Exclusive

क्या सरकार को जगाने के लिए हर बार किसी की बलि ज़रूरी है?

कफ सिरप त्रासदी और मध्यप्रदेश की संवेदनहीन सरकार की कहानी

सरकारें कभी हादसे से पहले नहीं जागतीं।
वो सिर्फ़ मौत गिनती हैं, आँकड़े लिखती हैं और कैमरे के सामने संवेदना जताती हैं।
छिंदवाड़ा की कफ सिरप त्रासदी ने यह फिर साबित कर दिया —
यहाँ सुधार हमेशा मौत की कीमत पर आता है।

25 मासूम बच्चे, जिनके हाथों में खिलौने होने चाहिए थे,
आज उनके हाथों में सिर्फ़ फूल रखे हैं।
इलाज के नाम पर उन्हें ज़हर दे दिया गया — डाईएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG),
जो इंजन के कूलेंट में डाला जाता है।
लेकिन इस बार यह ज़हर सरकार की नाकामी से बच्चों की नसों में उतर गया।

तीन दिन की नींद – और 25 लाशें

पहले दो बच्चे मरे, फिर तीन, फिर सात…
सरकार ने कहा — “सैंपल भेज दिए हैं।”
तीन दिन लगे सैंपल लैब तक पहुँचने में।
तीन दिन में मौतों का आंकड़ा दोगुना हो गया।
तमिलनाडु सरकार ने एक दिन में जांच पूरी की और कह दिया — दवा में ज़हर मिला है।
लेकिन मध्यप्रदेश तब भी “प्रक्रिया” में था।
जैसे किसी की जान नहीं, कोई फाइल अटकी हो।

यह वही फाइल कल्चर है जिसने इस प्रदेश में इंसानियत को कुचल दिया है।
सरकार तब तक नहीं जागती जब तक शवों की गिनती दो अंकों में न पहुँच जाए।

इलाज भी घर का, मौत भी घर से

इस केस में जो डॉक्टर गिरफ्तार हुआ —
वही दवा लिखता था और दवा उसकी पत्नी की दुकान से बेची जाती थी।
इलाज भी घर में, बिक्री भी घर में, और मौत भी उसी घर से निकली।
सरकार कहती है — “कंपनी दोषी है।”
लेकिन सवाल है —
क्या उस डॉक्टर की कोई जिम्मेदारी नहीं?
क्या उस सिस्टम की कोई जवाबदेही नहीं जिसने उसे लाइसेंस दिया और सालों तक नवीनीकृत किया?

यह सिर्फ़ कफ सिरप कांड नहीं,
यह मेडिकल माफिया और सरकारी मिलीभगत का सबसे भयानक उदाहरण है।

गुना से छिंदवाड़ा तक – मौतों की लापरवाही का सिलसिला

गुना में बस जली — 13 लोग जिंदा जल गए।
हरदा में पटाखा फैक्ट्री फटी — 11 लोग मरे।
खंडवा में ट्रॉली पलटी — 13 लोग कुचल गए।
और अब छिंदवाड़ा — जहाँ बच्चे इलाज से मरे।

हर बार वही स्क्रिप्ट — हादसा, जांच, सस्पेंशन और चुप्पी।
सरकार के लिए हादसा “घटना” है,
लेकिन जनता के लिए वो पूरी ज़िंदगी का अंत है।

मोहन यादव सरकार का संवेदनहीन चेहरा

जब छिंदवाड़ा में मातम था,
जब अस्पतालों के बाहर मांएं रो रही थीं,
उसी वक्त मुख्यमंत्री मोहन यादव गुवाहाटी में इन्वेस्टर्स समिट में मुस्कुरा रहे थे।

फोटो खिंचवा रहे थे, मंच साझा कर रहे थे,
नए निवेश की बातें कर रहे थे।
लेकिन सवाल यह है —
क्या उस वक्त “बिज़नेस मोड” ठीक था
जब आपके अपने प्रदेश में बच्चे मर रहे थे?

जब घर में मातम हो, तो बाहर जाकर खुशियों का मंच सजाना निष्ठुरता है।
मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सिर्फ़ गुवाहाटी तक नहीं,
छिंदवाड़ा के अस्पतालों तक भी है।
जहाँ मां-बाप अपने बच्चों को अपने हाथों से दफना रहे थे।

स्वास्थ्य मंत्री की चुप्पी – विभाग की बीमारी

स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला हर मंच से कहते हैं —
“हम हेल्थ सेक्टर को आधुनिक बना रहे हैं।”
लेकिन हकीकत यह है कि
प्रदेश की दवा जांच लैब में न टेक्नीशियन हैं, न मशीनें।
5000 सैंपल महीनों से पेंडिंग हैं।
कई जगह डॉक्टर और दुकानदार साथ खेल खेल रहे हैं।

जब पहली मौत हुई,
क्या मंत्री ने पूछा कि दवा किस कंपनी की है, कहाँ से आई?
नहीं पूछा।
क्योंकि मंत्रालय फाइलों से चलता है, फील्ड से नहीं।
अगर हेल्थ डिपार्टमेंट “सैंपल भेजने” में तीन दिन लगाता है,
तो वह सिर्फ़ लापरवाही नहीं, एक अपराध है।

प्रभारी मंत्री राकेश सिंह – सत्ता की चुप्पी का प्रतीक

छिंदवाड़ा के प्रभारी मंत्री राकेश सिंह उस वक़्त कहाँ थे?
न उन्होंने अस्पतालों का दौरा किया,
न प्रशासन से रिपोर्ट मांगी,
बस एक बयान आया — “सरकार गंभीर है।”
पर गंभीरता दिखाई कहाँ दी?

एक प्रभारी मंत्री की भूमिका तस्वीरों से नहीं, फैसलों से दिखती है।
और जब बच्चे मर रहे हों, तब चुप रहना सबसे बड़ा अपराध है।

जांच नहीं, जवाबदेही चाहिए

फिर वही स्क्रिप्ट —
“जांच के आदेश दे दिए गए हैं।”
फाइल खुलेगी, रिपोर्ट बनेगी,
दो अफसर सस्पेंड होंगे और मामला ठंडा पड़ जाएगा।
कुछ हफ्तों बाद जनता भूल जाएगी,
फिर अगला हादसा होगा।

जनता अब ऊब चुकी है इन वाक्यों से।
उसे “जांच नहीं, जवाब चाहिए।”

-जनता का विश्वास टूट चुका है

हर हादसे के बाद कुछ दिन तक सिस्टम एक्टिव रहता है,
फिर सब सामान्य हो जाता है।
जनता अब पूछ रही है —
“क्या सुधार सिर्फ़ तब होगा जब कोई मरेगा?”

बस हादसा हो, फैक्ट्री फटे या दवा से मौतें हों —
सुधार अब मौत की कीमत पर मिलता है।

अख़िरी सवाल

मोहन यादव जी,
आपका शासन धर्म और संस्कृति की बात करता है।
पर क्या मासूमों की रक्षा भी धर्म नहीं?
आपने महाकाल लोक बनाया,
लेकिन मध्यप्रदेश का हेल्थ लोक ढह गया।

जब घर में आग लगी हो,
तो बाहर जाकर दीप जलाना पाखंड है।
जब बच्चे मर रहे हों,
तो निवेश की बातें करना संवेदनहीनता है।

यह त्रासदी किसी कंपनी की नहीं,

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button