डबरा का नवग्रह मंदिर: ‘समरसता’ का वह दृश्य जिसने नैरेटिव की दीवारें हिला दीं
आज जब देश की सियासत में ‘जातिगत जनगणना’ और ‘आरक्षण’ को लेकर बहस अपने चरम पर है, और सोशल मीडिया पर समाज को खांचों में बांटने की कोशिशें तेज हैं, ठीक उसी समय मध्य प्रदेश के ग्वालियर संभाग के छोटे से कस्बे डबरा से एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने इस बहस को नई दिशा दे दी। यह तस्वीर किसी राजनीतिक मंच की नहीं थी, बल्कि डबरा के नवग्रह मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा का दृश्य था—जहां अध्यात्म ने राजनीति को पीछे छोड़ दिया और ‘समरसता’ ने ‘विभाजन’ के नैरेटिव को चुनौती दे दी।
इस आयोजन के केंद्र में थे मध्य प्रदेश की राजनीति का बड़ा ब्राह्मण चेहरा, नरोत्तम मिश्रा, जो अपने परिवार के साथ यजमान के रूप में भूमि पर बैठे थे। वहीं दूसरी ओर पूरे वैदिक विधान का संचालन कर रहे थे संत दाती महाराज, जो मूल रूप से राजस्थान के मेघवाल (अनुसूचित जाति) समाज से आते हैं। यह दृश्य अपने आप में उस धारणा के विपरीत खड़ा था, जो यह कहती है कि सनातन परंपरा में धार्मिक अधिकार केवल एक वर्ग तक सीमित हैं। यहां ‘नेतृत्व’ जन्म से नहीं, ज्ञान और साधना से तय हो रहा था।
डबरा की यह घटना प्रतीकात्मक भर नहीं है; यह उस शास्त्रीय सिद्धांत की जीवंत व्याख्या है—“जन्मना जायते शूद्रः, संस्कारात् द्विज उच्यते।” अर्थात जन्म से हर व्यक्ति समान है, लेकिन उसके संस्कार और कर्म उसे श्रेष्ठता प्रदान करते हैं। जब एक ब्राह्मण परिवार से आने वाला वरिष्ठ राजनेता एक संत के निर्देशन में बैठकर विधि-विधान संपन्न कराता है, तो वह समाज को यह संदेश देता है कि अध्यात्म में ‘गुरु’ की पहचान उसकी जाति से नहीं, उसके ज्ञान से होती है।
अखिलीक्स की यह विशेष रिपोर्ट केवल एक आयोजन का विवरण नहीं, बल्कि उस नैरेटिव का ‘पोस्टमार्टम’ है, जो वर्षों से यह स्थापित करने की कोशिश करता रहा है कि सनातन धर्म का आधार ही जातिगत भेदभाव है। इतिहास इसके उलट गवाही देता है। यदि जाति ही सर्वोपरि होती, तो क्या महर्षि वाल्मीकि की रचित रामायण को संपूर्ण भारत ने हृदय से स्वीकार किया होता? क्या वेदव्यास के बिना वेदों और महाभारत की कल्पना संभव थी? उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि से अधिक महत्वपूर्ण उनका ज्ञान और योगदान था।
भक्ति आंदोलन इसका एक और सशक्त उदाहरण है। मीरा बाई ने संत रविदास को अपना गुरु स्वीकार किया। वहां जाति नहीं, भक्ति और आध्यात्मिक ऊंचाई निर्णायक थी। इसी प्रकार चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य की जोड़ी भारतीय इतिहास में इस बात का प्रमाण है कि योग्यता और दृष्टि सामाजिक पृष्ठभूमि से कहीं अधिक प्रभावशाली होती है।
डबरा का नवग्रह मंदिर उसी परंपरा की आधुनिक कड़ी है। यह आयोजन उन लोगों के लिए एक जवाब है, जो ‘ब्राह्मणवाद बनाम दलित’ जैसे फ्रेम में हर धार्मिक घटना को फिट करना चाहते हैं। यहां अधिकार छीने नहीं जा रहे, बल्कि साझा किए जा रहे हैं। यहां नेतृत्व थोपा नहीं जा रहा, बल्कि सम्मानपूर्वक स्वीकार किया जा रहा है।
समाज को बांटने की राजनीति अल्पकालिक लाभ दे सकती है, लेकिन अध्यात्म का आधार ‘समावेशन’ है। जब डबरा में एक दलित पृष्ठभूमि से आने वाला संत वैदिक अनुष्ठान का नेतृत्व करता है और एक ब्राह्मण नेता उसके निर्देशन में बैठता है, तो यह दृश्य केवल फोटो-ऑप नहीं होता—यह सामाजिक मनोविज्ञान में बदलाव का संकेत होता है।
आज जरूरत इस बात की है कि हम इतिहास के उन पन्नों को फिर से पढ़ें, जहां भारतीय समाज ने ‘कुल’ से अधिक ‘कर्म’ को महत्व दिया। चाहे वह वाल्मीकि हों, वेदव्यास हों, रविदास हों या चाणक्य—इन सबने यह साबित किया कि ज्ञान और साधना किसी जाति विशेष की बपौती नहीं है।
अंततः, डबरा की यह घटना एक प्रश्न हमारे सामने छोड़ती है—क्या हम आने वाली पीढ़ी को वही भारत देना चाहते हैं, जो केवल पहचान की राजनीति में उलझा रहे, या वह भारत जो समरसता और साझा आध्यात्मिक विरासत पर गर्व करे?
सनातन परंपरा की शक्ति उसकी विशालता में है। वह बरगद की तरह है, जिसकी जड़ें गहरी हैं और जिसकी छाया में हर वर्ग, हर समुदाय और हर पृष्ठभूमि का व्यक्ति स्थान पा सकता है। डबरा का यह दृश्य उसी बरगद की एक नई, जीवंत शाखा है—जो हमें याद दिलाता है कि समाज को जोड़ने की परंपरा अभी भी जिंदा है।



