क्या वाकई उत्तर प्रदेश टूटने जा रहा है?
अफ़वाह, प्रयोग या सत्ता की तैयारी?
क्या आने वाले भविष्य में उत्तर प्रदेश का विभाजन हो सकता है?
क्या यह सिर्फ सोशल मीडिया पर उड़ रही अफ़वाहें हैं, या फिर इन अटकलों के पीछे कोई ठोस राजनीतिक सोच छुपी हुई है?
आजकल फेसबुक, एक्स (ट्विटर) और व्हाट्सऐप ग्रुप्स में एक ही सवाल गूंज रहा है— “यूपी टूटेगा?”
और अगर टूटेगा, तो कैसे?
दिलचस्प बात यह है कि इन चर्चाओं में लगातार यह दावा किया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश चार हिस्सों में नहीं, बल्कि सिर्फ तीन हिस्सों में ही बाँटा जाएगा। इससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली वह थ्योरी है, जो कहती है कि चौथा हिस्सा जानबूझकर नहीं बनाया जाएगा—क्योंकि चौथा हिस्सा बनते ही सत्ता का पूरा गणित उलट सकता है।
यही सवाल आज Akhileaks के रडार पर सबसे ऊपर है।
तीन ही क्यों? चार क्यों नहीं?
सुविधा नहीं, डर तय करता है नक्शा
अगर यूपी को चार हिस्सों में बाँटना प्रशासनिक रूप से संभव है, तो फिर तीन पर ही क्यों रुकना?
क्या यह सिर्फ प्रशासनिक सुविधा का मामला है, या इसके पीछे वह राजनीतिक डर छुपा है, जिसके बारे में खुलकर कोई बात नहीं करना चाहता?
राजनीति में नक्शे तब नहीं बदले जाते जब सुविधा चाहिए होती है।
नक्शे तब बदले जाते हैं, जब संभावनाएँ सत्ता के लिए खतरनाक लगने लगती हैं।
और यही वजह है कि यह पूरी बहस सिर्फ बंटवारे की नहीं, बल्कि नियंत्रण की राजनीति की ओर इशारा करती है।
पश्चिम यूपी: चौथा राज्य या चौथा खतरा?
इस पूरी थ्योरी के केंद्र में आता है पश्चिमी उत्तर प्रदेश।
कहा जा रहा है कि अगर कभी चौथा राज्य बना, तो वह पश्चिम यूपी होगा—वही पश्चिम यूपी जहाँ मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है, जहाँ जातीय और सामाजिक संतुलन हमेशा सत्ता के लिए चुनौती रहा है।
यही कारण बताया जा रहा है कि इस कथित ब्लूप्रिंट में पश्चिम यूपी को अलग राज्य बनाने की बजाय, उसे टुकड़ों में बाँट देने की योजना दिखाई देती है—
कुछ जिले हरियाणा में,
कुछ उत्तराखंड में,
और कुछ प्रस्तावित पूर्ण राज्य दिल्ली में।
यानी चौथा राज्य बनाने के बजाय, चौथे खतरे को ही भूगोल से खत्म कर देना।
सवाल यह नहीं है कि यह थ्योरी सच है या नहीं।
सवाल यह है— क्या यही डर आने वाले फैसलों को दिशा दे रहा है?
वह दस्तावेज़, जिसने अटकलों को आग दी
अब आते हैं उस कथित दस्तावेज़ पर, जिसने इन चर्चाओं को हवा दी है।
इस प्रस्ताव के मुताबिक उत्तर प्रदेश को तीन राज्यों में बाँटने की बात कही गई है—
उत्तर प्रदेश
बुंदेलखंड
पूर्वांचल
और हैरानी की बात यह है कि हर राज्य की राजधानी से लेकर जिलों तक का पूरा नक्शा पहले से तय दिखता है।
यह कोई साधारण प्रशासनिक नोट नहीं लगता, बल्कि एक ऐसा ड्राफ्ट लगता है, जिसमें राजनीति ने भविष्य का कैलकुलेशन पहले ही कर लिया है।
पहला राज्य: नया “उत्तर प्रदेश”
सत्ता का कोर ज़ोन
इस ब्लूप्रिंट में पहला राज्य वही नाम रखता है—उत्तर प्रदेश, जिसकी राजधानी लखनऊ तय की गई है।
इस राज्य में कुल 20 जिले शामिल बताए गए हैं।
लखनऊ मंडल से
लखीमपुर खीरी, हरदोई, लखनऊ, रायबरेली, सीतापुर, उन्नाव
आगरा क्षेत्र से
फिरोजाबाद, मैनपुरी, मथुरा, आगरा
अलीगढ़ मंडल से
अलीगढ़, एटा, हाथरस, कासगंज
बरेली मंडल से
बदायूं, पीलीभीत, बरेली, शाहजहाँपुर
कानपुर मंडल से
फर्रुखाबाद और कन्नौज
यह वही यूपी है जिसे सत्ता का “कोर ज़ोन” या “सेफ ज़ोन” कहा जा सकता है—जहाँ सत्ता का सामाजिक संतुलन अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है।
दूसरा राज्य: बुंदेलखंड
राजधानी प्रयागराज, संदेश बहुत गहरा
दूसरा प्रस्तावित राज्य है बुंदेलखंड, जिसकी राजधानी प्रयागराज तय की गई है।
इसमें कुल 17 जिले शामिल बताए गए हैं।
प्रयागराज मंडल से
प्रयागराज, फतेहपुर, कौशाम्बी, प्रतापगढ़
चित्रकूट मंडल से
चित्रकूट, हमीरपुर, बांदा, महोबा
झांसी मंडल से
झांसी, जालौन, ललितपुर
मिर्जापुर मंडल से
मिर्जापुर, संत रविदास नगर, सोनभद्र
कानपुर मंडल से
कानपुर नगर, कानपुर देहात, औरैया
प्रयागराज को राजधानी बनाना सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं लगता—
हाईकोर्ट, संगम और संवैधानिक प्रतीकों के जरिए इस राज्य को वैधता देने की कोशिश साफ दिखती है।
तीसरा राज्य: पूर्वांचल
सबसे बड़ा, सबसे संवेदनशील
तीसरा राज्य है पूर्वांचल, जिसकी राजधानी गोरखपुर तय की गई है।
इसमें कुल 23 जिले शामिल बताए गए हैं।
गोरखपुर मंडल से
देवरिया, गोरखपुर, कुशीनगर, महाराजगंज
आजमगढ़ मंडल से
आजमगढ़, बलिया, मऊ
बस्ती मंडल से
बस्ती, संत कबीर नगर, सिद्धार्थनगर
देवीपाटन मंडल से
श्रावस्ती, गोंडा, बलरामपुर, बहराइच
अयोध्या मंडल से
अयोध्या, अम्बेडकरनगर, सुल्तानपुर, अमेठी, बाराबंकी
वाराणसी मंडल से
चंदौली, गाजीपुर, जौनपुर, वाराणसी
यही वह इलाका है जहाँ मुस्लिम, यादव और दलित राजनीति सबसे प्रभावी रही है।
और शायद यही वजह है कि यह पूरा ब्लूप्रिंट यहीं सबसे ज़्यादा संवेदनशील हो जाता है।
पश्चिम यूपी का भविष्य: काटो और बाँटो
अब आते हैं इस पूरे खेल के सबसे निर्णायक हिस्से पर— पश्चिमी उत्तर प्रदेश।
दस्तावेज़ के अनुसार:
सहारनपुर मंडल के जिले हरियाणा में
मुरादाबाद मंडल के जिले उत्तराखंड में
मेरठ मंडल के बागपत, गाजियाबाद, हापुड़, बुलंदशहर और मेरठ को दिल्ली में मिलाने का प्रस्ताव
यही वे इलाके हैं जहाँ मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका में रहता है।
यहीं से Akhileaks सबसे असहज सवाल पूछता है—
क्या पश्चिम यूपी को काटने का असली मकसद यह है कि भविष्य में संयुक्त उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मुख्यमंत्री बनने की संभावना ही खत्म कर दी जाए?
दिल्ली राज्य और यूपी का संकुचन
इसी दस्तावेज़ में दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने की बात भी कही गई है।
इसके लिए हरियाणा के सोनीपत, रोहतक, झज्जर, गुरुग्राम, रेवाड़ी, पलवल और फरीदाबाद जैसे जिलों को दिल्ली में शामिल करने का सुझाव है—साथ ही मेरठ मंडल के जिले भी।
यानी एक तरफ दिल्ली का विस्तार,
दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश का संकुचन।
सवाल यह नहीं है कि दिल्ली को राज्य क्यों बनाया जा रहा है।
सवाल यह है कि इसके बदले उत्तर प्रदेश से क्या छीना जा रहा है।
निष्कर्ष: अफ़वाह नहीं, भविष्य का ड्राफ्ट
Akhileaks की नज़र में यह कोई आज की अधिसूचना नहीं है।
लेकिन यह कल की राजनीति का ड्राफ्ट ज़रूर है।
नक्शे काग़ज़ पर खिंच चुके हैं।
जिलों के नाम तय हो चुके हैं।
और सत्ता का गणित दिमाग़ों में बैठाया जा चुका है।
अब सिर्फ सही समय, सही संकट और सही बहाना चाहिए।
क्योंकि इतिहास यही बताता है—
राज्य तब नहीं टूटते जब जनता मांग करती है,
राज्य तब टूटते हैं जब सत्ता को अपनी कुर्सी हिलती हुई महसूस होती है।
और अगर यह ब्लूप्रिंट कभी ज़मीन पर उतरा,
तो सवाल सिर्फ यूपी का नहीं होगा—
सवाल यह होगा कि अगला नंबर किसका है।



