ‘भ्रष्टाचार’ का पाठ पढ़ाया जाए, तो धमाका होना लाजिमी था। लेकिन यह धमाका सिर्फ अदालती कमरों तक सीमित नहीं रहा, इसकी गूँज अब सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक जा पहुँची है। ‘अखिलीयक्स’ की इस विशेष पड़ताल में हम गहराई से समझेंगे कि क्या यह केवल एक ‘एडिटोरियल एरर’ है या फिर शिक्षा मंत्रालय के भीतर बैठे किसी धड़े की सोची-समझी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’? आखिर वे कौन सी ताकतें थीं जिन्होंने चुपके से इस विवादित अंश को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना दिया?

​जरा सोचिए, देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जब भरी अदालत में यह कहें कि “हमें जानना है इसके पीछे कौन है”, तो इसका सीधा मतलब है कि अब महज एक औपचारिक माफीनामा काम नहीं आएगा। सुप्रीम कोर्ट का गुस्सा जायज है; न्यायपालिका की छवि को धूमिल करना सीधे तौर पर संविधान की गरिमा से खिलवाड़ है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि NCERT ने माफी मांगकर और किताब वापस लेकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश तो की है, लेकिन ‘लहूलुहान’ तो न्यायपालिका की साख हुई है। अब सवाल यह उठता है कि क्या शिक्षा मंत्रालय ने इस किताब को फाइनल प्रिंटिंग से पहले रिव्यू नहीं किया था? क्या ब्यूरोक्रेसी इतनी बेलगाम हो गई है कि उसे इतनी बड़ी गलती का अहसास तक नहीं हुआ? यहाँ मामला सिर्फ एक विभाग का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की प्रशासनिक पकड़ पर सवालिया निशान लगाता है।

​लेकिन प्रधान की मुश्किलें सिर्फ अदालती कमरों तक सीमित नहीं हैं। ‘अखिलीयक्स’ की पड़ताल में एक और बड़ा मोर्चा खुला है—और वह है सवर्ण समाज की गहरी नाराजगी। हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों और नियुक्तियों को लेकर जो बवाल मचा, उसने बीजेपी के कोर वोटर यानी सवर्णों को सड़क पर उतरने को मजबूर कर दिया है। बतौर शिक्षा मंत्री, धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका इस विवाद में सीधे रडार पर है। सवर्ण समाज का स्पष्ट आरोप है कि प्रधान के कार्यकाल में उनके हितों की अनदेखी हुई और यूजीसी के फैसलों ने ‘योग्यता’ (Merit) से ज्यादा ‘राजनीतिक इंजीनियरिंग’ को तवज्जो दी। सवर्ण समाज की यह नाराजगी 2026 की चुनावी बिसात में बीजेपी के लिए महंगी साबित हो सकती है, और इस पूरे असंतोष का ठीकरा अब धर्मेंद्र प्रधान के सिर फूट रहा है। एक तरफ न्यायपालिका की तल्खी और दूसरी तरफ अपने ही आधार वोट बैंक का गुस्सा; प्रधान अब ‘दो पाटों’ के बीच फंस गए हैं।

​सूत्रों के हवाले से जो खबर छनकर आ रही है, वह धर्मेंद्र प्रधान के समर्थकों की नींद उड़ाने वाली है। हालिया कैबिनेट बैठक में जब इन मुद्दों का जिक्र आया, तो प्रधानमंत्री मोदी का सख्त तेवर उनकी नाराजगी बयां कर रहा था। बताया जा रहा है कि प्रधान ने अपनी सफाई में जो तर्क दिए, उनसे पीएम कतई संतुष्ट नहीं हुए। मोदी सरकार की कार्यशैली हमेशा से ‘जीरो टॉलरेंस’ वाली रही है, खासकर जब बात संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान और अपने कोर वोटर के विश्वास की हो। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में प्रधान से कह दिया है—’जिम्मेदारी तय कीजिए।’ राजनीति के जानकार जानते हैं कि जब पीएम इस तरह के निर्देश देते हैं, तो इसका मतलब होता है कि किसी न किसी बड़े नाम की छुट्टी अब तय मानी जा रही है।

​धर्मेंद्र प्रधान की पहचान हमेशा से एक ‘लो प्रोफाइल’ लेकिन ‘हाई इम्पैक्ट’ परफॉर्मर की रही है। 2014 से लेकर अब तक का उनका सफर वफादारी और रणनीतिक कौशल की मिसाल रहा है। उन्होंने ‘उज्ज्वला’ योजना के जरिए बीजेपी को वह ‘वोट बैंक’ दिया जिसकी कल्पना विपक्ष ने भी नहीं की थी और वे हमेशा से अमित शाह के चुनावी मैनेजमेंट के सबसे भरोसेमंद प्यादे रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या उनका पिछला ‘गुडविल’ वर्तमान की इन दोहरी चुनौतियों—UGC और NCERT—के दागों को ढँक पाएगा? क्या सवर्णों की नाराजगी के बीच प्रधान का ‘पिछड़ा कार्ड’ उन्हें इस संकट से उबार पाएगा? 2026 की राजनीति में प्रदर्शन से ज्यादा ‘परसेप्शन’ (धारणा) का खेल भारी पड़ता दिख रहा है।

​’अखिलीयक्स’ के पास मौजूद जानकारी के मुताबिक, शिक्षा मंत्रालय के भीतर पिछले कुछ समय से समन्वय की भारी कमी देखी जा रही है। यूजीसी के विवादित फैसलों से लेकर एनसीआरटी की किताबों में ‘भ्रष्टाचार’ वाले अंश का जुड़ना, ये महज इत्तेफाक नहीं हो सकते। क्या यह संभव है कि मंत्रालय के भीतर सक्रिय किसी लॉबी ने जानबूझकर ऐसे फैसले लिए जिससे मंत्री और सरकार की छवि खराब हो? लोकतंत्र में अंतिम जवाबदेही हमेशा मंत्री की होती है। प्रधान के सामने अब दो ही रास्ते शेष हैं: या तो वे तंत्र की ‘क्लीनिंग’ कर कठोर उदाहरण पेश करें, या फिर इस चौतरफा राजनीतिक दबाव के आगे सरेंडर कर दें।

​यह विवाद अब सिर्फ एक किताब के पन्ने या एक नियम की फाइल तक सीमित नहीं रहा। यह लड़ाई है मोदी सरकार की उस साख को बचाने की, जो उसने अपने मतदाताओं और संस्थाओं के बीच वर्षों में बनाई थी। धर्मेंद्र प्रधान जैसे कद्दावर नेता के लिए यह उनके करियर का ‘अग्निपथ’ साबित हो रहा है। अगर वे सवर्णों की नाराजगी दूर नहीं कर पाए और सुप्रीम कोर्ट को संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए, तो दिल्ली के सत्ता समीकरणों में उनकी स्थिति बेहद कमजोर हो जाएगी। अब देखना यह है कि क्या प्रधान एक बार फिर अपनी ‘लॉयल्टी’ के दम पर इस राजनीतिक चक्रव्यूह से बाहर निकल पाएंगे, या फिर इस बार गाज उन्हीं पर गिरेगी।

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