एमपी में कानून का दोहरा चरित्र: ग्वालियर में ‘जीरो टॉलरेंस’, भोपाल में ‘फुल टॉलरेंस’ क्यों?
दोस्तों, हम उस देश में रहते हैं जहाँ संविधान सर्वोच्च है। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने साफ कहा था कि कानून की नजर में सब बराबर हैं। लेकिन आज मध्य प्रदेश में जो हो रहा है, उसे देखकर लगता है कि कानून ने अपनी आंखों पर पट्टी कुछ ज़्यादा ही कसकर बांध ली है।
आज हमारे सामने दो तस्वीरें हैं—और दोनों तस्वीरें एक ही राज्य की हैं, लेकिन कानून का चेहरा दोनों में बिल्कुल अलग है।
एक तस्वीर ग्वालियर की है, जहाँ ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा ज़मीन पर उतरता दिखता है—तत्काल एफआईआर, तत्काल गिरफ्तारी और सीधे जेल।
दूसरी तस्वीर भोपाल की है, जहाँ ‘फुल टॉलरेंस’ दिखाई देता है—गंभीर आरोप, भारी विवाद, लेकिन न गिरफ्तारी, न हथकड़ी, सिर्फ फाइलों की आवाजाही।
आज सवाल बहुत सीधा है—क्या मध्य प्रदेश में अब कानून अपराध देखकर नहीं, अपराधी का चेहरा और वोट बैंक देखकर काम करेगा?
ग्वालियर की बात करें। वकील अनिल मिश्रा। आरोप—अंबेडकर प्रतिमा से जुड़ा विवाद और कथित अपमान। हम यह बिल्कुल स्पष्ट कर दें कि किसी भी महापुरुष के अपमान का समर्थन Akhileaks कभी नहीं करता। अगर गलती हुई है, तो कानून अपना काम करे—इस पर कोई बहस नहीं होनी चाहिए।
लेकिन जनता की आपत्ति अपराध पर नहीं, कानून की रफ्तार और चयन पर है।
ग्वालियर में पुलिस ने ऐसी फुर्ती दिखाई, जैसे कोई आतंकवादी पकड़ा गया हो। रातों-रात एक्शन, बिना देर के गिरफ्तारी, और सीधे जेल। वकील को अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं मिला।
प्रशासन ने संदेश दे दिया—“हम किसी को नहीं छोड़ेंगे।”
लेकिन यहीं से सवाल खड़ा होता है। सोशल मीडिया पर रोहित शर्मा नाम के एक यूज़र की टिप्पणी लोगों के मन की बात कहती है। वे लिखते हैं—
“अगर अनिल मिश्रा के पीछे कोई बड़ा वोट बैंक होता, तो क्या पुलिस उन्हें ऐसे घसीटते हुए ले जाती? यह कार्रवाई अपराध पर नहीं, बल्कि हमारी कमजोरी पर है।”
यह दर्द उस सामान्य वर्ग का है जिसे लगता है कि कानून का डंडा सबसे पहले उसी की पीठ पर टूटता है।
अब आते हैं भोपाल पर।
आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा। आरोप बेहद गंभीर हैं—फर्जी जाति प्रमाण पत्र के जरिए नौकरी हासिल करने का दावा, सार्वजनिक मंच से ‘रोटी-बेटी’ जैसे विषयों पर आपत्तिजनक बयान, और समाज में वैमनस्य फैलाने के आरोप।
ताज़ा अपडेट क्या है?
सरकार कहती है—“हमने कड़ी कार्रवाई कर दी है। संतोष वर्मा की बर्खास्तगी का प्रस्ताव केंद्र को भेज दिया गया है।”
सुनने में यह बड़ा कदम लगता है, लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है।
क्या नौकरी जाना और जेल जाना एक ही बात है?
बर्खास्तगी एक विभागीय प्रक्रिया है। यह फाइलों, नोटशीट्स और अनुमोदनों का खेल है। लेकिन आपराधिक कार्रवाई कहाँ है?
ग्वालियर में पुलिस ने विभागीय जांच का इंतज़ार नहीं किया था। फिर भोपाल में पुलिस संतोष वर्मा के घर के बाहर क्यों नहीं खड़ी है?
जनता पूछ रही है—क्या आईएएस की वर्दी अब ‘अरेस्ट-प्रूफ जैकेट’ बन चुकी है?
क्या समाज में ज़हर घोलने वाले आरोपों के बावजूद कोई अफसर खुलेआम घूम सकता है?
यह न्याय नहीं लगता। यह एक ‘सेफ एग्ज़िट’ जैसा दिखता है।
आज की रात दो कहानियाँ लिख रही है।
आज रात अनिल मिश्रा जेल की ठंडी ज़मीन पर सोएंगे।
और आज ही रात, आरोपी संतोष वर्मा अपने घर के गद्देदार बिस्तर पर।
क्योंकि एक जगह प्रशासन शेर बना हुआ है, और दूसरी जगह भीगी बिल्ली।
एक दर्शक, सुनील तिवारी, कमेंट में लिखते हैं—
“अखिलेश भाई, सरकार को बता दो कि सिमरिया का रिज़ल्ट सिर्फ ट्रेलर था। अगर ग्वालियर और भोपाल के तराजू बराबर नहीं हुए, तो पूरी पिक्चर अभी बाकी है।”
यह गुस्सा हवा में नहीं है। जब एक वर्ग देखता है कि उसकी पगड़ी उछाली जा रही है और अपमान करने वाला अफसर सरकारी सुरक्षा में है, तो सिस्टम से भरोसा उठना स्वाभाविक है।
निष्कर्ष बहुत साफ है।
हम सरकार की कागजी कार्रवाइयों का सम्मान करते हैं, लेकिन उनसे संतुष्ट नहीं हैं। कागज के घोड़े दौड़ाने से न्याय नहीं होता।
हमारी मांग सिर्फ एक है—समानता।
अगर ग्वालियर में “बेल नहीं, जेल” का फार्मूला है, तो वही फार्मूला भोपाल में भी लागू होना चाहिए।
संतोष वर्मा की तत्काल गिरफ्तारी ही यह साबित करेगी कि मध्य प्रदेश में कानून चेहरा देखकर काम नहीं करता।
अब फैसला मुख्यमंत्री मोहन यादव को करना है—
क्या वे तुष्टिकरण के दबाव में झुकेंगे, या राजधर्म निभाएंगे?
आप क्या सोचते हैं?
क्या नौकरी से निकालना काफी है, या जेल ज़रूरी है?
अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए।
मैं हूँ अखिलेश सोलंकी।
जय हिंद, जय भारत।



