मध्यप्रदेश का फसल बीमा घोटाला: किसानों की बरबादी, कंपनियों की कमाई
लेखक: अखिलेश सोलंकी, Akhileaks
शुरुआत: मंच पर तालियाँ, गाँव में आँसू
11 अगस्त 2025, भोपाल। मुख्यमंत्री मोहन यादव मंच पर थे, पीछे बड़े LED स्क्रीन पर किसानों की फोटो। भाषण गूंजा —
“हमने किसानों के लिए ₹1,156 करोड़ की फसल बीमा राशि ट्रांसफर की है।”
मंच पर तालियाँ बजीं।
लेकिन उसी वक्त सीहोर का किसान हरिओम वर्मा पासबुक अपडेट कराने पहुँचा। खाते में पैसा आया था — सिर्फ़ ₹1269।
यही है फसल बीमा योजना की असलियत।
किसानों के अनुभव: प्रीमियम भारी, क्लेम ऊंट के मुँह में जीरा
हरिओम वर्मा (सीहोर): ₹1500 प्रीमियम कटा, क्लेम मिला सिर्फ़ ₹1269।
गौरीशंकर (सीहोर): ₹1.10 लाख का हक़, मिला ₹2420।
मुकेश मीणा (14 एकड़, सीहोर): ₹4400 प्रीमियम, क्लेम ₹3171।
किसानों का दर्द साफ है:
“तीन साल से लगातार नुकसान… खेत की लागत भी नहीं निकली… और बीमा का पैसा इतना कि एक बोरी खाद भी न खरीदी जा सके।”
सिस्टम कैसे काम करता है?
फसल बीमा योजना का पूरा ढाँचा दो हिस्सों में बँटा है:
1. पंजीकरण – खरीफ/रबी सीजन में किसान रजिस्ट्रेशन कराता है। प्रीमियम कट जाता है।
2. सर्वे – कृषि विभाग, राजस्व विभाग और बीमा कंपनी मिलकर फसल का आकलन करते हैं।
पहले क्या होता था?
क्रॉप कटिंग: खेत में जाकर वास्तविक उपज नापना।
अब क्या होता है?
सैटेलाइट इमेजिंग: ऊपर से ली गई तस्वीरों पर निर्भरता।
असली पैदावार: 183 किलो/हेक्टेयर।
सैटेलाइट रिपोर्ट: 869 किलो/हेक्टेयर।
नतीजा: किसान का क्लेम आधा से भी कम।
“किसान का पसीना ज़मीन पर बहता है… लेकिन बीमा का हिसाब आसमान से तय होता है।”
क्लेम का फॉर्मूला: किसानों के खिलाफ?
कैलकुलेशन = पिछले 5 साल का औसत उत्पादन।
लगातार खराब मौसम से औसत गिर जाता है।
किसान का नुकसान बढ़ता है, लेकिन क्लेम घट जाता है।
किसान नेताओं का आरोप:
“यह फॉर्मूला ही किसानों को ठगने के लिए बनाया गया है।”
कंपनियों की बैलेंस शीट बनाम किसानों की जेब
सरकारी रिपोर्ट (2016–22):
कुल प्रीमियम: ₹31,667 करोड़
कुल क्लेम भुगतान: ₹28,260 करोड़
अंतर (कंपनियों का लाभ): ₹3,400 करोड़
2022–23: किसानों को मिला ₹862 करोड़।
2024–25 (अगस्त तक): ₹1,156 करोड़ ट्रांसफर।
लेकिन अब भी ₹231 करोड़ से अधिक क्लेम पेंडिंग।
एमपी में सक्रिय बीमा कंपनियाँ
Agriculture Insurance Company (AIC)
SBI General Insurance
Reliance General
Chola MS
ICICI Lombard
HDFC ERGO
मॉडल साफ़ है:
प्रीमियम = गारंटीड (किसान + राज्य + केंद्र से वसूला जाता है)
क्लेम = “फॉर्मूला + सैटेलाइट” पर आधारित
अंतर = कंपनियों की सीधी कमाई
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
बीजेपी विधायक मुरली भंवरा: “क्लेम बहुत कम है।”
विपक्ष: “यह योजना किसानों की नहीं, बीमा कंपनियों की है।”
सरकार: “हमने हजारों करोड़ दिए।”
हकीकत: गाँवों में किसान सड़क पर विरोध कर रहे हैं।
Akhileaks का सवाल
फसल बीमा योजना का मकसद था किसान को सुरक्षा देना।
लेकिन सच यह है कि –
किसान की जेब से प्रीमियम कटता है।
बीमा कंपनियाँ मुनाफा कमाती हैं।
सरकार प्रेस कॉन्फ्रेंस करके वाहवाही लेती है।
यानी यह अब ‘फसल बीमा योजना’ नहीं, बल्कि ‘कंपनी बीमा योजना’ बन चुकी है।
निष्कर्ष: समाधान कब?
क्या किसानों को उनका पूरा हक मिलेगा?
क्या कंपनियों की मनमानी रुकेगी?
क्या सरकार खेत की मिट्टी देखकर फैसले लेगी… या आसमान की तस्वीरों पर भरोसा करती रहेगी?
Akhileaks का अंतिम सवाल:
“जब खेत की मिट्टी पर किसान का खून-पसीना गिरता है…
तो उसका मुआवज़ा आसमान की तस्वीरों से क्यों तय होता है?”
👉 अगर आप भी मानते हैं कि किसान के साथ धोखा हो रहा है, तो इस रिपोर्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए।
ताकि यह आवाज़ भोपाल से दिल्ली तक गूँजे।



