आयुष्मान योजना में ‘महाघोटाला’: गरीबों के इलाज पर भ्रष्टाचार का कैंसर
दोस्तों, मध्य प्रदेश में गरीबों के मुफ्त इलाज के लिए शुरू की गई आयुष्मान भारत योजना आज खुद ICU में है। जिस योजना का मकसद था कि पैसों के अभाव में कोई इलाज से न मरे, उसी योजना को कुछ भ्रष्ट अफसरों ने अवैध कमाई का एटीएम बना लिया है। सवाल ये नहीं है कि घोटाला हुआ या नहीं—सवाल ये है कि यह घोटाला कितनी ऊँचाई तक फैला हुआ है।
“10 लाख दीजिए, अस्पताल पैनल में जुड़वाइए।”
यह कोई अफवाह नहीं, बल्कि स्टिंग ऑपरेशन में रिकॉर्ड हुआ वह रेट कार्ड है, जिसने भोपाल के सत्ता गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। आज Akhileaks आपको उस संगठित सिंडिकेट का डीएनए टेस्ट दिखा रहा है, जिसमें नाम सामने आए हैं—छोटेलाल, सिकरवार और एक बिचौलिया आयुष्मान मित्र। यह सिर्फ रिश्वत का खेल नहीं, बल्कि गरीब मरीजों की ज़िंदगी से किया गया खुला खिलवाड़ है।
स्टिंग ऑपरेशन: कैसे खुली परत-दर-परत साजिश
जब एक रिपोर्टर फर्जी अस्पताल संचालक बनकर सिस्टम के अंदर दाखिल हुआ, तो भ्रष्टाचार की परतें प्याज के छिलकों की तरह उतरने लगीं। स्टिंग में साफ दिखाई देता है कि यह कोई इक्का-दुक्का अफसर की करतूत नहीं, बल्कि एक पूरी चेन है—दलाल से लेकर अफसर तक।
इस घोटाले के तीन मुख्य किरदार हैं:
- पहला मोहरा: संदीप सिंह — आयुष्मान मित्र, जो दलाल की भूमिका निभाकर नए अस्पतालों को फंसाता था।
- दूसरा मोहरा: छोटेलाल सिंह — आयुष्मान योजना के CEO योगेश भरसट का निजी सहायक (PA), जो सौदे तय करता था।
तीसरा मोहरा: इंद्रजीत सिकरवार — विभाग का महाप्रबंधक (GM), जिसकी मंजूरी के बिना पत्ता तक नहीं हिलता।
मंदिर, कैफे और ‘रेट कार्ड’: रिश्वत की खुली मंडी
छोटेलाल इतना शातिर था कि दफ्तर में बात करने से बचता था। वह सौदे फाइनल करने के लिए रिपोर्टर को चार इमली मंदिर के पास या होशंगाबाद रोड के महंगे कैफे में बुलाता था। वहाँ सीधे कहा जाता था—
“साहब, 10 लाख लगेंगे। 6 लाख ऊपर देने पड़ेंगे।”
यानी रिश्वत का पूरा रेट कार्ड तय था।
किसे कितना जाना है, सब पहले से सेट।
200 अस्पताल बाहर, नए ‘रिश्वत वाले’ अंदर!
इस घोटाले का सबसे घिनौना सच तब सामने आया, जब छोटेलाल ने कैमरे पर कबूला कि मार्च महीने में करीब 200 अस्पतालों को जानबूझकर पैनल से हटाया जाएगा।
क्यों?
ताकि जिन नए अस्पतालों से 10-10 लाख की डील हो चुकी है, उन्हें खाली हुई जगह पर फिट किया जा सके।
मतलब साफ है—
इलाज की गुणवत्ता नहीं, कैश क्वालिफिकेशन तय करता है।
कागज़ों में डॉक्टर, ज़मीन पर ज़ीरो सुविधा
स्टिंग में यह भी सामने आया कि कई अस्पतालों में:
न फुल-टाइम डॉक्टर हैं
न स्पेशलिस्ट मौजूद
न ज़रूरी मशीनें
लेकिन कागज़ों में सब परफेक्ट।
स्पेशलिस्ट “किराए” पर दिखाए जाते हैं, फाइलें चमकाई जाती हैं, और अगर जेब में 10 लाख हों—तो रेड कार्पेट बिछ जाता है।
यहाँ तक कि मीटिंग्स GM साहब के घर पर तय होती थीं, ताकि सीधे CEO से फोन पर बात कराकर “भरोसा” दिलाया जा सके।
एक्शन हुआ… लेकिन क्या यह काफी है?
खबर सामने आते ही स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल एक्शन में आए।
छोटेलाल और सिकरवार सस्पेंड हुए, आयुष्मान मित्र बर्खास्त किया गया।
लेकिन Akhileaks कुछ बुनियादी सवाल पूछता है:
CEO योगेश भरसट, क्या यह मुमकिन है कि आपका PA लाखों की डील करता रहा और आपको भनक तक नहीं लगी?
स्वास्थ्य मंत्री जी, क्या सिर्फ सस्पेंशन से यह कैंसर खत्म हो जाएगा? जो 6 लाख “ऊपर” जाने थे, वो ऊपर कौन है?
मुख्यमंत्री जी, क्या पिछले एक साल में पैनल में शामिल सभी अस्पतालों की दोबारा निष्पक्ष जांच होगी? या रिश्वत से जुड़े अस्पताल यूं ही मरीजों की जान से खेलते रहेंगे?
सस्पेंशन नहीं, सिस्टम का ऑपरेशन चाहिए
साथियों, यह सिर्फ दो-तीन अफसरों का मामला नहीं है।
यह एक मेडिकल माफिया नेटवर्क है, जिसकी जड़ें बहुत गहरी हैं।
सस्पेंशन तो सिर्फ एक झांकी है।
असली लड़ाई तब होगी, जब बड़े मगरमच्छों तक कानून का हाथ पहुँचेगा।
आपकी राय मायने रखती है
आप क्या सोचते हैं?
क्या छोटे अफसरों को बलि का बकरा बनाकर बड़े चेहरों को बचाया जा रहा है?



