कर्ज़ में डूबता मध्य प्रदेश?
जब सरकार के ही ‘चाणक्य’ ने मान ली खजाने की कमजोरी
अक्सर जब विपक्ष कहता है कि “सरकार कंगाल हो चुकी है, खजाना खाली है”, तो सत्तापक्ष इसे राजनीति कहकर खारिज कर देता है। लेकिन सवाल तब गंभीर हो जाता है, जब सरकार के भीतर से ही कोई कद्दावर मंत्री, वह भी राजनीति का ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले नेता, माइक पर आकर कबूल कर ले कि चुनावी वादों ने बजट की कमर तोड़ दी है।
जी हाँ, ये शब्द विपक्ष के नहीं हैं। ये बयान है मध्य प्रदेश सरकार के नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का, जिन्होंने भोपाल में साफ कहा कि “राज्य की हालत खराब है, चुनाव जीतने के लिए किए गए वादे अब सरकार के गले की हड्डी बन गए हैं।”
यह बयान सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि सरकार की आर्थिक स्थिति का कबूलनामा है।
भावुकता बनाम गणित: मध्य प्रदेश की डराने वाली बैलेंस शीट
राजनीति भावनाओं पर चल सकती है, लेकिन सरकारें गणित से चलती हैं। और अगर गणित गड़बड़ हो जाए, तो सत्ता कितनी भी मजबूत क्यों न हो—नींव हिलने लगती है।
आइए, सीधे आंकड़ों पर आते हैं:
वित्तीय वर्ष 2025–26 का कुल बजट: ₹4.21 लाख करोड़
मध्य प्रदेश पर कुल कर्ज: ₹4.65 लाख करोड़
मतलब साफ है—राज्य का सालाना बजट, उसके कुल कर्ज से भी कम है। यानी मध्य प्रदेश अपनी कमाई से ज्यादा उधार की ज़िंदगी जी रहा है।
पिछले दो वर्षों में सरकार ने औसतन हर दिन ₹125 करोड़ का कर्ज लिया है। जब तक हम और आप सुबह की चाय खत्म करते हैं, तब तक राज्य पर करोड़ों का नया बोझ जुड़ चुका होता है।
‘हाथी’ का नाम: लाडली बहना योजना
जब कैलाश विजयवर्गीय ‘चुनावी वादों’ की बात करते हैं, तो इशारा साफ है। कमरे में खड़ा हाथी है—लाडली बहना योजना।
गणित समझिए:
मासिक खर्च: ₹1,890 करोड़
सालाना खर्च: ₹22,680 करोड़
यह पैसा न सड़क बना रहा है, न पुल, न स्कूल, न अस्पताल। यह सीधा नकद वितरण है। और सरकार का वादा इसे ₹3,000 फिर ₹5,000 महीना करने का है।
अगर ₹5,000 लागू हुआ, तो सालाना खर्च ₹60,000 करोड़ से ऊपर चला जाएगा।
सवाल सीधा है—
पैसा आएगा कहाँ से?
क्या वल्लभ भवन में नोट छापने की मशीन लग गई है?
सरकार के भीतर विरोधाभास: कर्ज या निवेश?
यहीं से कहानी में आता है सबसे बड़ा ट्विस्ट।
एक तरफ कैलाश विजयवर्गीय कह रहे हैं—“हालत खराब है, केंद्र की तरफ मत देखो, राज्यों को खुद ड्राइविंग सीट पर बैठना होगा।”
दूसरी तरफ, वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा और मुख्यमंत्री मोहन यादव कह रहे हैं—
“इसे कर्ज मत कहिए, यह तो निवेश है।”
यह तर्क वही है, जैसे कोई व्यक्ति बैंक से लोन लेकर घर का राशन खरीदे और उसे ‘इन्वेस्टमेंट’ कह दे।
अगर विकास दर सच में 14–15% है, तो सवाल उठता है—
योजनाओं के लिए हर महीने उधार क्यों?
‘ड्राइविंग सीट’ का असली मतलब: बोझ अब आपकी जेब पर
कैलाश विजयवर्गीय की एक लाइन बेहद अहम है—
“शहरों को अब खुद ड्राइविंग सीट पर होना चाहिए।”
Akhileaks स्टाइल में इसका अनुवाद समझिए:
राज्य सरकार कह रही है—“हमारे पास पैसा नहीं है, अब नगर निगम खुद इंतज़ाम करें।”
और नगर निगम क्या करेगा?
प्रॉपर्टी टैक्स बढ़ेगा
पानी और कचरा कलेक्शन महंगा होगा
रजिस्ट्री और बिजली बिल पर बोझ बढ़ेगा
पेट्रोल–डीजल पर सेस संभव
यानी ₹4.65 लाख करोड़ का कर्ज कोई नेता नहीं, आप और हम चुकाएंगे—ब्याज सहित।
निष्कर्ष: कुआँ आगे, खाई पीछे
आज मध्य प्रदेश एक खतरनाक दोराहे पर खड़ा है।
योजनाएं बंद कीं → चुनावी नुकसान
योजनाएं चलाईं → आर्थिक डूब
कैलाश विजयवर्गीय का बयान उस डॉक्टर की तरह है, जो इलाज से पहले बता देता है कि बीमारी गंभीर है।
आने वाले संकेत साफ हैं:
विकास परियोजनाओं की रफ्तार धीमी
सरकारी भर्तियों पर ब्रेक
टैक्स और शुल्क में बढ़ोतरी
मेरा सवाल सरकार से बस इतना है—
‘आत्मनिर्भर भारत’ की बात करते-करते क्या हम ‘कर्ज़-निर्भर मध्य प्रदेश’ बना रहे हैं?
क्या 2028 तक ₹3,000 देने के वादे के लिए हम राज्य का भविष्य गिरवी रख देंगे?
और सवाल आपसे—
क्या आपको मुफ्त योजनाएं चाहिए, या आपके बच्चों के लिए स्थायी नौकरियाँ और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर?
सोचिएगा ज़रूर, क्योंकि यह पैसा किसी मंत्री का नहीं—
आपकी मेहनत की कमाई का है।
जय हिंद। जय मध्य प्रदेश।



