एमपी उच्च शिक्षा विभाग: 110 करोड़ की ‘सेटिंग’ वाली लैब?
क्या आपके बच्चों के लिए आने वाले कंप्यूटर और कॉलेज कैंपस में लगने वाले सीसीटीवी कैमरे, किसी की तिजोरी भरने का जरिया बन रहे हैं? मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग में 110 करोड़ रुपये के एक टेंडर को लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। यह टेंडर लगभग 80 करोड़ रुपये की कंप्यूटर लैब स्थापना और 30 करोड़ रुपये की सीसीटीवी व्यवस्था से जुड़ा बताया जा रहा है। लेकिन सवाल सिर्फ रकम का नहीं है, सवाल है—क्या टेंडर की शर्तें निष्पक्ष थीं?
अखिलीक्स की इस ‘डीप डाइव’ रिपोर्ट में हम उस टेंडर की परतें खोल रहे हैं, जिसने विभागीय गलियारों से लेकर मंत्रालय तक हलचल पैदा कर दी है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और शिकायतों में दावा किया गया है कि भंडार क्रय नियम 2022-23 की भावना के विपरीत कुछ शर्तें जोड़ी गईं, जिससे प्रतिस्पर्धा सीमित हो सकती है।
70 लाख की ईएमडी: प्रतिस्पर्धा पर पहला ताला?
टेंडर में 70 लाख रुपये की ईएमडी (Earnest Money Deposit) की शर्त बताई जा रही है। सवाल यह है कि क्या इतनी बड़ी राशि छोटे और मध्यम उद्यमियों (MSMEs) के लिए भागीदारी को कठिन नहीं बना देती? एक स्टार्टअप या स्थानीय व्यापारी के लिए 70 लाख रुपये केवल गारंटी के रूप में जमा करना बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊँची ईएमडी अक्सर प्रतिस्पर्धा को सीमित करती है और बड़े खिलाड़ियों को स्वाभाविक बढ़त देती है।
10 साल की O&M शर्त: तकनीक बनाम पुराना अनुभव
दूसरा बड़ा सवाल 10 वर्ष की O&M (Operation & Maintenance) अनुभव की अनिवार्यता को लेकर है। तकनीक का क्षेत्र तेजी से बदलता है। ऐसे में लंबी अवधि की पूर्व उपस्थिति की शर्त क्या केवल कुछ स्थापित कंपनियों को फायदा पहुंचाने का माध्यम बन सकती है? आलोचकों का तर्क है कि यह शर्त नवाचार और नए खिलाड़ियों के प्रवेश को बाधित कर सकती है।
क्लस्टरिंग: सप्लाई और मेंटेनेंस एक साथ क्यों?
तीसरा मुद्दा सप्लाई और मेंटेनेंस को एक साथ ‘क्लब’ करने को लेकर उठ रहा है। सामान्यतः बड़े प्रोजेक्ट्स में इन्हें अलग-अलग भी रखा जाता है ताकि छोटे वेंडर्स को भी अवसर मिले। यदि दोनों को एक ही पैकेज में रखा गया है, तो क्या इससे प्रतिस्पर्धा सीमित हुई? यह वह सवाल है जिसका स्पष्ट उत्तर विभाग को देना होगा।
शिकायत और नामों की चर्चा
एक शिकायतकर्ता एस.के. शर्मा द्वारा कुछ अधिकारियों और कथित रूप से कुछ कंपनियों के नाम लेते हुए आरोप लगाए गए हैं कि टेंडर की शर्तें विशेष कंपनियों के अनुरूप बनाई गईं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और न ही संबंधित पक्षों की आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक रूप से सामने आई है। लेकिन जब इस तरह के आरोप सामने आते हैं, तो पारदर्शिता की मांग स्वाभाविक हो जाती है।
‘लोकल फॉर वोकल’ बनाम जमीनी हकीकत?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘लोकल फॉर वोकल’ की बात करते हैं। उनका स्पष्ट संदेश है कि छोटे और मध्यम उद्योगों को सरकारी खरीद में प्राथमिकता मिले। ऐसे में यदि टेंडर शर्तें MSMEs के लिए कठिन बनती दिखें, तो यह नीति और क्रियान्वयन के बीच अंतर का संकेत हो सकता है।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की बात करते रहे हैं। उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार भी शिक्षा सुधार को लेकर मुखर रहे हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि विभाग इस पूरे टेंडर प्रक्रिया पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण दे—क्या नियमों का पूर्ण पालन हुआ? क्या MSMEs को अवसर मिला? क्या सभी योग्य कंपनियों को समान अवसर दिया गया?
50% कमीशन की चर्चा: तथ्य या फुसफुसाहट?
मध्य प्रदेश की राजनीति में समय-समय पर ‘कमीशन संस्कृति’ को लेकर आरोप लगते रहे हैं। इस टेंडर को लेकर भी सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाएँ चल रही हैं। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन जब रकम 110 करोड़ की हो, तो पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य हो जाती है।
अब नजर फाइल पर
बताया जा रहा है कि संबंधित आयुक्त स्तर पर फाइल की समीक्षा जारी है। अखिलीक्स इस प्रक्रिया पर नजर बनाए हुए है—टेंडर ओपनिंग से लेकर संभावित वर्क ऑर्डर तक हर चरण की जानकारी सार्वजनिक डोमेन में लाने का प्रयास करेगा।
यह मामला केवल एक टेंडर का नहीं है। यह उस विश्वास का प्रश्न है जो छात्र, अभिभावक और करदाता सरकार पर रखते हैं। अगर नियमों का पालन हुआ है, तो विभाग को सामने आकर स्पष्ट करना चाहिए। अगर कोई अनियमितता है, तो जांच और जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए।
क्योंकि अंततः सवाल यही है—क्या यह 110 करोड़ की लैब छात्रों के भविष्य को मजबूत करेगी, या यह भी किसी ‘सेटिंग’ की कहानी बनकर रह जाएगी?
सच कड़वा हो सकता है, लेकिन अखिलीक्स पर सवाल सीधे होते हैं।



