सीएम की कुर्सी से बस एक कदम और दूर… नाम है प्रहलाद सिंह पटेल!
मध्यप्रदेश की राजनीति में हलचल तेज़ हो गई है। कल तक जो नेता नर्मदा परिक्रमा में साधना कर रहे थे, आज सत्ता की परिक्रमा के इतने क़रीब आ चुके हैं कि भोपाल की हवा तक बदलने लगी है। नाम है — प्रहलाद सिंह पटेल।
नर्मदा परिक्रमा से सत्ता परिक्रमा तक
इंदौर के ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में पुस्तक “परिक्रमा कृपा-सार” का विमोचन हुआ।
मंच पर संघ प्रमुख मोहन भागवत, बगल में प्रहलाद पटेल, और सामने राजनीतिक संदेश।
भागवत ने साफ़ कहा — “मैं उत्सव मूर्ति नहीं हूँ, श्रद्धा का विषय है इसलिए आया हूँ।”
श्रद्धा के साथ राजनीति भी लिखी जा रही थी।
और यही तस्वीर बता रही थी कि प्रहलाद पटेल अब सिर्फ़ किताब तक सीमित नहीं, बल्कि सत्ता के नए अध्याय का हिस्सा बन चुके हैं।
शिवराज बदलाव का समय और छूटा हुआ मौका
याद कीजिए जब शिवराज सिंह चौहान की विदाई हुई थी।
उस वक्त प्रहलाद पटेल सबसे बड़े दावेदार थे।
मोदी से नज़दीकियां किसी से छुपी नहीं थीं।
लेकिन अमित शाह के गणित और सुरेश सोनी की बैंकिंग ने मोहन यादव को सीएम बना दिया।
पटेल तब भी बस एक कदम दूर रह गए थे।
यादव सरकार से बढ़ती नाराज़गी
मोहन यादव के सीएम बनने के बाद किसान संगठनों की नाराज़गी सामने आई।
भारतीय किसान संघ उज्जैन में सहस्त्र भूमि अधिग्रहण पर लगातार दबाव बना रहा है।
संघ भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिख रहा।
ऐसे माहौल में पटेल का किसान चेहरा और उनकी ग्रामीण जड़ें उन्हें सबसे मजबूत विकल्प बना रही हैं।
सोनी–यादव बनाम भागवत–पटेल समीकरण
सुरेश सोनी की बैंकिंग अब भी मोहन यादव के साथ है।
लेकिन बड़ा खेल यह है कि मोहन भागवत खुद पटेल के मंच पर पहुँचे।
यह तस्वीर बहुत कुछ कह रही थी —
सोनी–यादव का संतुलन अपनी जगह, लेकिन भागवत–पटेल का नया समीकरण भविष्य की बीजेपी की स्क्रिप्ट है।
भागवत का नया अवतार
75 साल की उम्र और रिटायरमेंट की अफवाहों के बीच इंदौर का मंच बड़ा संदेश था।
भागवत कहीं नहीं जा रहे।
बल्कि अब वे बीजेपी को नए सिरे से गढ़ने जा रहे हैं।
उन्होंने कहा — “भारत भक्ति और आत्मीयता से चलता है।”
यह सिर्फ़ आध्यात्मिक उपदेश नहीं था, यह राजनीति का ब्लूप्रिंट था।
लोधी वोट बैंक का तुरुप का पत्ता
मध्यप्रदेश में लोधी समाज = करीब 9% वोट।
बुंदेलखंड, महाकौशल और मध्य क्षेत्र की 65 सीटों पर सीधा असर।
प्रहलाद पटेल लोधी समाज का सबसे बड़ा चेहरा हैं।
वे किसान भी हैं, ओबीसी भी हैं और अब आस्था का चेहरा भी।
शिवराज के बाद भाजपा को नया ओबीसी चेहरा चाहिए… और वह चेहरा पटेल हो सकते हैं।
कांग्रेस इस वोट बैंक को साधने में कमजोर है।
इसलिए पटेल की ताक़त और बढ़ जाती है।
विरोधियों के लिए खतरे की घंटी
सिंधिया गुट के लिए पटेल का उभार सीधी चुनौती है।
नरेंद्र सिंह तोमर जैसे वरिष्ठ नेता किनारे हो रहे हैं।
और मोहन यादव के लिए संदेश साफ़ है — कुर्सी स्थायी नहीं है।
संघ अब नए समीकरण बना रहा है।
शक्ति प्रदर्शन और आगे की राह
इंदौर का यह आयोजन सिर्फ़ पुस्तक विमोचन नहीं था।
यह संघ की आंतरिक राजनीति का रीसेट बटन था।
मोदी की नज़दीकी पहले से, अब भागवत का सार्वजनिक समर्थन और 9% लोधी वोट बैंक —
तीनों ने मिलकर पटेल को सीएम की कुर्सी से बस एक कदम और नज़दीक ला दिया है।
सबसे बड़ा फैक्टर यही है —
इंदौर के शक्ति प्रदर्शन के बाद प्रहलाद पटेल अब सीएम की रेस में
मध्यप्रदेश के तमाम नेताओं से बहुत आगे निकल चुके हैं।
निष्कर्ष
नर्मदा की परिक्रमा से शुरू हुआ सफर…
अब सत्ता की परिक्रमा तक पहुँच चुका है।
मोदी की परिक्रमा, भागवत की परिक्रमा… और अब भोपाल की परिक्रमा।
प्रहलाद पटेल… बस एक कदम और… और मध्यप्रदेश की राजनीति का चेहरा बदल सकता है।



