मोहन सरकार के 2 साल: ‘गोल्डन पीरियड’ या ‘कर्ज़ का वेंटीलेटर’? मध्य प्रदेश की असल स्थिति का Akhileaks विश्लेषण
दिसंबर 2025 में मध्य प्रदेश की राजनीति एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। राज्य में सत्ता परिवर्तन को पूरे 730 दिन बीत चुके हैं। वल्लभ भवन के गलियारों में फाइलें वही हैं—पर कुर्सियों पर बैठे चेहरे बदल चुके हैं।
2023 में जब ‘पर्ची’ खुली और डॉ. मोहन यादव मुख्यमंत्री बने, तब सबसे बड़ा सवाल था—क्या वह शिवराज सिंह चौहान की राजनीतिक विरासत को सम्भाल पाएँगे?
2025 आते-आते सवाल बदल चुका है—
क्या मध्य प्रदेश विकास के ‘गोल्डन पीरियड’ में है, या फिर हम बढ़ते सरकारी कर्ज़ पर टिका एक ‘कृत्रिम विकास मॉडल’ देख रहे हैं?
Akhileaks की यह विशेष रिपोर्ट इन्हीं प्रश्नों के पीछे की सच्चाई तलाशती है—आँकड़ों, नीतियों और ज़मीनी फीडबैक के आधार पर।
लाड़ली बहना योजना: कल्याण या कर्ज़ आधारित लोकप्रियता?
शिवराज सिंह चौहान राज्य की राजनीति में “भावनाओं का अर्थशास्त्र” स्थापित कर गए थे।
लाड़ली बहना योजना उसकी सबसे बड़ी मिसाल है।
मोहन सरकार के 2 वर्षों में:
योजना बंद नहीं हुई
योजना पर राशि बढ़ाकर 1250 → 1500 रुपये करने का प्रस्ताव सामने आया
गरीबी रेखा के परिवारों के लिए यह सीधी राहत बनी
महिला वोट बैंक लगभग सुरक्षित हो गया
लेकिन इस राहत की एक कीमत है—और वह केवल सरकार नहीं, भविष्य की पीढ़ियाँ चुका रही हैं।
वित्तीय वास्तविकता:
मध्य प्रदेश का कर्ज़ 4 लाख करोड़ रुपये पार
इन्फ्रास्ट्रक्चर बजट सिकुड़ता हुआ
ठेकेदारों की भुगतान प्रणाली में देरी
पूंजीगत व्यय की रफ्तार धीमी
स्कीम-heavy मॉडल, revenue-light मॉडल
Akhileaks का सवाल:
क्या यह कल्याणकारी अर्थव्यवस्था है, या कर्ज़ आधारित राजनीतिक स्थिरता?
क्या हर महीने आने वाली राशि की खुशी, राज्य के वित्तीय स्वास्थ्य पर भारी पड़ रही है?
इन्वेस्टर समिट बनाम जमीनी रोजगार: वादों की चमक और हकीकत की धुंध
मोहन सरकार ने एक नई रणनीति अपनाई—
“इन्वेस्टर को आमंत्रित मत करो… इन्वेस्टर तक खुद जाओ।”
इसका परिणाम—
रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव (RIC) का बड़ा विस्तार:
उज्जैन, ग्वालियर, रीवा, जबलपुर और अब शहडोल।
सरकार के दावे:
लाखों करोड़ के निवेश प्रस्ताव
MSME सेक्टर में नए अवसर
बड़े कॉरपोरेट की रुचि में वृद्धि
Akhileaks की जांच के निष्कर्ष:
MoU साइन होना = निवेश नहीं होता
प्रस्तावों का बड़ा हिस्सा अभी ‘कागज’ तक सीमित
2025 में शुरू हुई नई फैक्ट्रियों की संख्या बेहद कम
रोजगार आंकड़े योजनाओं की गति के अनुरूप नहीं
कई जिलों में कॉन्क्लेव के बाद ग्राउंड-लेवल साइलेंस
सरल शब्दों में—
फ़ोटो और इवेंट में इंडिया शाइन कर रही है… लेकिन फैक्ट्री की चिमनियों में अब भी धुआँ नहीं उठ रहा।
कानून-व्यवस्था: ‘सख्त सरकार’ की इमेज पर सवाल
एक समय था जब मध्य प्रदेश को “शांति का टापू” कहा जाता था।
लेकिन NCRB के ताज़ा आंकड़े इस छवि को चुनौती देते हैं।
प्रमुख मुद्दे:
दलित–आदिवासी अत्याचार के बढ़ते मामले
चाकूबाजी और सड़क अपराधों में वृद्धि
इंदौर–भोपाल में कमिश्नरेट सिस्टम के बावजूद अपराध नियंत्रण में सीमाएँ
सरकार की प्रतिक्रिया:
बुलडोजर मॉडल
त्वरित दंड
कार्यपालिका द्वारा सीधा हस्तक्षेप
Akhileaks का आकलन:
बुलडोजर ‘तत्काल न्याय’ दे सकता है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं।
अंदरूनी सवाल भी गंभीर हैं—
भाजपा नेताओं पर कार्रवाई धीमी क्यों?
भ्रष्टाचार के मामलों में प्रशासनिक कठोरता गायब क्यों?
पटवारी भर्ती घोटाले की जांच रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं?
निष्कर्ष यही है—सख्ती चयनित है, सार्वभौमिक नहीं।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: मोहन सरकार की सबसे मजबूत पकड़
महाकाल लोक के बाद सरकार ने कई बड़े धार्मिक–सांस्कृतिक प्रोजेक्ट शुरू किए:
कृष्ण पाथेय
राम वन गमन पथ
2028 सिंहस्थ की व्यापक तैयारियाँ
राजनीतिक रूप से यह सरकार की सबसे सुरक्षित जमीन है।
मोहन यादव की छवि एक “सनातनी मुख्यमंत्री” के रूप में मजबूत हुई है।
परंतु सवाल यहाँ भी वही—
क्या धार्मिक इंफ्रास्ट्रक्चर रोजगार और आर्थिक स्वास्थ्य की जगह ले सकता है?
प्रशासनिक शैली: शिवराज की छाया से बाहर निकलने की कोशिश
मोहन सरकार ने कई प्रशासनिक प्रयोग किए:
कैबिनेट बैठकों को भोपाल के बाहर ले जाना
जिला–केंद्रित निर्णय मॉडल
विकेंद्रीकरण पर जोर
नई टीम और नए चेहरों का उदय
यहाँ सरकार ने अपनी अलग पहचान बनाई, लेकिन अभी भी:
कई विभागों में पुरानी कार्यशैली का प्रभाव
निर्णय प्रक्रिया में देरी
जनभागीदारी की गति सीमित
सरकार की इमेज मजबूत है—
लेकिन इम्पैक्ट अभी मिश्रित है।
Akhileaks निष्कर्ष: ‘पास’ या ‘फेल’ नहीं—चित्र मिश्रित है
डॉ. मोहन यादव की सरकार ने कुछ क्षेत्रों में प्रभाव दिखाया है—
खासकर सांस्कृतिक प्रोजेक्ट्स और पब्लिक इमेज बिल्डिंग में।
लेकिन अर्थव्यवस्था, रोजगार, कानून-व्यवस्था और निवेश जैसे कोर सेक्टर्स में अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है।
संतुलित आकलन:
लाड़ली बहना — लोकप्रिय, लेकिन वित्तीय बोझ
RIC & निवेश — उत्साहजनक, पर अधूरी सफलता
कानून-व्यवस्था — सख्त इमेज, कमजोर परिणाम
सांस्कृतिक राजनीति — मजबूत, पर सीमित प्रभाव
प्रशासनिक मॉडल — साहसी, पर असंगत गति
लोकतंत्र में अंतिम रिपोर्ट कार्ड जनता लिखती है—
और वह स्टूडियो में नहीं, पोलिंग बूथ पर लिखा जाता है।



