कमलनाथ का वह सिस्टम: जिसे शिवराज ने बनाया, मोहन ने बढ़ाया, एमपी की सियासत का सबसे बड़ा गुप्त समझौता!
राजनीति में एक पुरानी कहावत है — दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। लेकिन मध्य प्रदेश की राजनीति में अब एक नई परिभाषा गढ़ी जा चुकी है। यहाँ दुश्मनी मंच पर होती है और दोस्ती पर्दे के पीछे। यहाँ जनता के सामने संघर्ष दिखाया जाता है और बंद कमरों में समझौता लिखा जाता है। इसी सिस्टम को आज हम एक नाम देते हैं — ‘कमलनाथ मैनेजमेंट’।
यह कोई एक व्यक्ति नहीं, कोई एक पार्टी नहीं, बल्कि एक ऐसा राजनीतिक-प्रशासनिक तंत्र है, जो समय के साथ सरकारें बदलने के बावजूद जस का तस चलता रहा। यह मैनेजमेंट शिवराज सिंह चौहान के दौर में भी सक्रिय था और आज डॉ. मोहन यादव के राज में भी पूरी तरह सुरक्षित और संरक्षित दिखाई देता है।
कहानी की शुरुआत होती है 5 जनवरी 2011 से। उस वक्त मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे शिवराज सिंह चौहान। उसी दौर में एक अहम Power Purchase Agreement यानी PPA साइन किया जाता है। कंपनी का नाम था — MB Power (Madhya Pradesh) Limited। स्थान — अनूपपुर। और इस कंपनी से जुड़ा वह नाम, जिसे मध्य प्रदेश की राजनीति में अलग से परिचय की जरूरत नहीं — रतुल पुरी, जिन्हें राजनीतिक रूप से कमलनाथ के भतीजे के तौर पर जाना जाता है। यह कोई आरोप नहीं है, बल्कि कंपनी के कॉरपोरेट रिकॉर्ड में दर्ज तथ्य है।
यह कोई छोटा-मोटा करार नहीं था। 1200 मेगावाट का कोयला आधारित पावर प्रोजेक्ट। सरकारी एजेंसी MPPMCL ने इस प्लांट की कुल क्षमता का 30 प्रतिशत हिस्सा खरीदने का समझौता किया। और यह समझौता किया गया पूरे 20 साल के लिए। यानी दो दशक तक राज्य सरकार इस कंपनी से बंध गई।
अब समझिए इस PPA का असली ढांचा। यह एक लॉन्ग-टर्म कोल-बेस्ड एग्रीमेंट था, जिसमें सबसे अहम क्लॉज होता है — Capacity Charge या Fixed Charge। इसका सीधा अर्थ यह होता है कि अगर पावर प्लांट बिजली देने के लिए उपलब्ध है, तो सरकार को भुगतान करना ही है। चाहे डिस्कॉम उस बिजली को उठाए या नहीं। चाहे राज्य में बिजली की जरूरत हो या न हो।
नतीजा यह हुआ कि मध्य प्रदेश बिजली में सरप्लस होते हुए भी प्राइवेट कंपनियों को हर साल हजारों करोड़ रुपये का फिक्स्ड पेमेंट करता रहा। यह सब सरकारी नीति के दायरे में था, लेकिन असली सवाल यही था कि यह नीति आखिर किसके फायदे के लिए बनाई गई थी।
इस मैनेजमेंट पर सवाल सिर्फ विपक्ष ने नहीं उठाए। कांग्रेस के भीतर से भी आवाजें उठीं। जनवरी 2024 में कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता आलोक शर्मा ने वह कहा, जिसने दिल्ली से भोपाल तक सियासी हलचल पैदा कर दी। शर्मा ने खुले तौर पर आरोप लगाया कि कमलनाथ खुद नहीं चाहते थे कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बने। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि आखिर कमलनाथ के घर ED और CBI क्यों नहीं पहुँचती। उन्होंने टिकट वितरण से लेकर इंडिया गठबंधन तक की विफलता का जिम्मेदार कमलनाथ के अहंकार और बयानों को ठहराया। सवाल साफ था — क्या यह वही मैनेजमेंट था, जिसने बीजेपी के रास्ते आसान किए।
अब जरा इस विरोधाभास को देखिए। 2019 और 2020 के बीच केंद्र की जांच एजेंसियों ने रतुल पुरी पर कार्रवाई की। पूछताछ हुई, गिरफ्तारी हुई, जेल तक जाना पड़ा। लेकिन भोपाल में क्या बदला? कुछ भी नहीं। वही PPA, वही प्रोजेक्ट और वही भुगतान। वजह भी उतनी ही साफ थी। सिस्टम अब खुद उस समझौते का बंधक बन चुका था। PPA तोड़ने का मतलब था — हजारों करोड़ रुपये के क्लेम और सालों चलने वाली कानूनी लड़ाई। सत्ता में बैठे लोगों ने तय कर लिया कि सरकार किसी की भी हो, लेकिन ‘नाथ’ से जुड़ी कंपनी का भुगतान नहीं रुकेगा।
इस पावर मैनेजमेंट की चमक-दमक के नीचे अनूपपुर का एक स्याह सच भी दबा हुआ है। आदिवासियों की जमीन ली गई, लेकिन बदले में उन्हें क्या मिला? 1,066 किसानों को स्थायी नौकरी का वादा किया गया था, लेकिन ज्यादातर को दिहाड़ी मजदूर बनाकर छोड़ दिया गया। पर्यावरणीय नियमों की ऐसी अनदेखी हुई कि करीब 37,000 हेक्टेयर वन भूमि से जुड़े सवाल फाइलों में दबा दिए गए। PESA कानून और आदिवासी अधिकारों की खुलेआम अनदेखी हुई, लेकिन मैनेजमेंट के रसूख के आगे हर आवाज खामोश कर दी गई।
आज भी तस्वीर बदली नहीं है। शिवराज सिंह चौहान के समय यह PPA साइन हुआ। कमलनाथ के कार्यकाल में यह फला-फूला। और आज, जब मुख्यमंत्री हैं डॉ. मोहन यादव, तब भी यह समझौता जस का तस कायम है। 27 जनवरी 2026 को खुद मुख्यमंत्री की मौजूदगी में रतुल पुरी की कंपनी, अब हिंदुस्तान थर्मल के नाम से, को 12,000 करोड़ रुपये का नया निवेश मिलता है। और यहां एक दिलचस्प मोड़ भी है। कांग्रेस मंच से अडाणी को कोसती है, लेकिन इसी प्रोजेक्ट में अडाणी ग्रुप बड़ी हिस्सेदारी लेता है। और कमलनाथ मैनेजमेंट? वह चुपचाप मुस्कुराता रहता है।
यही है कमलनाथ मैनेजमेंट की असली परिभाषा। यह न खुली दोस्ती है, न खुली दुश्मनी। यह एक ऐसा मैनेजमेंट है, जहाँ सत्ता किसी की भी हो, लेकिन सिस्टम वही चलता है जो पर्दे के पीछे पहले से तय कर दिया गया हो। नुकसान हुआ है तो सिर्फ जनता का। नुकसान हुआ है उन आदिवासियों और किसानों का, जिनकी जमीन पर यह पूरा पावर गेम खेला गया।
अब सवाल आपसे है।
क्या यह सिर्फ संयोग है या एक सोची-समझी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था?
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