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भोपाल: ताल-तलैयों से ड्रग फैक्ट्रियों तक — मछली परिवार की कहानी

प्रस्तावना: भोपाल की बदलती पहचान

भोपाल… जिसे कभी ताल-तलैयों, मंदिरों और शांति की नगरी कहा जाता था। लेकिन आज उसी शहर की पहचान खतरनाक रूप से बदल रही है। शाहवर मछली और उसके भतीजे यासीन के नेटवर्क ने इस शहर को MD ड्रग फैक्ट्रियों और क्राइम हब से जोड़ दिया है। यह सिर्फ़ अपराध की कहानी नहीं, बल्कि सिस्टम, प्रशासन और राजनीति पर गंभीर सवाल है।

15,000 वर्गफीट की कोठी से मलबे तक

  • मछली परिवार की आलीशान तीन मंज़िला कोठी — जो कभी ताकत और रसूख का प्रतीक थी — अब मलबे में तब्दील हो चुकी है।
  • C&D वेस्ट प्लांट भेजा गया मलबा अब ईंट और टाइल्स बनाकर शहर की सड़कों व नालों में भराव रोकने के काम आएगा।
  • प्रशासन का दावा है कि यह कार्रवाई अपराध और अतिक्रमण के खिलाफ़ सख्ती का प्रतीक है।
    लेकिन बड़ा सवाल यही है — क्या सिर्फ़ दीवारें गिरा देने से ड्रग माफिया खत्म हो जाएगा?

सिस्टम से बाहर का ‘सिलेबस’

जब NDPS कोर्ट ने यासीन मछली की जमानत खारिज की, तो साफ़ कहा — “अगर आरोपी बाहर निकला तो फरार होगा और अपराध दोहराएगा।” उसके पास से 1.05 ग्राम MD ड्रग मिली थी, लेकिन अदालत ने माना कि यह सप्लाई चेन का हिस्सा था।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि —

  • अक्टूबर 2024: बगरोदा से 900 किलो MD ड्रग (₹1814 करोड़) बरामद।
  • जुलाई 2025: जगदीशपुर से 61.2 किलो MD ड्रग (₹92 करोड़) पकड़ी गई।
  • दोनों बार कार्रवाई गुजरात ATS और NCB ने की।
  • भोपाल पुलिस और लोकल इंटेलिजेंस को भनक तक नहीं लगी।

जब अफसरों से पूछा गया कि “भोपाल में और कितनी फैक्ट्रियां हैं?” जवाब मिला —
“ये हमारे सिलेबस से बाहर है।”
यह मज़ाक नहीं, सिस्टम की नाकामी का बयान है।

लाइसेंस की आड़ और प्रशासन की आंख मूंदनी

  • भोपाल में ड्रग फैक्ट्रियां खड़ी करना उतना ही आसान था जितना गुमास्ता लाइसेंस लेना।
  • यहां तक कि कभी पूर्व DGP त्रिपाठी के घर का भी गुमास्ता बन गया था।
  • इंडस्ट्री इंस्पेक्टर, ड्रग इंस्पेक्टर, GST टीम — सबके पास जांच की ताकत थी।
  • फिर भी किसी ने आंखें खोलने की ज़रूरत नहीं समझी।

नया एंगल: ग्रीन बेल्ट में अवैध मदरसा

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि ग्रीन बेल्ट की सरकारी ज़मीन पर बने अवैध मदरसे को भी गिराया जाए।

आरोप है कि यहां दूसरे राज्यों से बच्चों को लाकर कट्टरपंथी तालीम दी जाती थी।
यह मामला अब सिर्फ़ अतिक्रमण का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विचारधारा से जुड़ गया है।

राजनीति की खामोशी

इतना बड़ा ड्रग–रेप–अवैध कब्ज़ा नेटवर्क सामने आने के बावजूद —

  • विधानसभा में न हंगामा हुआ,
  • न विपक्ष ने आवाज उठाई,
  • न ही सत्ता पक्ष ने बहस की।

बीजेपी और कांग्रेस दोनों चुप।
क्या यह सिर्फ़ अपराध का मामला है, या इसके पीछे राजनीतिक संरक्षण भी है?

निष्कर्ष: भोपाल का भविष्य दांव पर

भोपाल कभी ताल-तलैयों और मंदिरों की नगरी था। आज उसकी पहचान ड्रग फैक्ट्रियों और माफिया नेटवर्क से बनने लगी है। सवाल यह है —

क्या प्रशासन सिर्फ़ कोठी गिराकर इतिश्री कर लेगा?

या सरकार अपना “सिलेबस” बदलेगी और जड़ तक जाकर इस जहर को खत्म करेगी?

याद रखिए — यह मामला सिर्फ़ एक परिवार का नहीं, बल्कि हमारे बच्चों के भविष्य का है। अगर सिस्टम ने आंखें न खोलीं, तो आने वाली पीढ़ियां भोपाल को शांति की नगरी नहीं, बल्कि ड्रग माफिया का अड्डा कहेंगी।

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