भारत–EU ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ साइन | 99% भारतीय सामान यूरोप में टैक्स-फ्री आज की तारीख अपनी डायरी में नोट कर लीजिए — 28 जनवरी 2026।
क्योंकि आज भारत ने वो कर दिखाया है जिसकी कोशिश पिछले करीब बीस सालों से हो रही थी। भारत और यूरोपीय संघ के बीच आखिरकार वो ऐतिहासिक समझौता साइन हो चुका है, जिसे दुनिया अब ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कह रही है। दुनिया की 25 प्रतिशत GDP वाले 27 देशों का यूरोपीय संघ एक तरफ है और दूसरी तरफ दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था — हमारा भारत।
इस डील का सबसे बड़ा और सीधा मतलब यह है कि भारत के 99 प्रतिशत उत्पाद अब यूरोप में टैक्स-फ्री या लगभग टैक्स-फ्री बिकेंगे। यानी भारतीय कंपनियों के लिए यूरोप का बाजार अब पहले जैसा मुश्किल नहीं, बल्कि अवसरों से भरा हुआ मैदान है।
इस समझौते की कहानी कोई रातों-रात बनी कहानी नहीं है। इसकी नींव 2007 में रखी गई थी। 18 सालों में न जाने कितनी बार बातचीत टूटी, फाइलें ठंडी पड़ीं, सरकारें बदलीं, वैश्विक हालात बदले। चीन का दबाव, कोविड की मार, रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका का टैरिफ वॉर — हर वजह से यह डील अटकी रही। लेकिन 2026 में आकर पीएम नरेंद्र मोदी ने वो मास्टरस्ट्रोक खेला, जिसने पूरी तस्वीर बदल दी। अब सबसे पहले बात उन सेक्टर्स की, जिनकी किस्मत इस डील के बाद चमकने वाली है।
कपड़ा उद्योग, जहां अभी तक यूरोपीय बाजार पर चीन और बांग्लादेश का कब्जा था। भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 6 प्रतिशत तक सिमटी हुई थी। वजह साफ थी — 12 प्रतिशत तक की भारी ड्यूटी। लेकिन अब यह दीवार गिर चुकी है। ड्यूटी खत्म होते ही तिरुपुर और सूरत जैसे निटवेयर और टेक्सटाइल हब के लिए 263 अरब डॉलर का यूरोपीय बाजार खुल गया है। सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक भारत का टेक्सटाइल एक्सपोर्ट 9 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचे।
इसके बाद जेम्स एंड ज्वेलरी सेक्टर आता है। 1.56 लाख करोड़ रुपये के यूरोपीय बाजार में अब तक चीन और थाईलैंड हावी थे। लेकिन जीरो-टैरिफ मिलते ही तस्वीर बदलने वाली है। जयपुर, सूरत, मुंबई और कोलकाता के कारीगरों के लिए यह डील किसी जैकपॉट से कम नहीं है। जहां पहले भारतीय गहने महंगे पड़ते थे, अब वही भारत की सबसे बड़ी ताकत बनेंगे।
लेदर और फुटवियर सेक्टर के लिए भी यह समझौता किसी वरदान से कम नहीं है। आगरा, कानपुर और कोल्हापुर जैसे क्लस्टर्स अब तक 17 प्रतिशत टैक्स की मार झेल रहे थे। अब यह टैक्स इतिहास बनने जा रहा है। मतलब साफ है — MSME सेक्टर को सीधा फायदा।
खेती और फूड प्रोसेसिंग की बात करें तो भारतीय मीट, फल, जूस, प्रोसेस्ड फूड और चॉकलेट्स के लिए यूरोप के दरवाजे अब पूरी तरह खुल चुके हैं। किसानों से लेकर स्टार्टअप्स तक, सभी के लिए एक्सपोर्ट का नया रास्ता तैयार हो गया है।
अब सवाल उठता है — आम भारतीय को इससे क्या मिलेगा?
तो जवाब सीधा है। अगर आप मर्सेडीज या ऑडी के शौकीन हैं, तो जश्न मनाइए। 15 लाख रुपये से ऊपर की इम्पोर्टेड कारों पर जो टैक्स पहले 110 प्रतिशत तक था, वह अगले पांच सालों में घटकर सिर्फ 10 प्रतिशत रह जाएगा। जिस कार की कीमत पहले 31.5 लाख रुपये पड़ती थी, वही कार अब करीब 25 लाख में आपके गैराज तक पहुंच सकती है।
शराब और वाइन पसंद करने वालों के लिए भी बड़ी खबर है। वाइन पर लगने वाला 150 प्रतिशत टैक्स सीधे घटकर 75 प्रतिशत पर आ गया है। बीयर पर टैक्स 110 प्रतिशत से घटकर 50 प्रतिशत हो गया है। इसका सीधा फायदा हॉस्पिटैलिटी और टूरिज्म सेक्टर को मिलेगा।
इस डील का एक और बड़ा पहलू है — इंजीनियरिंग और सेमीकंडक्टर। 2030 तक भारत का इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट 300 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। नीदरलैंड जैसे देशों से सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर होगा, जिससे भारत दुनिया के टॉप-5 सेमीकंडक्टर हब में शामिल हो सकता है।
लेकिन यह डील सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। यह एक करारा भू-राजनीतिक संदेश भी है। ऐसे समय में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प टैरिफ वॉर के जरिए दबाव बना रहे थे और उनके वित्त मंत्री यूरोप को धमका रहे थे, तब यूरोपीय संघ ने भारत का हाथ थामकर दुनिया को साफ संदेश दे दिया — भविष्य भारत के साथ है।
इसी कड़ी में IMEC कॉरिडोर का रास्ता भी साफ हो गया है। 4800 किलोमीटर लंबा इंडिया–मिडिल ईस्ट–यूरोप कॉरिडोर अब सिर्फ कागजों में नहीं रहेगा। साथ ही फ्रांस और जर्मनी भारत में डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कॉम्प्लेक्स बनाने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। भारतीय प्राइवेट कंपनियों को यूरोपीय डिफेंस मार्केट में एंट्री मिलेगी।
वीज़ा और नौकरियों के मोर्चे पर भी राहत की खबर है। यूरोप में पहले से मौजूद 1500 से ज्यादा भारतीय कंपनियों के चलते अब छात्रों और प्रोफेशनल्स के लिए वीज़ा नियम आसान होंगे। यानी भारतीय युवाओं के लिए यूरोप के रास्ते और खुले होंगे।
हालांकि कहानी में एक ट्विस्ट भी है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि कार्बन टैक्स यानी CBAM भारत के लिए अगली बड़ी चुनौती हो सकता है। अगर फैक्ट्रियां ग्रीन नहीं हुईं, तो टैक्स-फ्री का फायदा प्रदूषण के नाम पर कट सकता है। इसलिए भारत को अब पर्यावरण के मोर्चे पर भी तेजी से काम करना होगा।
कुल मिलाकर, यह डील एक बात साफ करती है। भारत अब सिर्फ उभरती हुई अर्थव्यवस्था नहीं रहा। भारत अब ग्लोबल सप्लाई चेन का नया केंद्र बन रहा है। चीन की कुर्सी हिल चुकी है और बांग्लादेश के लिए मुकाबला पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो गया है। यह समझौता 2028 तक पूरी तरह लागू होगा और 2032 तक 12.51 लाख करोड़ रुपये के ट्रेड का लक्ष्य रखा गया है।
अब सवाल आपसे है —
क्या इस डील के बाद भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की रफ्तार और तेज करेगा?
कमेंट में अपनी राय दीजिए।
और हां, अगली बार जब सड़क पर आपको सस्ती ऑडी दिखे, तो याद रखिएगा — 28 जनवरी 2026।



