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मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार: जब घोटाले नहीं, सिस्टम काम करने लगें

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार अब कोई एकल घटना या अपवाद नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे एक ऐसे संगठित सिस्टम में तब्दील हो चुका है, जहाँ हर नया घोटाला पिछले वाले से ज़्यादा योजनाबद्ध और निर्भीक दिखाई देता है।
स्वास्थ्य विभाग में आयुष्मान योजना से जुड़े घोटालों की आँच अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि अब स्कूल शिक्षा विभाग में करोड़ों की डकैती का एक नया और खतरनाक मॉडल सामने आ गया है।
यह कोई साधारण प्रशासनिक चूक नहीं है।
यह एक ऐसा मॉडल है जहाँ नियम बदले गए, प्रक्रियाओं को मोड़ा गया और पूरे तंत्र को एक बाहरी नेटवर्क के सामने सरेंडर कर दिया गया।
खेल की शुरुआत: जब स्थापित व्यवस्था को जानबूझकर तोड़ा गया
बरसों से स्कूल शिक्षा विभाग और राज्य शिक्षा केंद्र (RSK) की अपनी एक स्थापित, विशेषज्ञ-आधारित और अपेक्षाकृत पारदर्शी कार्यप्रणाली रही है।
टीचर ट्रेनिंग हो, शैक्षणिक सामग्री की आपूर्ति हो या अकादमिक मॉनिटरिंग—RSK इन सभी मामलों में नोडल एजेंसी रहा है।
लेकिन अचानक, बिना किसी सार्वजनिक बहस या ठोस औचित्य के, इस व्यवस्था में ‘सेंध’ लगाई जाती है।
RSK को किनारे कर, पाठ्यपुस्तक निगम को क्यों सौंपा गया काम?
जिन कार्यों के लिए शैक्षणिक विशेषज्ञता और अकादमिक अनुभव अनिवार्य था, उन्हें सुनियोजित तरीके से मध्य प्रदेश पाठ्यपुस्तक निगम के हवाले कर दिया गया।
सवाल यह नहीं है कि काम एक संस्था से दूसरी को क्यों दिया गया—
सवाल यह है कि रास्ता क्यों बदला गया?
क्योंकि इसी बदले हुए रास्ते में ऐसे नियम गढ़े गए जहाँ:
खुली प्रतिस्पर्धा (Open Competition) को लगभग खत्म कर दिया गया
टेंडर की शर्तें चुनिंदा लोगों के अनुकूल बनाई गईं
जवाबदेही की रेखाएँ जानबूझकर धुंधली कर दी गईं
यह कोई प्रशासनिक सुधार नहीं था।
यह 100 करोड़ रुपये की लूट का रास्ता साफ करने की रणनीति थी।
‘खास’ महिला की एंट्री: बाहर से आई सत्ता का खेल
इसी बदले हुए सिस्टम से होती है एंट्री—
दूसरे राज्य की एक ‘खास’ महिला, जिसे विभागीय गलियारों में अब ‘मैडम सिंह’ के नाम से जाना जा रहा है।
टीचर ट्रेनिंग जैसा संवेदनशील और भविष्य-निर्माण से जुड़ा कार्य,
करीब 100 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट—
बिना पर्याप्त अनुभव,
बिना किसी ऐतिहासिक साख के,
बिना मध्य प्रदेश के शैक्षणिक इकोसिस्टम से किसी ठोस जुड़ाव के—
सीधे उस महिला के नेटवर्क को सौंप दिया जाता है।
सवाल सीधा है: किसके “प्रकाश” में बंटी यह रेवड़ी?
मध्य प्रदेश में दर्जनों योग्य संस्थान मौजूद हैं।
शिक्षा, प्रशिक्षण और अकादमिक रिसर्च से जुड़े अनुभवी संगठन हैं।
तो फिर—
स्थानीय संस्थानों को नजरअंदाज क्यों किया गया?
टेंडर की शर्तें इतनी संकीर्ण क्यों रखी गईं?
और सबसे अहम सवाल—
आखिर किसके “प्रकाश” में यह पूरा खेल खेला गया?
खेल सिर्फ ट्रेनिंग तक सीमित नहीं रहा
जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे स्कूलों में सप्लाई की जाने वाली सामग्री को लेकर भी भारी धांधली की बू आने लगती है।
टेंडर की भाषा ऐसी, तकनीकी शर्तें ऐसी, और समयसीमा इतनी ‘परफेक्ट’—
कि केवल चुनिंदा खिलाड़ी ही दौड़ में टिक सकें।
यह वही “अदृश्य सत्ता मॉडल” है— जहाँ आदेश फाइलों में नहीं, मौखिक संकेतों में दिए जाते हैं
और फाइलें रातों-रात दौड़ने लगती हैं।
शिक्षा मंत्री से सीधे सवाल
राव उदय प्रताप सिंह,
प्रदेश के शिक्षा मंत्री होने के नाते आपको जवाब देना होगा—
क्या पाठ्यपुस्तक निगम को दी गई ये असामान्य शक्तियाँ आपकी जानकारी के बिना दी गईं?
क्या नियमों में किया गया यह बदलाव वास्तव में जनहित में था?
या फिर यह सब उस महिला को फायदा पहुँचाने के लिए किया गया,
जिसका प्रभाव आपके विभाग पर हावी बताया जा रहा है?
मौन भी एक जवाब होता है—
और इस मामले में मौन, शक को और गहरा करता है।
मुख्यमंत्री के सामने सबसे बड़ा इम्तिहान
मोहन यादव,
आप प्रदेश के मुखिया हैं।
आयुष्मान योजना के घोटाले से लेकर
अब शिक्षा विभाग के इस 100 करोड़ के खेल तक—
क्या आपकी ‘ज़ीरो टॉलरेंस ऑन करप्शन’ की नीति सिर्फ भाषणों और फाइलों तक सीमित रह जाएगी?
या फिर उन चेहरों पर भी कार्रवाई होगी
जिनका रसूख आपके सुशासन को खुली चुनौती दे रहा है?
बच्चों का भविष्य गिरवी है
यह कोई साधारण वित्तीय घोटाला नहीं है।
यह मध्य प्रदेश के बच्चों के भविष्य से किया गया समझौता है।
जब शिक्षा को कमाई का साधन बना दिया जाता है,
तो समाज की नींव ही कमजोर हो जाती है।
Akhileaks का संकल्प
Akhileaks किसी को डराने के लिए नहीं,
बल्कि सच दिखाने के लिए खड़ा है।
अगर आज इन सवालों के जवाब नहीं मिले,
तो मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की यह ‘लंका’ पूरी तरह खाक हो जाएगी।
सत्ता मौन है।
अफसर नतमस्तक हैं।
लेकिन जनता सब देख रही है।
अखिलीक्स — सच की धार, जनता की आवाज़।

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