मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के निजीकरण की पहल जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय : जन स्वास्थ्य अभियान म. प्र.

भोपाल

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी दूर करने के नाम पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) को निजी संस्थाओं के हाथों सौंपने की पहल एक बार फिर से एक ऐसे मॉडल को लागू करने का प्रयास है जो देश और दुनिया में स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने में विफल साबित हुआ है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रदेश सरकार रीवा, देवास और गुना जिलों के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों शुरुआती चरण में निजी संस्थाओं को देने जा रह है और प्रयोग सफल होने पर इस पूरे प्रदेश में लागू करने का विचार है। 

ज्ञात हो कि मध्य प्रदेश में यह पहली बार नहीं है जब सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों को निजी हाथों में देने का प्रयास किया गया है। इससे पहले 3 नवंबर 2015 को अलीराजपुर जिला अस्पताल और जोबट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को राज्य स्वास्थ्य समिति ने दीपक फ़ाउंडेशन के साथ नियमो की अनदेखी करते हुये अनुबंध किया था, जिसमे चिकित्सकों की नियुक्ति संबन्धित संस्था द्वारा कि जाना थी, लेकिन यह मॉडल सफल नहीं हो पाया और क्षेत्र के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं देखा गया नतीजतन सरकार को इसे वापस लेना पड़ा था।  

वर्ष 2020-21 में नीति आयोग द्वारा जिला अस्पतालों को निजी संस्थाओं को देने का सुझाव दिया गया था, जिसे तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने विरोध करते हुये मानने से इंकार कर दिया था।  लेकिन 2024-25 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 13 जिला अस्पतालों को निजी क्षेत्र को सौंपने का फिर से प्रयास किया जिसके खिलाफ मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन, शासकीय स्वायत्ताशसी चिकित्सा अधिकारी संघ, एमपी मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन, शासकीय स्वायत्ताशसी चिकित्सा महासंघ, ईएसआई चिकित्सा अधिकारी, चिकित्सा अधिकारी चिकित्सा शिक्षा,  मद्यप्रदेश जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन, मनोरमा, मध्यप्रदेश नर्सिंग ऑफिसर एसोसिएशन, संविदा चिकित्सक संघ, आशा / आशा सहयोगिनी श्रमिक संघ, जन स्वास्थ्य अभियान (JSAI), अस्पताल बचाओ-जीव बचाओ” नेटवर्क, वकीलों और आम नागरिकों ने प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरन के खिलाफ एकजुट आवाज उठाई थी। इसके बाद सरकार ने जिला अस्पतालों के निजीकरण की योजना से पीछे हटने की घोषणा की थी। परंतु बाद में सार्वजनिक निजी भागीदारी के नाम पर प्रदेश सरकार ने नाममात्र की दर से निजी संस्थानो को जमीन आवंटित करने की बात कही थी। 

अब पुनः सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी क्षेत्र के हवाले करने की पहल राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य जिम्मेदारी से पीछे हटने का संकेत है। निजी स्वास्थ्य संस्थानो का मात्र एक ही उद्देश्य होता है मुनाफा कमाना और हम सभी ने कोविड महामारी के दौरान निजी अस्पतालों और चिकित्सा महाविद्यालयों की मुनाफाखोरी के अनुभवों को बहुत नजदीक से देखा है।

पिछले कुछ सालों से प्रदेश सरकार लगातार स्वास्थ्य सेवाओं और संस्थाओं के निजीकरण का प्रयास कर रही है, जिससे सरकार की मंशा और प्राथमिकताएँ स्पष्ट होती है । 

हम सभी का यह मानना है कि  कल्याणकारी राज्य होने के नाते जनता को मौलिक अधिकारों के तहत शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भोजन, आवास के अन्य बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराना सरकार की प्राथमिक ज़िम्मेदारी और कर्तव्य है। सरकार का यह कदम जनता के मौलिक अधिकार "राइट टू लाइफ के अनुच्छेद 21" का उल्लंघन हैं और संविधान के नीति निदेशक सिद्धांतों और अनुच्छेद 47 का उल्लंघन भी है। 

अभियान के राष्ट्रीय कन्वेनर अमूल्य निधि ने कहा कि हाल की SRS रिपोर्ट सहित विभिन्न स्वास्थ्य आंकड़े यह दर्शाते हैं कि राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए डॉक्टरों की उपलब्धता, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, जवाबदेही और बेहतर स्वास्थ्य प्रबंधन पर ध्यान देने की जरूरत है, न कि सरकारी संस्थानों को कमजोर कर निजीकरण को बढ़ावा देने की।

ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2021-22 के अनुसार प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में 4134 उप स्वास्थ्य केंद्र, 1045 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 245 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रो की कमी है इसी प्रकार की कमी आदिवासी और शहरी क्षेत्रों में भी है। साथ ही इन स्वास्थ्य केन्द्रो में चिकित्सक और अन्य मेडिकल और पेरा मेडिकल स्टाफ की कमी भी है। जन स्वास्थ्य अभियान मध्यप्रदेश का मानना है कि सरकार का प्रयास प्राथमिक स्वास्थ्य…

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button