भारत–अमेरिका रक्षा समझौता: ताक़त या टैक्टिक्स?
दस साल का नया फ्रेमवर्क जो एशिया की शक्ति-संतुलन बदल सकता है
कुआलालंपुर में हुआ भारत–अमेरिका रक्षा समझौता एशिया की राजनीति का सबसे बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने जिस फ्रेमवर्क पर हस्ताक्षर किए हैं,
वह आने वाले दस वर्षों में एशिया की रणनीतिक दिशा तय करेगा।
काग़ज़ पर यह समझौता “कोऑर्डिनेशन, टेक्नोलॉजी और स्टेबिलिटी” की कहानी है,
लेकिन असल में यह है रणनीति और प्रभाव का खेल —
जहां एक तरफ़ साझेदारी है, तो दूसरी तरफ़ दबाव भी।
अमेरिका की मंशा: भारत को पिवट पावर बनाना
अमेरिका के लिए यह समझौता सिर्फ़ रक्षा सहयोग नहीं,
बल्कि चीन को रोकने की Indo-Pacific रणनीति का अहम हिस्सा है।
साउथ चाइना सी और ताइवान स्ट्रेट में चीन की बढ़ती सैन्य मौजूदगी
वॉशिंगटन के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है।
ऐसे में अमेरिका को एक ऐसे साउथ एशियन पार्टनर की ज़रूरत है
जो उसके हितों को संतुलन दे सके — और वह है भारत।
इसलिए इस समझौते का असली मकसद है —
“India as a Pivot Power”, यानी भारत को
चीन-विरोधी रणनीति के केंद्र में लाना।
भारत के लिए फायदे: टेक्नोलॉजी, मेक-इन-इंडिया और F-35
भारत के लिए यह डील अवसर भी है और परीक्षा भी।
इससे तीन बड़े फ़ायदे निकल सकते हैं —
1. टेक्नोलॉजी एक्सेस:
अब भारत को अमेरिकी सैटेलाइट, ड्रोन और इंटेलिजेंस नेटवर्क से
रियल-टाइम डेटा मिलेगा। इससे सीमा सुरक्षा और
IACCS एयर डिफेंस सिस्टम और मजबूत होंगे।
2. ‘Make in India’ को बल:
HAL, टाटा, और L&T जैसी कंपनियां अब
Lockheed Martin और Boeing के साथ
जॉइंट प्रोडक्शन कर सकेंगी।
भारत रक्षा उत्पादों का ग्राहक नहीं, निर्माता बनेगा।
3. F-35 स्टेल्थ फाइटर तक पहुंच:
यह समझौता भारत के लिए F-35 जैसी हाई-एंड
अमेरिकी तकनीक तक पहुंच का रास्ता खोल सकता है,
जो अब तक सिर्फ़ NATO देशों के लिए आरक्षित थी।
खतरे भी कम नहीं: निर्भरता और संतुलन का दबाव
हर सौदे की एक कीमत होती है —
और इस समझौते की कीमत है रणनीतिक निर्भरता का जोखिम।
भारत अब दो ध्रुवों के बीच खड़ा है —
एक तरफ़ रूस, जिसने दशकों से भारत को
S-400, ब्रह्मोस और सुखोई जैसी प्रणालियां दीं;
दूसरी तरफ़ अमेरिका, जो नए युग की टेक्नोलॉजी पेश कर रहा है।
लेकिन अमेरिका की नीति स्पष्ट है —
वह किसी देश को कभी पूरी तकनीक नहीं देता।
पाकिस्तान के F-16 इसका उदाहरण हैं —
जहां हथियार तो मिले, लेकिन नियंत्रण अमेरिका के पास रहा।
भारत को वही गलती नहीं दोहरानी चाहिए।
आर्थिक मोर्चा: व्यापार और टैरिफ़ की जंग
यह समझौता उस दौर में हुआ जब
ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50% टैरिफ़ लगाया था —
रूस से तेल और हथियार ख़रीदने के कारण
25% अतिरिक्त दंड के साथ।
अमेरिका इसे आर्थिक दबाव के साथ
रणनीतिक आकर्षण (Strategic Pull) में बदलना चाहता है।
वहीं भारत इस डील को
टेक्नोलॉजी और स्वावलंबन के रास्ते के रूप में देख रहा है।
दोनों के हित अलग हैं, लेकिन
साझेदारी की भाषा एक जैसी रखी गई है।
चीन और रूस की प्रतिक्रिया
चीन ने इस डील को “क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा” कहा है।
लेकिन असल में उसका डर यह है कि
भारत अब क्वाड (QUAD) की रीढ़ बन जाएगा।
रूस के लिए यह एक संकेत है कि
भारत अब केवल मास्को का पारंपरिक ग्राहक नहीं रहा,
बल्कि वह बहुध्रुवीय साझेदारी (Multi-polar Diplomacy)
की दिशा में बढ़ रहा है।
आने वाले 10 साल: ताक़त या दबाव?
अगला दशक तय करेगा कि यह समझौता
भारत की सैन्य ताक़त बनेगा या
कूटनीतिक दबाव।
अगर भारत इसे जॉइंट डेवलपमेंट की तरह चलाता है,
तो यह आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग का इंजन बन सकता है।
लेकिन अगर यह सिर्फ़ जॉइंट डिपेंडेंसी बन गया,
तो भारत वही गलती करेगा जो पाकिस्तान ने की थी —
हथियार अपने, लेकिन नीति पर नियंत्रण किसी और का।
“India First” बनाम “America First”
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे
“नए युग की शुरुआत” कहा है,
लेकिन इतिहास गवाह है —
अमेरिका के हर “नए युग” में
पहले लाभ अमेरिका का होता है।
भारत को तय करना होगा कि
यह समझौता “साझेदारी” बनता है या “रणनीति।”
क्योंकि अगर भारत अपनी राह खुद तय करता है,
तो यह समझौता उसे सुपरपावर बना सकता है।
और अगर वह दूसरों की राह पर चले,
तो यही डील आने वाले दशक की सबसे बड़ी राजनीतिक निर्भरता साबित होगी।
“अमेरिका चाहे ट्रंप हो या बाइडन, उसकी नीति हमेशा ‘America First’ रही है —
अब वक्त है कि भारत भी पूरी ताकत से ‘India First’ पर खड़ा हो।”



