MP का ‘कागज’ कांड: अधिकारियों का ‘SS’ खेल और करोड़ों की मलाई!
नमस्कार, मैं हूँ अखिलेश सोलंकी… और आप पढ़ रहे हैं Akhileaks.com — जहाँ खबर नहीं, खबर के पीछे की सच्चाई दिखाई जाती है। मध्य प्रदेश पाठ्य पुस्तक निगम इन दिनों एक ऐसे विवाद के केंद्र में है जिसने सरकारी खरीद व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला सिर्फ कागज खरीदने का नहीं है, मामला उस सिस्टम का है जहाँ तकनीकी शब्दों की आड़ में करोड़ों रुपये के खेल की आशंका जताई जा रही है। शिक्षा सत्र 2026-27 के लिए लगभग 35 हजार मीट्रिक टन कागज खरीदने की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन टेंडर की शर्तों में हुए एक बदलाव ने पूरे विभाग को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है। आरोप है कि एमडी विनय निगम और जीएम संजीव त्यागी की अगुवाई में ऐसी शर्तें जोड़ी गईं जिनसे कुछ चुनिंदा सप्लायर्स को लाभ पहुँचाने की जमीन तैयार हुई।
विवाद की जड़ में वह शब्द है जिसे टेंडर में विशेष महत्व दिया गया — “SS मैपलिथो”। बताया जा रहा है कि पिछले कई दशकों से सामान्य “मैपलिथो पेपर” पर बिना किसी बड़े विवाद के पाठ्यपुस्तकें छपती रही हैं। ऐसे में अचानक “SS” यानी Surface Sizing को अनिवार्य या प्रमुख बनाना कई सवाल खड़े करता है। क्या यह गुणवत्ता सुधार का प्रयास था? या फिर यह एक तकनीकी फिल्टर था जिसके जरिए प्रतिस्पर्धा सीमित की गई? यही वह बिंदु है जहाँ से पूरा मामला गर्माया। क्योंकि जब किसी लंबे समय से चली आ रही प्रक्रिया में अचानक तकनीकी बदलाव हो और उसका स्पष्ट वैज्ञानिक आधार सामने न आए, तो संदेह स्वाभाविक हो जाता है।
सूत्रों का दावा है कि इस बदलाव के बाद देश की कई बड़ी और स्थापित पेपर कंपनियाँ टेंडर की दौड़ से बाहर होती दिखीं। उद्योग जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि कोई मानक व्यापक रूप से स्वीकृत नहीं है, उसकी परीक्षण पद्धति स्पष्ट नहीं है और फिर भी उसे खरीद की अनिवार्य शर्त बना दिया जाए, तो यह निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा की भावना के खिलाफ माना जा सकता है। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि “SS” इतना ही आवश्यक था, तो इसे पहले क्यों नहीं अपनाया गया? और यदि यह नया मानक है, तो क्या इसके लिए विस्तृत तकनीकी अध्ययन, स्वतंत्र परीक्षण और विशेषज्ञ समिति की राय ली गई?
प्री-बिड मीटिंग को लेकर भी कई दावे सामने आए हैं। बताया जा रहा है कि संभावित बोलीदाताओं ने अधिकारियों से पूछा कि “SS” की स्पष्ट परिभाषा क्या है, इसकी माप कैसे होगी, कौन सी लैब इसे प्रमाणित करेगी और अस्वीकृति का आधार क्या होगा। लेकिन आरोप है कि इन सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। यदि यह सही है, तो यह स्थिति और गंभीर हो जाती है, क्योंकि सरकारी खरीद में हर शर्त का उद्देश्य स्पष्ट, मापनीय और समान रूप से लागू होने योग्य होना चाहिए। यदि शर्त ही अस्पष्ट हो, तो पूरी प्रक्रिया विवादित बन जाती है।
मामले में सबसे अधिक चर्चा उन कथित लैब रिपोर्ट्स की हो रही है जिन्हें अधिकारियों द्वारा आधार बनाया गया। दावा किया जा रहा है कि भारत सरकार से जुड़ी प्रतिष्ठित संस्था CPPRI ने यह संकेत दिया कि “SS” की टेस्टिंग के लिए वर्तमान में कोई मानकीकृत पद्धति उपलब्ध नहीं है। यदि ऐसा है, तो बड़ा सवाल यह है कि फिर खरीद का निर्णय किस वैज्ञानिक कसौटी पर आधारित था? दूसरी ओर आईआईटी रुड़की से जुड़ी एक रिपोर्ट का भी जिक्र हो रहा है, जिसमें कथित तौर पर टेस्ट मेथड कॉलम स्पष्ट नहीं था। यदि परीक्षण पद्धति ही दर्ज न हो, तो रिपोर्ट की वैधता, उपयोगिता और प्रशासनिक स्वीकार्यता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यही वह बिंदु है जहाँ मामला तकनीकी बहस से निकलकर प्रशासनिक जवाबदेही तक पहुँचता है। क्योंकि किसी भी सरकारी खरीद में तीन बातें सबसे महत्वपूर्ण होती हैं — मानक, प्रक्रिया और पारदर्शिता। यदि मानक अस्पष्ट हो, प्रक्रिया विवादित हो और पारदर्शिता पर सवाल उठें, तो फिर जनता के पैसे के उपयोग पर गंभीर चिंता पैदा होती है। पाठ्य पुस्तक निगम जैसे संस्थान का सीधा संबंध छात्रों, स्कूलों और शिक्षा व्यवस्था से है। यहाँ होने वाली हर खरीद सिर्फ वित्तीय मामला नहीं होती, बल्कि इसका असर लाखों विद्यार्थियों तक जाता है।
सूत्र यह भी दावा कर रहे हैं कि कुछ चुनिंदा कंपनियों को इस बदलाव से लाभ मिलने की संभावना बनी। शाह पेपर मिल्स, खन्ना पेपर मिल्स और चड्ढा पेपर मिल्स जैसे नाम चर्चाओं में लिए जा रहे हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन यदि किसी टेंडर की संरचना ऐसी बन जाए कि प्रतिस्पर्धा सीमित हो और कुछ ही खिलाड़ी मजबूत स्थिति में दिखें, तो शासन को स्वतः संज्ञान लेना चाहिए। सरकारी खरीद का मूल सिद्धांत यही है कि अधिकतम योग्य प्रतिभागियों को समान अवसर मिले, ताकि बेहतर गुणवत्ता और उचित दर सुनिश्चित हो सके।
एक और बड़ा सवाल राष्ट्रीय मानकों का है। यदि NCERT जैसी संस्थाएँ किसी विशेष मानक को अनिवार्य नहीं मानतीं, तो फिर राज्य स्तर पर उससे अलग रास्ता अपनाने का आधार क्या था? क्या मध्य प्रदेश पाठ्य पुस्तक निगम ने कोई स्वतंत्र शोध कराया? क्या किसी विशेषज्ञ समिति ने इसकी अनुशंसा की? क्या लागत-लाभ विश्लेषण किया गया? क्या गुणवत्ता में मापनीय सुधार के प्रमाण मौजूद हैं? यदि इन सवालों के जवाब दस्तावेजों में नहीं हैं, तो फिर संदेह और गहरा होता है।
इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू आर्थिक है। यदि टेंडर प्रक्रिया विवादों में उलझती है, अदालतों तक जाती है, आपत्तियाँ लगती हैं और खरीद में देरी होती है, तो उसका बोझ अंततः जनता पर पड़ता है। सरकारी संस्थाओं की कानूनी लड़ाइयों में खर्च भी जनता के पैसे से होता है और देरी का असर भी सार्वजनिक सेवाओं पर पड़ता है। शिक्षा क्षेत्र में तो देरी का मतलब किताबों की छपाई, सप्लाई और वितरण पर असर भी हो सकता है। यानी यह सिर्फ फाइलों का विवाद नहीं, व्यवस्था की कार्यक्षमता का सवाल है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न जवाबदेही का है। यदि सब कुछ नियमों के तहत हुआ है, तो सरकार और निगम को पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक करनी चाहिए। टेंडर ड्राफ्ट किसने बनाया? “SS” जोड़ने की अनुशंसा किसने की? किन विशेषज्ञों से राय ली गई? कौन-कौन सी लैब रिपोर्ट्स उपलब्ध हैं? किस आधार पर तकनीकी योग्यता तय हुई? यदि ये सारे उत्तर रिकॉर्ड पर हैं, तो विवाद स्वतः शांत हो सकता है। लेकिन यदि चुप्पी बनी रहती है, तो संदेह और आरोप दोनों बढ़ते जाएंगे।
Akhileaks यह मानता है कि किसी भी अधिकारी या संस्था पर लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि प्रक्रिया सही है, तो सच सामने आए। यदि गड़बड़ी हुई है, तो जिम्मेदारी तय हो। लोकतंत्र में दस्तावेज़ सबसे बड़े गवाह होते हैं। फाइलें, नोटशीट, तकनीकी राय, मीटिंग मिनट्स और टेंडर शर्तें — यही तय करती हैं कि निर्णय नीति से हुआ या पक्षपात से। मध्य प्रदेश के इस कथित “कागज कांड” में भी अब जरूरत शोर की नहीं, सच्चाई की है।
क्योंकि जब सवाल शिक्षा के नाम पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपये का हो… तब हर पन्ना बोलना चाहिए, हर दस्तखत जवाब देना चाहिए और हर निर्णय जांच की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। Akhileaks इस मामले पर अपनी नजर बनाए हुए है। सच सामने आएगा… क्योंकि कागज कभी झूठ नहीं बोलता।



