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MP बोर्ड का ‘डिजिटल डाका’: 96 करोड़ के कंप्यूटर बने कबाड़, 61 करोड़ की डकैती का पूरा कच्चा चिट्ठा

पेपर लीक रोकने के नाम पर हुआ महाघोटाला; ₹46,000 का कंप्यूटर ₹1.39 लाख में खरीदा। वारंटी के बावजूद मेंटेनेंस पर फूंके ₹27 करोड़। पढ़िए अखिलेश सोलंकी की विशेष रिपोर्ट।

भूमिका: सिस्टम की ‘लीकेज’
​मध्य प्रदेश में पेपर लीक होना अब कोई नई बात नहीं रही, लेकिन इस बार जो ‘लीक’ हुआ है, उसने सरकारी खजाने की चूलें हिला दी हैं। माध्यमिक शिक्षा मंडल (माशिमं) ने दावा किया था कि वह ‘डिजिटल’ होकर पेपर लीक पर लगाम लगाएगा। इसके लिए आनन-फानन में ₹96.51 करोड़ के उपकरण खरीदे गए। विजन आधुनिक था, लेकिन नीयत? नीयत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज तीन साल बाद ये करोड़ों के उपकरण स्कूलों के स्टोर रूम में कबाड़ बन रहे हैं और पेपर आज भी थानों के चक्कर काटकर परीक्षा केंद्रों तक पहुँच रहे हैं।

घोटाले का गणित: बाजार भाव बनाम सरकारी भाव

  • ​’अखिलीक्स’ की पड़ताल में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। सरकारी खरीद में पारदर्शिता के लिए बने ‘जेम पोर्टल’ (GeM) के रेट्स को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया।
  • ​डेस्कटॉप कंप्यूटर: जिस कंप्यूटर सेट की कीमत एक साल की वारंटी के साथ ₹46,000 थी, उसे मंडल ने ₹1,39,000 में खरीदा।
  • ​फोटोकॉपियर मशीन: बाजार में ₹48,405 की मिलने वाली मशीन को ₹1.27 लाख प्रति नग की दर से खरीदा गया।
  • ​यूपीएस (UPS): ₹4,900 के यूपीएस के लिए ₹9,745 का भुगतान किया गया।
  • ​कुल मिलाकर, लगभग 3500 परीक्षा केंद्रों के लिए की गई इस खरीदी में जनता के टैक्स के ₹61.74 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान किया गया। सवाल यह है कि आखिर ये ‘मलाई’ किसकी जेब में गई?

मेंटेनेंस के नाम पर ‘मलाई’ की बंदरबांट
​भ्रष्टाचार सिर्फ सामान खरीदने तक सीमित नहीं रहा। नियम के मुताबिक, जो उपकरण वारंटी पीरियड में होते हैं, उनके रखरखाव का खर्च कंपनी उठाती है। लेकिन माशिमं ने यहाँ भी दरियादिली दिखाई। उपकरणों पर एक साल की वारंटी होने के बावजूद, जून 2024 में ₹9.2 करोड़ का सालाना मेंटेनेंस बजट मंजूर कर दिया गया। पिछले तीन सालों में ₹27.6 करोड़ उन मशीनों की सर्विसिंग पर खर्च कर दिए गए, जिनका उपयोग बोर्ड की किसी मुख्य परीक्षा में हुआ ही नहीं। रेल ट्रेल, नेक्सजेन और हेवेन टेक जैसी कंपनियों पर यह मेहरबानी कई गंभीर सवाल खड़े करती है।

​जिम्मेदारों का ‘मौन’ और प्रशासनिक विफलता
​जब इस पूरे मामले पर ‘अखिलीक्स’ ने जवाब माँगा, तो जवाबदेही से बचने का पुराना खेल शुरू हो गया। मंडल के सचिव बुद्धेश कुमार वैद्य का कहना है कि उन्हें इस खरीदी की जानकारी नहीं है। वहीं, चेयरमैन स्मिता भारद्वाज ने चुप्पी साध ली है। सवाल यह उठता है कि अगर विभाग के मुखिया को ही ₹96 करोड़ के खर्च की जानकारी नहीं है, तो फिर प्रशासन चला कौन रहा है?

​निष्कर्ष: छात्रों के भविष्य से गद्दारी
​यह सिर्फ आंकड़ों की हेराफेरी नहीं है, यह उन लाखों छात्रों के साथ गद्दारी है जो एक सुरक्षित और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली की उम्मीद करते हैं। पेपर लीक नहीं रुके, लेकिन डिजिटल सिस्टम के नाम पर करोड़ों की डकैती जरूर डाल दी गई। ‘अखिलीक्स’ इस मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग करता है।

​डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सार्वजनिक दस्तावेजों और जमीनी पड़ताल पर आधारित है।

​आप क्या सोचते हैं?
क्या आपको लगता है कि इस घोटाले की जांच किसी केंद्रीय एजेंसी से होनी चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में साझा करें और इस रिपोर्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि सच सबके सामने आ सके।

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