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इंदौर त्रासदी: सस्पेंशन से नहीं, सच से मिलेगा इंसाफ

इंदौर में मौत का तांडव मचने के बाद आखिरकार भोपाल में बैठी सरकार की नींद टूटी। प्रशासनिक सर्जरी के नाम पर कमिश्नर दिलीप कुमार यादव को हटा दिया गया, कुछ इंजीनियर सस्पेंड कर दिए गए। आपको याद होगा—Akhileaks ने अपने पिछले वीडियो में टेंडरों में बरती जा रही लापरवाही और कमिश्नर की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए थे। देर से ही सही, खबर का असर हुआ।
लेकिन सवाल वही है—क्या कुर्सी बदल देने से 16 परिवारों का अंधेरा दूर हो जाएगा?
क्या एक अधिकारी की विदाई से वे 16 लोग लौट आएंगे, जिन्होंने पानी की जगह मौत पी ली?
यह मेरी नहीं, जनता की चार्जशीट है
आज Akhileaks अपनी नहीं, उस जन-आक्रोश की बात कर रहा है जो हमारे कमेंट बॉक्स में आग की तरह फैल रहा है। जनता अब सस्पेंशन के लॉलीपॉप से खुश नहीं है। लोग साफ लिख रहे हैं—
“अफसर मोहरे हैं, असली गुनहगार नेता हैं।”
एक यूज़र का सीधा सवाल है—
“वोट हमने महापौर को दिया था, कमिश्नर को नहीं। तो FIR सिर्फ कमिश्नर पर क्यों? महापौर पर कब?”
लोकतंत्र में जनता अफसर नहीं चुनती, जन-प्रतिनिधि चुनती है। जब शहर में लोग जहर पीकर मर रहे हों, तो जिम्मेदारी से कोई कैसे बच सकता है?
महापौर से जवाब चाहिए, आँसू नहीं
शहर के प्रथम नागरिक, महापौर पुष्यमित्र भार्गव, 16 लाशों के बाद मीडिया के सामने रो पड़े।
जनता का संदेश साफ है—आँसू पोंछिए, एक्शन लीजिए।
जब भागीरथपुरा के लोग गंदे पानी की बोतलें लेकर निगम के चक्कर काट रहे थे, तब आपकी परिषद कहाँ थी?
अगर शहर की सफाई का क्रेडिट आपका है, तो शहर की गंदगी और मौत की जिम्मेदारी किसकी?
क्या नैतिक आधार पर इस्तीफा नहीं बनता?
“200% अफसर जिम्मेदार”—तो जीत का श्रेय किसका?
स्थानीय विधायक और कद्दावर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा—“इस त्रासदी के लिए 200 फीसदी अफसर जिम्मेदार हैं।”
सोशल मीडिया ने पलटकर पूछा—
जब इंदौर को नंबर-1 का अवॉर्ड मिलता है, तब 200% क्रेडिट कमिश्नर का क्यों नहीं होता? तब होर्डिंग्स पर तस्वीरें नेताओं की क्यों चमकती हैं?
“चित भी मेरी, पट भी मेरी” वाला खेल अब नहीं चलेगा।
उमा भारती का वीआईपी कल्चर पर तमाचा
बीजेपी की वरिष्ठ नेता उमा भारती ने वही सवाल पूछा जो हर आम आदमी के दिल में है—
“जब जनता सीवर का पानी पी रही थी, तो आप बिसलेरी क्यों पी रहे थे?”
इसे उन्होंने “पाप” कहा—वीआईपी कल्चर पर सीधा प्रहार।
राहुल गांधी का सिस्टम पर सवाल
उधर राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश को “कुप्रशासन का एपिसेंटर” बताया।
कभी मूर्तियाँ गिरती हैं, कभी बच्चे अस्पतालों में दम तोड़ते हैं, और अब जहरीला पानी—
क्या प्रशासनिक सिस्टम पूरी तरह कोलैप्स हो चुका है?
आख़िरी और सबसे कड़वा सवाल—मुख्यमंत्री से
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, आप सिर्फ सीएम नहीं हैं—आप इंदौर के प्रभारी मंत्री भी हैं।
तो यह कैसे हुआ कि आपके ड्रीम सिटी में, आपकी सीधी निगरानी में, लोग पानी की जगह मौत पीते रहे?
दिलीप यादव को हटाकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता।
यह विफलता एक अधिकारी की नहीं—यह विफलता प्रभारी होने की है।
जनता पूछ रही है—प्रभारी मंत्री का काम सिर्फ झंडा फहराना है या जनता की जान बचाना भी?
Akhileaks की मांग
कमेंट बॉक्स खुला है—अपनी आवाज उठाते रहिए।
हम मांग करते हैं कि कार्रवाई सिर्फ सस्पेंशन तक न रुके।
दोषियों पर—चाहे वे नेता हों या अफसर—गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज हो।
मैं हूँ अखिलेश सोलंकी… आप पढ़ते रहिए Akhileaks
खबरों के पीछे की खबर। सवालों के साथ, सच के साथ।

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