MP Rajya Sabha Race 2026: दिग्विजय का ‘दलित मास्टरस्ट्रोक’ या BJP का आंतरिक महायुद्ध?
साल 2026 मध्यप्रदेश की राजनीति के लिए निर्णायक साबित होने जा रहा है। राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं और इन सीटों को लेकर जो सियासी बिसात बिछ चुकी है, उसने भोपाल से दिल्ली तक हलचल मचा दी है। यह सिर्फ एक संसदीय चुनाव नहीं है, बल्कि सत्ता के भविष्य, संगठन की दिशा और 2028 के विधानसभा चुनावों की रणनीति का ट्रायल रन भी है।
सबसे बड़ा सस्पेंस कांग्रेस खेमे से पैदा हुआ है। वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने खुद राज्यसभा चुनाव लड़ने से इनकार करते हुए एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया—“मेरी जगह किसी दलित चेहरे को राज्यसभा भेजा जाए।” पहली नजर में यह सामाजिक न्याय का बयान लगता है, लेकिन Akhileaks विश्लेषण कहता है कि यह एक गहरा रणनीतिक दांव है।
यह बयान दरअसल एक तीर से दो शिकार करने की कोशिश है। पहला, पार्टी के भीतर मौजूद अन्य दावेदारों—जैसे अरुण यादव या अजय सिंह—के लिए रास्ता मुश्किल कर दिया गया है। अब अगर कांग्रेस हाईकमान किसी गैर-दलित चेहरे को चुनती है, तो सामाजिक संदेश पर सवाल उठेंगे। दूसरा, यह दबाव की राजनीति भी हो सकती है—क्या दिल्ली दरबार को यह संकेत दिया गया है कि “आपके बिना कांग्रेस MP में कमजोर पड़ेगी”? अगर दलित चेहरा जाता है तो श्रेय दिग्विजय को जाएगा, और अगर वे खुद जाते हैं तो पहले से अधिक ताकतवर होकर।
दूसरी तरफ असली ‘महा-संग्राम’ भाजपा की दो सीटों को लेकर है। भाजपा के भीतर दावेदारों की लंबी फेहरिस्त है। पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा और संगठन के मजबूत रणनीतिकार अरविंद भदौरिया—दोनों को केंद्रीय नेतृत्व के करीबी माना जाता है। सवाल यह है कि क्या विधानसभा चुनाव की हार के बाद यह राज्यसभा सीट उनके ‘सियासी वनवास’ का अंत करेगी?
इसी कतार में कांग्रेस से भाजपा में आए वरिष्ठ नेता सुरेश पचौरी और रामनिवास रावत भी हैं। क्या पार्टी इन्हें वफादारी का ईनाम देगी? संगठन के स्तर पर लाल सिंह आर्य और विनोद गोटिया जैसे नामों को भी नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
भाजपा के भीतर एक और चर्चा है—क्या पार्टी 2028 को ध्यान में रखते हुए ‘हिंदुत्व कार्ड’ या ‘महिला कार्ड’ खेलेगी? किसी बड़े संत, साधु या प्रभावशाली महिला चेहरे को राज्यसभा भेजकर व्यापक सामाजिक संदेश देने की रणनीति भी बन सकती है। वहीं, ‘लोकल बनाम बाहरी’ का समीकरण भी अहम होगा। मध्यप्रदेश इकाई चाहती है कि स्थानीय समीकरणों को प्राथमिकता दी जाए, जबकि दिल्ली नेतृत्व राष्ट्रीय संतुलन देख रहा है।
अगर कांग्रेस हाईकमान दिग्विजय सिंह के सुझाव को स्वीकार करता है, तो दलित चेहरे के रूप में प्रदीप अहिरवार जैसे नाम चर्चा में आ सकते हैं। इसके जवाब में भाजपा भी आदिवासी या दलित चेहरा आगे कर कांग्रेस के नैरेटिव को संतुलित करने की कोशिश कर सकती है। यानी सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति इस बार निर्णायक हो सकती है।
सार यह है कि राज्यसभा की ये तीन सीटें केवल संसद की कुर्सियां नहीं हैं। ये तय करेंगी कि आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश की राजनीति का रिमोट किसके हाथ में रहेगा। क्या कांग्रेस सामाजिक संतुलन का नया अध्याय लिखेगी? या भाजपा संगठन और वफादारी के समीकरण से बाजी मार लेगी?
Akhileaks इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए है। पर्दे के पीछे चल रही हर हलचल, हर लॉबिंग और हर सियासी संकेत का विश्लेषण आपको यहां मिलेगा।
आपकी राय क्या है? क्या दिग्विजय सिंह की जगह किसी दलित चेहरे को मौका मिलना चाहिए? और भाजपा की ओर से आपका पसंदीदा दावेदार कौन है? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।



