डबरा का ‘शक्तिपथ’ – 10 साल की तपस्या, एक मंदिर और सत्ता का नया गणित
मध्य प्रदेश की सियासत में ‘संकटमोचन’ के नाम से पहचाने जाने वाले नरोत्तम मिश्रा आज एक अलग ही रूप में चर्चा के केंद्र में हैं। ग्वालियर अंचल के डबरा की धरती पर खड़ा 12 एकड़ में फैला नवग्रह शक्तिपीठ केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि एक राजनेता की 10 साल लंबी मौन साधना का जीवंत प्रतीक बन चुका है। यह कहानी सिर्फ मंदिर निर्माण की नहीं है; यह कहानी सत्ता, संघर्ष, पराजय, धैर्य और पुनरुत्थान के उस संगम की है, जिसे समझे बिना मध्य प्रदेश की वर्तमान राजनीति को पूरी तरह पढ़ा नहीं जा सकता।
डबरा में स्थापित यह नवग्रह शक्तिपीठ एशिया का सबसे बड़ा और विश्व का इकलौता ऐसा मंदिर बताया जा रहा है, जहाँ ब्रह्मांड के नौ ग्रह अपनी शक्तियों के साथ ‘सपत्नीक’ विराजमान हैं। 108 भव्य स्तंभों पर टिका यह मंदिर प्राचीन भारतीय वास्तुशास्त्र और आधुनिक इंजीनियरिंग का अनूठा मेल प्रस्तुत करता है। इसकी संरचना ऐसी है कि मीनारों की परछाइयाँ एक-दूसरे को स्पर्श तक नहीं करतीं—यह केवल स्थापत्य कला का कौशल नहीं, बल्कि प्रतीक है संतुलन और ऊर्जा-संयोजन का। 15-15 क्विंटल की अष्टधातु से निर्मित विशाल मूर्तियाँ इस परिसर को दिव्यता और भव्यता का ऐसा आयाम देती हैं, जो इसे सामान्य धार्मिक स्थल से अलग पहचान प्रदान करता है।
पिछले एक दशक में जब पूरी दुनिया नरोत्तम मिश्रा को एक आक्रामक वक्ता, कुशल रणनीतिकार और सरकार के संकटमोचक मंत्री के रूप में देख रही थी, तब डबरा की इस जमीन पर एक अलग ही इतिहास आकार ले रहा था। राजनीतिक व्यस्तताओं के बीच भी मंदिर निर्माण की हर बारीकी पर उनकी व्यक्तिगत नजर बनी रही। मूर्तियों के चयन से लेकर तांत्रिक पीठ के रूप में स्थापना तक, इस पूरे प्रकल्प को उन्होंने एक आध्यात्मिक मिशन की तरह साधा। यह वही ‘परदे के पीछे’ वाली तपस्या थी, जिसकी चर्चा सार्वजनिक मंचों पर कम, लेकिन स्थानीय स्तर पर लगातार होती रही।
विडंबना देखिए—जब यह भव्य मंदिर पूर्णता की ओर बढ़ रहा था, उसी दौर में चुनावी रणभूमि ने नरोत्तम मिश्रा को अप्रत्याशित झटका दिया। जो चेहरा टीवी स्टूडियो और राजनीतिक सुर्खियों की जान हुआ करता था, वह अचानक सत्ता की रोशनी से दूर हो गया। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठे—क्या यह उनकी सियासी यात्रा का ढलान है? क्या उनका रसूख घट रहा है? लेकिन अगर इस घटनाक्रम को सतही नजर से हटकर देखा जाए, तो तस्वीर अलग दिखाई देती है। यह हार अंत नहीं, बल्कि एक रणनीतिक विराम जैसी थी—एक ऐसा ठहराव, जहाँ से नई दिशा तय की जाती है।
सत्ता हाथ से जाने के बाद भी नरोत्तम मिश्रा ने अपनी ऊर्जा को निराशा में नहीं, बल्कि संस्थान निर्माण में लगाया। डबरा का यह शक्तिपीठ धीरे-धीरे धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बनता गया। स्थानीय अर्थव्यवस्था में हलचल बढ़ी, धार्मिक पर्यटन का दायरा विस्तृत हुआ और डबरा राष्ट्रीय मानचित्र पर एक नई पहचान के साथ उभरा। इस पूरे परिदृश्य ने नरोत्तम मिश्रा को केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक ‘संरचनात्मक विरासत’ छोड़ने वाले व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या यह शक्तिपथ उनकी सियासी वापसी का मार्ग बनेगा? ज्योतिष और तंत्र परंपराओं में नवग्रहों का संतुलन जीवन की दिशा तय करने वाला माना जाता है। जब ग्रह अपनी शक्तियों के साथ प्रसन्न होते हैं, तो वे बाधाओं को दूर करने की क्षमता रखते हैं—ऐसा विश्वास है। नरोत्तम मिश्रा ने जिस श्रद्धा और समर्पण के साथ इस नवग्रह पीठ की स्थापना की, क्या वही आध्यात्मिक ऊर्जा उनकी राजनीतिक कुंडली के अवरोधों को भी शिथिल करेगी?
‘अखिलीक्स’ का विश्लेषण कहता है कि यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव का एक मजबूत नेटवर्क है। यह नेटवर्क किसी भी राजनीतिक दल के लिए नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। डबरा अब एक उभरता हुआ धार्मिक पर्यटन हब है, और इसके केंद्र में वह नाम है जिसने इसे आकार दिया। राजनीति में अक्सर प्रतीक वास्तविक शक्ति से अधिक प्रभावी होते हैं—और यह शक्तिपीठ एक सशक्त प्रतीक के रूप में स्थापित हो चुका है।
नरोत्तम मिश्रा का यह शक्तिपथ हमें याद दिलाता है कि राजनीति केवल चुनावी जीत-हार का खेल नहीं है। असली शक्ति उस विरासत में होती है, जो नेता समाज को सौंपता है। हार क्षणिक हो सकती है, लेकिन संस्थान स्थायी होते हैं। डबरा का नवग्रह मंदिर गवाही दे रहा है कि एक दशक की मौन साधना अब सार्वजनिक प्रभाव में बदल चुकी है।
क्या यह उनकी ‘सेकंड इनिंग्स’ का प्रस्थान बिंदु है? क्या सितारों की चाल बदल चुकी है? इसका उत्तर भविष्य देगा। लेकिन इतना तय है कि डबरा की इस धरती पर जो आध्यात्मिक शक्ति स्थापित हुई है, उसने मध्य प्रदेश की राजनीति में एक नया समीकरण जरूर गढ़ दिया है। और जब भक्ति, प्रतीक और जन-संपर्क एक साथ खड़े हो जाएँ, तो सत्ता की राहें अक्सर वहीं से होकर गुजरती हैं।



