बड़े भाई से मेहमान तक: बिहार में जेडीयू का पतन और बीजेपी का नया पासवान कार्ड
By Akhilesh Solanki, Editor-in-Chief — Akhileaks.com | Global Desh Daily
बिहार की सत्ता में बड़ा उलटफेर: 20 साल बाद समीकरण बदल गए
2005 से बिहार की राजनीति का पर्याय रहे नीतीश कुमार अब अपने ही घर में मेहमान बन गए हैं।
एनडीए गठबंधन में पहली बार जेडीयू और बीजेपी दोनों 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे — यानी ‘बड़े भाई’ की भूमिका अब खत्म हो चुकी है।
2005 में जहाँ जेडीयू 115 सीटों पर और बीजेपी 110 पर लड़ी थी, वहीं 2025 में दोनों बराबरी पर आ गए हैं।
इस बदलाव ने बिहार की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है — क्या अब नीतीश युग समाप्त हो रहा है?
2005 से 2025: नीतीश मॉडल से दिल्ली मॉडल तक
नवंबर 2005 में नीतीश कुमार ने जब पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब बीजेपी उनके साथ जूनियर पार्टनर थी।
लेकिन वक्त के साथ तालमेल बदल गया।
2009 में जेडीयू ने लोकसभा की 25 सीटें लड़ीं और बीजेपी ने 15, जबकि 2024 तक यह समीकरण पलट गया —
जेडीयू 16 सीटों पर और बीजेपी 17 पर।
अब बीजेपी न सिर्फ़ बराबरी पर आ गई है बल्कि सत्ता के असली निर्णय-केंद्र के रूप में दिल्ली स्थापित हो चुकी है।
बीजेपी का मिशन – “पोस्ट-नीतीश बिहार”
बीजेपी की रणनीति स्पष्ट है:
अब लक्ष्य 2025 नहीं बल्कि 2030 है।
पार्टी नीतीश कुमार को “ट्रांज़िशनल फेस” बनाकर रख रही है,
लेकिन असल निवेश एक नए चेहरे पर किया जा रहा है — चिराग पासवान।
बीजेपी के अंदर इसे “Project Bihar 2030” कहा जा रहा है।
तीन चरणों की रणनीति पर यह योजना आगे बढ़ रही है —
1. नीतीश को मुख्यमंत्री बनाकर स्थिरता का भ्रम,
2. धीरे-धीरे उनकी राजनीतिक शक्ति को सीमित करना,
3. और अंततः चिराग पासवान को एनडीए के भविष्य के नेता के रूप में स्थापित करना।
चिराग पासवान – एनडीए का नया चेहरा
2020 में चिराग ने जेडीयू को तीसरे नंबर पर धकेला था।
2024 लोकसभा में अपनी सभी 5 सीटें जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि पासवान वोटबैंक के साथ अब वे यंग इंडिया का प्रतीक भी हैं।
2025 के सीट बंटवारे में उन्हें 29 सीटें मिलीं — जो एनडीए में बीजेपी के बाद सबसे बड़ा हिस्सा है।
यह इशारा साफ़ है कि बीजेपी अब उन्हें “नेक्स्ट-जेनरेशन NDA” का चेहरा बनाना चाहती है।
चिराग की पार्टी अब सिर्फ़ पासवानों तक सीमित नहीं रही।
उनके संगठन में ब्राह्मण, यादव, मुस्लिम और अति-पिछड़े नेता भी शामिल हैं।
बीजेपी उन्हें एक ऐसे चेहरे के रूप में गढ़ रही है जो युवा, दलित और मीडिया-स्मार्ट तीनों गुणों का मेल है।
नीतीश की चुप्पी और जेडीयू की बेचैनी
फ़रवरी के मंत्रिमंडल विस्तार ने साफ़ कर दिया कि सत्ता का कंट्रोल अब दिल्ली में है।
जेडीयू का कोई मंत्री शामिल नहीं हुआ जबकि बीजेपी ने डेढ़ गुना ज़्यादा मंत्री बना लिए।
नीतीश के नेता अब खुद सवाल पूछ रहे हैं —
“अब तो यह तय करना है कि पार्टी बचेगी या नहीं।”
कुर्मी-कोइरी और अति-पिछड़ा वर्ग, जो जेडीयू की रीढ़ हुआ करते थे, अब बीजेपी की ओर खिसक रहे हैं।
नीतीश कुमार सार्वजनिक मंचों पर कमज़ोर दिखते हैं और उनके फ़ैसले अब मीडिया बाइट्स तक सीमित हैं।
एनडीए में भी दरार के संकेत
बीजेपी इस फ़ॉर्मूले को “सौहार्दपूर्ण” बता रही है,
पर उसके साथी इससे खुश नहीं।
जीतनराम मांझी को केवल छह सीटें मिलीं — उन्होंने कहा, “यह हमें कमजोर करने की कोशिश है।”
उपेंद्र कुशवाहा ने सोशल मीडिया पर लिखा —
“जहाँ मेरा घर था, वहीं बारिश की।”
यह पंक्ति NDA के भीतर असंतोष का प्रतीक बन गई।
विश्लेषकों की राय – ‘साथ, फिर नियंत्रण, फिर विसर्जन’
“चिराग पासवान को यह इनाम इसलिए मिला है क्योंकि उन्होंने नीतीश को कमजोर किया।
लेकिन बीजेपी अपने सहयोगियों को मजबूत नहीं, नियंत्रित करती है।”
उनका इशारा साफ़ है —
बीजेपी पहले साझेदारी करती है, फिर नेतृत्व पर कब्ज़ा और अंत में पार्टी को अपने भीतर समा लेती है।
शिवसेना, अकाली दल और टीडीपी इसकी मिसालें हैं,
और अब जेडीयू भी उसी रास्ते पर है।
महागठबंधन की दुर्दशा, बीजेपी का खुला मैदान
तेजस्वी यादव और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर खींचतान जारी है।
वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी का बयान —
> “महागठबंधन अस्वस्थ है और इसके डॉक्टर दिल्ली में हैं।”
विपक्ष की यह कमजोरी बीजेपी के लिए बड़ा राजनीतिक अवसर बन चुकी है।
अब मैदान में सिर्फ़ दो खिलाड़ी हैं — बीजेपी और चिराग पासवान।
2025: संक्रमण का चुनाव, 2030: परिवर्तन का दशक
यह चुनाव सिर्फ़ विधानसभा नहीं, नेतृत्व परिवर्तन का है।
नीतीश कुमार का सूर्य अस्त हो रहा है और नई सुबह चिराग पासवान के साथ उग रही है।
बीजेपी ने इस ट्रांज़िशन को बेहद सधे तरीके से डिज़ाइन किया है —
नीतीश की गरिमा बचाते हुए उनका प्रभाव कम करना,
और चिराग को जनता के बीच ‘युवा एनडीए’ के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना।
बीस साल पहले नीतीश ने लालू राज खत्म किया था,
आज बीजेपी नीतीश राज पर नियंत्रण जमा रही है।
राजनीति का चक्र पूरा हो गया है —
जो दूसरों को सीमित करता है, अंततः वही सीमित हो जाता है।
नया बिहार: चुप्पी, मुस्कान और रणनीति की तिकड़ी
नीतीश की चुप्पी, चिराग की मुस्कान और बीजेपी की रणनीति —
यही बिहार की नई तिकड़ी है।
2025 का यह चुनाव सत्ता की दिशा तय करेगा —
जहाँ ‘बड़े भाई’ अब इतिहास हैं,
और ‘रणनीति’ ही भविष्य है।



