Akhileaks: क्या ‘लाड़ली लक्ष्मी’ सिर्फ कागजों पर लखपति है? एमपी की ‘गेम चेंजर’ योजना का कड़वा सच
मध्य प्रदेश की राजनीति में एक दौर ऐसा आया जब ‘बेटियों’ को वोट बैंक से ऊपर उठकर ‘लाड़ली’ का दर्जा दिया गया। साल 2007 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जब ‘लाड़ली लक्ष्मी योजना’ की नींव रखी, तो मकसद नेक था— बेटियों को आर्थिक बोझ के कलंक से मुक्ति दिलाना और उन्हें ‘लखपति’ बनाना। मंचों से गूँजते वादे और सुनहरे भविष्य के सपनों के बीच आज 19 साल बीत चुके हैं। लेकिन, जब विधानसभा के पटल पर खुद सरकार ने आंकड़े रखे, तो ‘Akhileaks’ की पड़ताल में एक डरावनी तस्वीर उभर कर सामने आई।
क्या हमारी लाड़लियाँ वाकई लखपति बन रही हैं, या सिस्टम की पेचीदगियों ने उनके सपनों का दम घोंट दिया है? आइए, उन आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं जो रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं।
1. प्राइमरी स्कूल के बाद कहाँ गायब हो गईं 52% बेटियाँ?
महिला एवं बाल विकास विभाग के ताजा आंकड़े बताते हैं कि प्राइमरी (5वीं कक्षा) तक तो गाजे-बाजे के साथ रजिस्ट्रेशन होता है। लेकिन असली हकीकत मिडिल स्कूल की दहलीज पर आकर दम तोड़ देती है।
ड्रॉप-आउट का खौफनाक मंजर: कक्षा 6वीं में जहाँ 13.67 लाख बेटियों को स्कॉलरशिप मिली, वहीं 9वीं कक्षा तक पहुँचते-पहुँचते यह संख्या आधी रह गई।
सिस्टम का फेलियर: लगभग 52% बेटियाँ 5वीं के बाद गायब हो गईं। सवाल यह है कि क्या यह उनकी स्वेच्छा थी? या फिर गाँवों से स्कूलों की दूरी, असुरक्षा और परिवहन के अभाव ने उनके बढ़ते कदमों को बेड़ियाँ पहना दीं?
2. स्कॉलरशिप का गणित: ऊँट के मुँह में जीरा
सदन में महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया ने जानकारी दी कि अब तक 813.20 करोड़ रुपये की छात्रवृत्ति बाँटी गई है। सुनने में यह आंकड़ा विशाल लग सकता है, लेकिन जब आप इसे 19 साल के अंतराल और लाखों लाभार्थियों में विभाजित करते हैं, तो यह सरकारी सहायता महज एक रस्म अदायगी नजर आती है।
हडल रेस (Hurdle Race): सरकार ने 1 लाख 43 हजार रुपये का ‘आश्वासन पत्र’ तो थमा दिया, लेकिन उसे पाने के लिए शर्तों का ऐसा जाल बुना कि गरीब की बेटी बीच रास्ते में ही ‘अपात्र’ हो जाए।
3. ग्रेजुएशन का आंकड़ा: लाखों से सिमटकर चंद हजार तक
योजना की सबसे बड़ी विडंबना इसके उच्च शिक्षा के आंकड़ों में छिपी है।
कॉलेज पहुँचने का सच: जहाँ रजिस्ट्रेशन लाखों में है, वहीं ग्रेजुएशन स्तर तक पहुँचने वाली बेटियों की संख्या मात्र 22,022 रह गई है।
शर्तों की पेचीदगी: नियम कहता है कि 21 साल की उम्र, 12वीं पास और कॉलेज में अनिवार्य एडमिशन होने पर ही बड़ी मैच्योरिटी राशि मिलेगी। लेकिन जब 80% बेटियाँ स्कूलिंग के दौरान ही सिस्टम से बाहर हो रही हैं, तो वह ‘लखपति’ वाला पैसा आखिर जा किसकी जेब में रहा है? क्या यह बजट बचाने की कोई सोची-समझी रणनीति है?
4. डेटा का मायाजाल और विभाग की नींद
हैरानी की बात यह है कि 19 साल बाद अब विभाग को उन बेटियों की जानकारी जुटाने की सुध आ रही है जिन्हें रजिस्ट्रेशन के बाद फूटी कौड़ी तक नहीं मिली।
क्या यह डेटा एंट्री का फर्जीवाड़ा है?
क्या बिचौलियों ने लाड़लियों का हक मार लिया?
इतने सालों तक मॉनिटरिंग सिस्टम कहाँ सोया हुआ था?
जब ‘Akhileaks’ इन आंकड़ों को देखता है, तो सवाल उठता है कि क्या यह योजना सिर्फ ‘इवेंट मैनेजमेंट’ और ‘वोट बैंक’ का जरिया बनकर रह गई है? अगर निवेश सही दिशा में होता, तो ड्रॉप-आउट रेट कम होना चाहिए था, बढ़ना नहीं।
Akhileaks का सीधा सवाल
अगर प्रदेश की 52% बेटियाँ 5वीं के बाद घर बैठ रही हैं, तो क्या हम वाकई ‘विकसित प्रदेश’ की ओर बढ़ रहे हैं? सिर्फ योजनाओं के नाम बदलने या नए चमकदार पोस्टरों से बेटियों का भविष्य नहीं सुधरेगा।
मोहन यादव सरकार के लिए चुनौती: क्या सरकार इस ‘ड्रॉप-आउट’ को रोकने के लिए कोई ठोस नीति लाएगी या फिर सिर्फ नए रजिस्ट्रेशन का जश्न मनाया जाएगा? बेटियों को पैसे का आश्वासन नहीं, शिक्षा की गारंटी चाहिए।
आपकी क्या राय है?
क्या आपके गाँव या शहर में भी लाड़ली लक्ष्मी योजना का लाभ मिलने में दिक्कत आ रही है? क्या आपकी लाड़ली भी कागजी नियमों के जाल में उलझकर रह गई है? अपनी कहानी हमें कमेंट बॉक्स में लिखें या साझा करें।
देखते रहिए ‘Akhileaks’ – जहाँ हम सिर्फ खबर नहीं दिखाते, सत्ता को हकीकत का आईना भी दिखाते हैं।



