Exclusive

BJP का ‘Mission 45’: पीढ़ीगत बदलाव या सीनियर-मुक्त पार्टी की पटकथा?

राजनीति में अक्सर जो दिखता है, वही पूरा सच नहीं होता। और जो असल में होता है, उसे अक्सर इतनी खामोशी से अंजाम दिया जाता है कि खबर बनने से पहले ही इतिहास बन जाता है। आज दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग से लेकर नागपुर के रेशिम बाग तक फैली इसी खामोशी को पढ़ने की कोशिश कर रहा है Akhileaks।

भारतीय जनता पार्टी ने 45 वर्षीय नितिन नवीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है। टीवी स्टूडियो इसे ‘Generational Shift’ बता रहे हैं, सोशल मीडिया इसे ‘युवा ऊर्जा’ कह रहा है, लेकिन सत्ता के गलियारों में यह फैसला एक अलार्म बेल की तरह सुना जा रहा है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि नितिन नवीन कौन हैं, सवाल यह है कि यह नियुक्ति किन लोगों के लिए है — और किनके खिलाफ?
राज्यों से शुरू हुआ प्रयोग, अब राष्ट्रीय मॉडल
पिछले दो वर्षों में बीजेपी ने एक ऐसा पैटर्न अपनाया है जो अब अपवाद नहीं, बल्कि ‘न्यू नॉर्मल’ बन चुका है। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान जैसे स्थापित और लोकप्रिय मुख्यमंत्री को हटाकर अपेक्षाकृत नए चेहरे मोहन यादव को सत्ता सौंपी गई। राजस्थान में वसुंधरा राजे को किनारे कर भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाया गया।
तब कहा गया था कि यह राज्यों का प्रयोग है। लेकिन नितिन नवीन की ताजपोशी ने साफ कर दिया है कि यह प्रयोग अब राष्ट्रीय स्तर पर लागू हो चुका है। संदेश स्पष्ट है—बीजेपी अब अनुभव से ज्यादा अनुपालन (Compliance) को प्राथमिकता दे रही है।
सीनियरिटी अब योग्यता नहीं, बोझ बन चुकी है
मोदी-शाह युग में ‘वरिष्ठता’ अब पद पाने की गारंटी नहीं रही। बल्कि कई मामलों में यह एक डिसएडवांटेज बनती जा रही है। 45 साल का अध्यक्ष चुनने का सीधा मतलब है—हाईकमान को ऐसा चेहरा चाहिए जो फैसलों पर सवाल न उठाए, बल्कि उन्हें लागू करे।
एक युवा अध्यक्ष से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह वीटो लगाए या संतुलन साधने की कोशिश करे। वह ‘सिस्टम का चेहरा’ होता है, ‘सिस्टम का सेंटर’ नहीं। यही वजह है कि पार्टी के कई दिग्गज नेताओं के लिए यह नियुक्ति अस्तित्व का संकट बन गई है।
दिग्गजों की खामोशी क्या कहती है?
इस फैसले के बाद जो सबसे ज्यादा मुखर चीज़ सामने आई है, वह है — खामोशी।
शिवराज सिंह चौहान
मध्य प्रदेश से केंद्र में आने के बाद यह माना जा रहा था कि उनका कद राष्ट्रीय राजनीति में और बड़ा होगा। अध्यक्ष पद की चर्चाओं में उनका नाम भी शामिल था। लेकिन अब स्थिति यह है कि उन्हें एक ऐसे अध्यक्ष के अधीन काम करना होगा जो उम्र और अनुभव में उनसे लगभग दो दशक छोटा है। यह सिर्फ पद का सवाल नहीं, यह राजनीतिक मनोविज्ञान का सवाल है।
धर्मेंद्र प्रधान और भूपेंद्र यादव
संगठन को खड़ा करने वाले, चुनाव जीतने वाले, और संकट में पार्टी को संभालने वाले ये चेहरे अब एक स्पष्ट संदेश पढ़ रहे हैं—“आप मैनेजर हैं, लीडर नहीं।” यह संदेश पार्टी के भीतर एक नई रेखा खींचता है।
कैडर में बढ़ता असंतोष
बीजेपी का सामान्य कार्यकर्ता अब उलझन में है। उसे समझ नहीं आ रहा कि संगठन में ऊपर जाने का रास्ता क्या है—सालों की तपस्या या अचानक किसी की ‘गुड बुक’ में आ जाना? यह भ्रम धीरे-धीरे गुस्से में बदल रहा है।
2004 की परछाईं: इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
2003-04 में अटल-आडवाणी युग अपने चरम पर था। ‘इंडिया शाइनिंग’ का नारा गूंज रहा था। तब भी यही माना गया कि पार्टी अब स्वयंसेवक-आधारित नहीं, बल्कि चेहरा-आधारित हो चुकी है। संघ ने कोई बयान नहीं दिया, कोई विरोध नहीं किया—बस अपनी मशीनरी को निष्क्रिय कर दिया। नतीजा इतिहास है।
आज 2025 में, Akhileaks को मिल रहे इनपुट्स बताते हैं कि कई नाराज और असहज नेता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय नागपुर का रुख कर चुके हैं। संदेश साफ है—“संगठन में सामूहिकता टूट रही है। अगर कार्यकर्ता बैठ गया, तो चुनाव जीतना मुश्किल हो जाएगा।”
संघ की संभावित चालें: सर्जिकल नहीं, रणनीतिक
संघ कभी त्वरित धमाके नहीं करता। उसकी रणनीति धीमी लेकिन गहरी होती है।
संगठन महामंत्री के ज़रिए नियंत्रण – संघ अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से राज्य इकाइयों पर पकड़ मजबूत कर सकता है।
साइलेंट वीटो – असंतुलन बढ़ने पर हाईकमान को फैसले बदलने के लिए बाध्य किया जा सकता है।
चेतावनी संकेत – किसी एक चुनाव में संगठनात्मक ढील यह दिखाने के लिए काफी होगी कि जमीनी ताकत कहाँ है।
निष्कर्ष: खामोशी को हल्के में मत लीजिए
नितिन नवीन का अध्यक्ष बनना बीजेपी के लिए एक नई शुरुआत हो सकता है, लेकिन पार्टी के पुराने वटवृक्षों के लिए यह अलार्म है। यह खामोशी सामान्य नहीं है। यह उस तूफान से पहले की शांति है, जिसमें असंतोष का लावा भीतर ही भीतर पक रहा है।
इतिहास गवाह है—जब कोई नेता संगठन से बड़ा होने की कोशिश करता है, तो संगठन उसे उसकी जगह दिखा देता है। आने वाले तीन महीने भारतीय राजनीति के लिए निर्णायक हो सकते हैं। क्योंकि अब खेल सिर्फ दिल्ली में नहीं, नागपुर में भी लिखा जा रहा है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button