जेम-पोर्टल घोटाला: पारदर्शिता का आईना या डिजिटल लूट इंडिया?
शुरुआत कैसे हुई?
2017 में केंद्र सरकार ने GeM – Government e-Marketplace लॉन्च किया। मकसद साफ़ था — सरकारी खरीद में पारदर्शिता लाना, दलाल खत्म करना और टैक्सपेयर्स का पैसा सही जगह लगाना।
सरकारी दफ्तरों को सीधा ऑनलाइन पोर्टल पर सामान खरीदने का रास्ता दिया गया। दावा था कि इससे भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी।
लेकिन हकीकत? GeM पोर्टल ही घोटालों का नया अड्डा बन गया।
करोड़ों की ‘ओवरप्राइसिंग’
बस्तर ओलिंपिक ट्रैक सूट घोटाला:
4,900 ट्रैक सूट खरीदे गए।
वेबसाइट रेट: ₹1,539
सरकारी रेट: ₹2,499
यानी हर सूट पर ₹1,000 की लूट।
कुल बिल: ₹1.22 करोड़।
टेंडर प्रक्रिया 30 दिन में होनी थी, लेकिन 11 दिन में निपटा दी गई।
5 कंपनियाँ क्वालिफाई हुईं, सब एक ही ब्रांड Shiv Naresh से जुड़ी।
जग का खेल: 500 का 32,000
बलौदाबाजार के आदिवासी छात्रावास में स्टील जग खरीदे गए।
बाजार मूल्य: ₹400–₹500।
फाइल में सरकारी मूल्य: ₹32,000 प्रति नग।
कुल 160 जग का प्रस्ताव: ₹51.99 लाख।
बाद में विभाग ने सफाई दी — “खरीदी कैंसिल कर दी गई।”
लेकिन सवाल यही — इतना ऊँचा भाव फाइल तक पहुँचा कैसे?
स्मार्ट क्लास डिस्प्ले घोटाला
सरगुजा जिले में 5 स्मार्ट डिस्प्ले खरीदे गए।
पोर्टल रेट: ₹1.45 लाख प्रति यूनिट।
सरकारी खरीदी: ₹9.99 लाख प्रति यूनिट।
कुल खर्च: ₹49.97 लाख।
फंड आया सांसद निधि से — यानि जनता का पैसा… बच्चों की पढ़ाई के नाम पर… अफसर-ठेकेदार गठजोड़ में फूँक दिया गया।
पंचायत विभाग: चप्पल–बैग–बोतल सब गोलमाल
₹150 की चप्पल खरीदी गई ₹1,350 में।
2,070 जोड़ी पर खर्च: ₹27.94 लाख।
₹1,250 का ट्रैक सूट खरीदा गया ₹4,000 में।
कुल खर्च: ₹82 लाख।
₹699 का कॉलेज बैग खरीदा गया ₹1,500 में।
कुल खर्च: ₹31 लाख।
₹293 की पानी की बोतल खरीदी गई ₹1,165 में।
कुल खर्च: ₹24 लाख।
हर आइटम पर 2 से 5 गुना का खेल।
कांग्रेस बनाम बीजेपी: आरोप और बचाव
कांग्रेस का आरोप:
*“जेम पोर्टल भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है।
200 का जग 32 हजार… 1 लाख का टीवी 10 लाख…
आदिवासी बच्चों और खिलाड़ियों का हक भी लूट लिया गया।”*
बीजेपी की सफाई:
*“कुछ गड़बड़ियाँ हुई हैं, लेकिन सरकार ने तुरंत संज्ञान लिया।
दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी।
विष्णु देव का सुशासन है, जहाँ भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं होगा।”*
असली सवाल
1. क्या GeM पोर्टल का सिस्टम ही दोषपूर्ण है?
2. या अफसर–ठेकेदारों ने इसकी आड़ में नया ‘डिजिटल घोटाला मॉडल’ बना लिया है?
3. अगर खरीदी कैंसिल भी हुई, तो फाइल मंजूर क्यों हुई?
4. क्या जनता का पैसा वाकई सुरक्षित है?
निष्कर्ष: GeM या Digital Loot India?
GeM पोर्टल को कहा गया था — “पारदर्शिता का आईना।”
लेकिन अब यही भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा दर्पण बन चुका है।
जब ₹150 की चप्पल ₹1,350 में और ₹1.5 लाख का टीवी ₹10 लाख में खरीदा जाए… तो समझिए दलाल खत्म नहीं हुए, बस ऑनलाइन हो गए हैं।
सवाल सिर्फ़ इतना नहीं कि घोटाला हुआ या नहीं… असली सवाल है — कार्रवाई कब होगी और दोषी जेल कब जाएँगे?
वरना देश कहेगा:
Digital India नहीं… Digital Loot India।



