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बीजेपी की पीढ़ीगत सफाई: संगठन से कैबिनेट तक ‘मिनी-सुनामी’

राजनीति में कहा जाता है कि जब पूरा सिस्टम दाईं ओर देख रहा होता है, तब नरेंद्र मोदी बाईं ओर से निकल जाते हैं। बीते कुछ महीनों से दिल्ली के सत्ता गलियारों, लुटियंस ज़ोन की ड्रॉइंग रूम पॉलिटिक्स और टीवी स्टूडियोज़ में एक ही सवाल गूंज रहा था—जेपी नड्डा के बाद कौन? नाम कई चले, अटकलें और भी ज़्यादा लगीं, लेकिन मोदी ने अपनी जेब से जो नाम निकाला, उसने न सिर्फ बीजेपी के भीतर बल्कि विपक्ष के खेमे में भी खलबली मचा दी।

नाम है—नितिन नवीन।
उम्र—महज़ 45 साल।
यह सिर्फ एक नियुक्ति नहीं है। यह एक राजनीतिक चाल है। यह फैसला विपक्ष के उस नैरेटिव पर सीधा प्रहार है, जो पिछले एक साल से लगातार गढ़ा जा रहा था कि बीजेपी “बूढ़ों की पार्टी” बन चुकी है। मोदी ने एक ही फैसले से न सिर्फ इस कहानी को पलट दिया, बल्कि 2029 और 2034 की बुनियाद भी रख दी।

विपक्ष का सबसे बड़ा हमला और मोदी का जवाब
पिछले एक साल में विपक्ष का सबसे बड़ा हमला क्या था?
एक ही लाइन—“मोदी 75 के हो रहे हैं, उनकी टीम रिटायरमेंट के करीब है, भविष्य हमारा है।” विपक्ष ने अपनी राजनीति को ‘युवा चेहरों’ के इर्द-गिर्द खड़ा करने की कोशिश की। चार नाम बार-बार उछाले गए—
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव
महाराष्ट्र में आदित्य ठाकरे
पश्चिम बंगाल में अभिषेक बनर्जी
और बसपा में आकाश आनंद
इन सभी की यूएसपी एक ही थी—“हम युवा हैं, हम Gen Z और Millennials की नब्ज़ समझते हैं।” लेकिन नितिन नवीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर मोदी ने इन चारों के मुंह पर एक साथ ताला जड़ दिया।

‘युवा कामदार’ बनाम ‘युवा नामदार’
ज़रा उम्र का गणित देखिए।
नितिन नवीन—45 साल।
अखिलेश यादव—50 पार।
अभिषेक बनर्जी और आदित्य ठाकरे—अब राजनीति के ‘लड़के’ नहीं रहे।
लेकिन फर्क सिर्फ उम्र का नहीं है। फर्क पृष्ठभूमि का है। नितिन नवीन की राजनीति वंशवाद से नहीं, बल्कि संगठन, संघर्ष और ज़मीनी काम से निकली है। यही वजह है कि मोदी ने नैरेटिव बदल दिया है। अब मुकाबला “युवा बनाम बुजुर्ग” का नहीं रहेगा, बल्कि होगा—‘युवा कामदार’ बनाम ‘युवा नामदार’।
यह विपक्ष के लिए एक मुंहतोड़ जवाब है। अब वे यह नहीं कह पाएंगे कि बीजेपी युवाओं को मौका नहीं देती।
Rule of 45: सिर्फ ट्रेलर, पिक्चर अभी बाकी
Akhileaks को मिले एक्सक्लूसिव इनपुट्स बताते हैं कि नितिन नवीन की नियुक्ति सिर्फ शुरुआत है। संगठन में एक नया फॉर्मूला लागू किया जा रहा है—जिसे हम ‘Rule of 45’ कह सकते हैं।
सूत्रों के मुताबिक, नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के तहत नियुक्त होने वाले चार प्रमुख महासचिव भी 45 साल के आसपास के होंगे। संदेश साफ़ है—अब ‘नाम’ नहीं, सिर्फ ‘काम’ चलेगा।
सबसे अहम पद—संगठन महामंत्री। बीजेपी में इसे ‘सुपर प्रेसिडेंट’ कहा जाता है। लंबे समय से इस पद पर रहे बी. एल. संतोष का युग अब ढलान पर माना जा रहा है। उनकी जगह जिन दो नामों पर चर्चा सबसे तेज़ है, वे हैं—अरविंद मेनन और अरुण कुमार।
अरविंद मेनन का ट्रैक रिकॉर्ड—खासतौर पर मध्य प्रदेश और बंगाल में—मोदी-शाह को बेहद पसंद है। लो-प्रोफाइल, लेकिन हाई-परफॉर्मेंस। यानी संगठन की पूरी ‘हार्ड ड्राइव’ बदली जा रही है—पुराना डेटा डिलीट, नया ऑपरेटिंग सिस्टम इंस्टॉल।

कैबिनेट में ‘मिनी-सुनामी’ की तैयारी
संगठन के बाद बारी आती है सरकार की। अगला कैबिनेट रिशफल कोई मामूली फेरबदल नहीं होगा। इसे आप एक ‘मिनी-सुनामी’ कह सकते हैं।
सूत्रों के अनुसार, इस सरकार में सिर्फ चार मंत्री पूरी तरह सुरक्षित माने जा रहे हैं—
राजनाथ सिंह – अनुभव और स्वीकार्यता
अमित शाह – नंबर 2, रणनीतिक केंद्र
एस. जयशंकर – वैश्विक छवि
निर्मला सीतारमण – अर्थव्यवस्था पर पकड़
बाकी लगभग सभी मंत्रियों को ‘नमस्ते’ करने की तैयारी है। कृषि, शिक्षा, रेलवे और ग्रामीण विकास जैसे बड़े मंत्रालयों में बैठे कई दिग्गज अब मोदी की प्राथमिकता में नहीं हैं। 2025 का मोदी मॉडल निर्दयी (Ruthless) है—डिलीवरी होगी तो कुर्सी बचेगी, वरना मार्गदर्शक मंडल या घर का रास्ता।

नितिन गडकरी और BMC के बाद का बड़ा फैसला
लुटियंस दिल्ली में एक और चर्चा दबी जुबान में है—नितिन गडकरी को लेकर। माना जा रहा है कि बीएमसी चुनावों के बाद—जो महाराष्ट्र की राजनीति का लिटमस टेस्ट होगा—गडकरी जी पर भी बड़ा फैसला लिया जा सकता है।
यह फैसला जोखिम भरा होगा, लेकिन मोदी जोखिम लेने से कभी पीछे नहीं हटे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ समन्वय में इस बड़े ट्रांजिशन की तैयारी पहले से चल रही है।

राजभवन: सीनियर नेताओं का ‘गोल्डन हैंडशेक’
तो सवाल उठता है—हटाए गए दिग्गज जाएंगे कहाँ?
राजनीति में एक पुरानी कहावत है—“जब मंत्री पद जाता है, तो राजभवन का दरवाज़ा खुलता है।” देश के कई राज्यों में राज्यपाल के पद खाली हैं या जल्द खाली होने वाले हैं। मोदी ने सीनियर मंत्रियों के लिए सम्मानजनक एग्जिट रूट तैयार कर रखा है—एक तरह का गोल्डन हैंडशेक।
निष्कर्ष: 2047 की तैयारी, 45 पहली ईंट
नितिन नवीन को कमान, 45 साल के महासचिव, संगठन महामंत्री का बदलाव, कैबिनेट की सफाई और सीनियर नेताओं को राजभवन भेजना—इन्हें अलग-अलग मत देखिए। यह एक ही तस्वीर के अलग-अलग हिस्से हैं।
प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं कि 2029 का चुनाव वे चेहरे के तौर पर लड़ें या न लड़ें, लेकिन वे चाहते हैं कि पार्टी जब बैटन पास करे, तो वह 70-80 के दशक वाली राजनीति के हाथों में न जाए। बीजेपी को Future-Ready बनाया जा रहा है।
विपक्ष अभी 2024-25 के गणित में उलझा है, और मोदी 2047 का रोडमैप लिख रहे हैं।
45 साल के नितिन नवीन उसी रोडमैप का पहला मील का पत्थर हैं।

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