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BJP पार्षद बनाम अध्यक्ष! मध्यप्रदेश की नगरपालिकाओं में गूंज रहा सत्ता संग्राम

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जब लोकतंत्र की सबसे नज़दीकी इकाई — नगरपालिका — ही सत्ता संघर्ष का अखाड़ा बन जाए… और वहाँ विपक्ष नहीं, बल्कि अपना ही दल अध्यक्ष को हटाने की कोशिश करे — तो समझिए बात सिर्फ कुर्सी की नहीं है… यह अंदरूनी सफाई की वह पटकथा है जो प्रदेश से लेकर पार्षद तक एक साथ खेली जा रही है।

Akhileaks की इस विशेष रिपोर्ट में पढ़िए —
कैसे “स्थायित्व” के नाम पर जवाबदेही फ्रीज कर दी गई,
कैसे “संगठन की सफाई” ने पार्षदों को विद्रोही बना दिया,
और कैसे कुर्सी के नीचे, लोकतंत्र की बुनियाद हिलती दिखाई दे रही है।

पृष्ठभूमि:

2024 का संशोधन:

पहले: अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव 2 साल बाद ही लाया जा सकता था।

अब: यह सीमा 3 साल कर दी गई।

पहले: 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित होता था।

अब: ज़रूरत है 3/4 बहुमत की।

सरकार का तर्क: “स्थायित्व से विकास होगा।”
आलोचकों की आपत्ति: “ये 3 साल का अभयदान है — जवाबदेही को फ्रीज करने वाला।”

जिला-दर-जिला गड़बड़ी:

जिला पार्षदों की संख्या अध्यक्ष का नाम पार्टी विरोधी पार्षद विशेष टिप्पणी

देवरी 12 में से 12 नेहा जैन BJP सभी 12 पूरा सदन खिलाफ
नर्मदापुरम 25 में से 21 नीतू यादव BJP 21 विकास ठप, संवाद शून्य
टीकमगढ़ 25 में से 19 पप्पू मलिक BJP+INC+IND 19 सर्वदलीय विरोध
दमोह 25 में से 20 मंजू राय BJP 20 वोटिंग से पहले नियम बदला
मऊगंज 15 में से 12 ब्रजवासी पटेल BJP 12 3 साल की शील्ड
कुंभराज 15 में से 13 नाम उजागर नहीं BJP 13 क्रॉसपार्टी असंतोष
चाचौड़ा 15 में से 13 नाम उजागर नहीं BJP 13 विपक्ष भी साथ
शाढोरा 20 में से 8 नाम उजागर नहीं BJP 8 12 पार्षदों की ज़रूरत

 

विश्लेषण: क्या चल रहा है वास्तव में?

1. गुटबाज़ी बनाम लोकतंत्र
वीडी शर्मा के जाने और हेमंत खंडेलवाल के आने के बाद
संगठन में बड़ा बदलाव देखा गया।
कई नगरपालिका अध्यक्ष पुराने गुट से जुड़े माने जाते हैं।
अब नए पार्षद, अपने गुट को मजबूत करना चाहते हैं।

2. सत्ता की अंदरूनी सफाई
BJP के “संगठनात्मक अनुशासन” अभियान के तहत
नगरपालिकाओं में भी साफ-सफाई शुरू हो चुकी है।

3. प्रशासनिक हस्तक्षेप या मौखिक कंट्रोल?

प्रस्ताव रोके गए

जांच लंबित रखी गई

पार्षदों की फाइलें “अपरिचालनिक” घोषित

मुख्यमंत्री सचिवालय से मौखिक निर्देश: “अभी रुको, चुनाव बाद देखेंगे”

 

 

संवैधानिक सवाल:

> “क्या पार्षदों की आवाज़ को तीन साल तक म्यूट करना
संविधानिक मूल्यों के खिलाफ नहीं है?”

 

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है:
“लोकल बॉडीज़ जवाबदेह लोकतंत्र की रीढ़ हैं।”

हाईकोर्ट के कुछ फैसलों ने
रोक को हटाकर अध्यक्षों को हटाने की मंज़ूरी दी है।

➡ क्या 3 साल वाला नियम अब संवैधानिक समीक्षा के घेरे में आएगा?
➡ क्या इसे चुनाव से पहले बदलाव की दिशा में ले जाया जाएगा?

आगे क्या?

2026–27 में हो सकते हैं निकाय चुनाव

यह बगावत सिर्फ वर्तमान कुर्सी के लिए नहीं —
अगले चुनाव में संगठन की पकड़ सुनिश्चित करने का प्रयास भी है।

 

Akhileaks Verdict:

> “स्थायित्व” एक भ्रम बन चुका है,
असली सवाल है — जवाबदेही, पारदर्शिता और चुने हुए प्रतिनिधियों की शक्ति।

 

जनता ने जिन्हें चुनकर भेजा है —
उन्हीं को हटाने का भी संवैधानिक हक़ होना चाहिए।

“जिंदा कौमें 5 साल इंतज़ार नहीं करतीं…”

 

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